
एआई की दौड़ में एक यात्रा कार्यक्रम इतना महत्वपूर्ण क्यों बन गया
कभी-कभी वैश्विक तकनीकी राजनीति किसी औपचारिक घोषणा, बड़े अधिग्रहण या नई चिप के लॉन्च से नहीं, बल्कि एक कारोबारी यात्रा की दिशा से समझ में आती है। एनविडिया के मुख्य कार्यकारी अधिकारी जेनसन हुआंग की हालिया एशिया यात्रा को इसी नजर से देखा जा रहा है। उन्होंने ताइवान में लगभग दो सप्ताह बिताए, वहां टीएसएमसी और फॉक्सकॉन जैसे दिग्गजों से मुलाकात की, फिर दक्षिण कोरिया में तीन रात और चार दिन के दौरान एसके समूह के चेयरमैन चेय ताए-वोन, एलजी समूह के चेयरमैन कू क्वांग-मो और नेवर बोर्ड के चेयरमैन ली हे-जिन जैसे शीर्ष उद्योग नेताओं से बातचीत की। लेकिन इस पूरी यात्रा का सबसे चर्चित पहलू यह रहा कि इस दौर में जापान उनकी सूची में शामिल नहीं था।
पहली नजर में यह बात मामूली लग सकती है। आखिर किसी वैश्विक कंपनी प्रमुख की यात्रा-योजना से इतना निष्कर्ष क्यों निकाला जाए? लेकिन एआई युग में यह सवाल केवल प्रोटोकॉल का नहीं, प्राथमिकताओं का है। एनविडिया आज कृत्रिम बुद्धिमत्ता की दुनिया में वैसी ही केंद्रीय भूमिका निभा रही है जैसी कभी इंटरनेट युग के शुरुआती दौर में कुछ चुनिंदा प्लेटफॉर्म कंपनियों की हुआ करती थी। उसके जीपीयू, उसके सॉफ्टवेयर प्लेटफॉर्म और उसके इकोसिस्टम के बिना आधुनिक जनरेटिव एआई, डेटा सेंटर विस्तार और बड़े पैमाने की कंप्यूटिंग की कल्पना अधूरी मानी जाती है। ऐसे में जेनसन हुआंग किन देशों और किन कंपनियों के साथ समय बिताते हैं, यह बताता है कि वैश्विक एआई सप्लाई चेन का भार किस दिशा में खिसक रहा है।
भारतीय पाठकों के लिए इसे समझने का एक आसान तरीका है। जैसे किसी दौर में अगर दुनिया की सबसे बड़ी मोबाइल कंपनी के प्रमुख लगातार नोएडा, श्रीपेरंबदूर, बेंगलुरु और हैदराबाद का दौरा करने लगें, तो हम तुरंत समझ जाएंगे कि भारत अब केवल बाजार नहीं, बल्कि निर्माण, डिजाइन और डिजिटल सेवाओं का रणनीतिक केंद्र भी बन रहा है। ठीक इसी तरह कोरिया और ताइवान की ओर हुआ यह झुकाव संकेत देता है कि एआई प्रतिस्पर्धा अब केवल सॉफ्टवेयर एल्गोरिद्म की लड़ाई नहीं रह गई, बल्कि उन्नत चिप निर्माण, मेमोरी, पैकेजिंग, सर्वर, डेटा सेंटर और औद्योगिक उपयोग के मेल से तय होगी।
जापान के भीतर इस पर बढ़ती चिंता का मतलब भी यही है। तकनीकी ताकत केवल इस बात से नहीं मापी जाएगी कि किसी देश के पास बेहतरीन मशीन, सामग्री या औद्योगिक अनुशासन है। अब सवाल यह है कि क्या वह देश एआई युग के निर्णायक प्लेटफॉर्म खिलाड़ियों के साथ सीधी, जीवंत और रणनीतिक साझेदारी में है या नहीं। जेनसन हुआंग की यह यात्रा उसी बदलती कसौटी की एक सार्वजनिक झलक बन गई है।
दक्षिण कोरिया की बदलती भूमिका: सप्लायर से रणनीतिक साझेदार तक
इस पूरे घटनाक्रम का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि दक्षिण कोरिया को अब सिर्फ एक आपूर्तिकर्ता देश के रूप में नहीं, बल्कि एआई उद्योग के साझेदार के रूप में देखा जा रहा है। अब तक आम समझ यह रही कि एनविडिया डिजाइन और प्लेटफॉर्म पर नियंत्रण रखती है, ताइवान उन्नत चिप निर्माण का केंद्र है, और कोरिया मुख्यतः मेमोरी जैसे महत्वपूर्ण हिस्से उपलब्ध कराता है। लेकिन हाल की गतिविधियां यह दिखाती हैं कि तस्वीर अब इससे कहीं व्यापक हो चुकी है।
सैमसंग इलेक्ट्रॉनिक्स और एसके हाइनिक्स पहले से ही एआई से जुड़ी सेमीकंडक्टर आपूर्ति श्रृंखला के केंद्रीय नाम माने जाते हैं। खास तौर पर हाई-बैंडविड्थ मेमोरी यानी एचबीएम जैसी तकनीक, जो एआई सर्वरों की क्षमता बढ़ाने में अत्यंत महत्वपूर्ण है, कोरिया की विशेषज्ञता का बड़ा आधार बन चुकी है। लेकिन अब कहानी केवल चिप बेचने तक सीमित नहीं है। एनविडिया का कोरिया के शीर्ष कॉरपोरेट नेताओं से सीधे संवाद यह संकेत देता है कि वह औद्योगिक उपयोग, डेटा सेंटर निर्माण, क्लाउड इन्फ्रास्ट्रक्चर और एआई-आधारित संचालन व्यवस्था जैसे बड़े प्रश्नों पर भी कोरियाई कंपनियों के साथ तालमेल बढ़ाना चाहती है।
एसके समूह के साथ कथित एआई फैक्टरी निर्माण की दिशा में विचार-विमर्श को इसी संदर्भ में समझना चाहिए। यहां एआई फैक्टरी का अर्थ केवल रोबोट लगाकर उत्पादन लाइन तेज करना नहीं है। यह एक ऐसे बड़े ढांचे की कल्पना है जिसमें कंप्यूटिंग क्षमता, डेटा प्रोसेसिंग, प्रेडिक्टिव मेंटेनेंस, ऊर्जा प्रबंधन, सप्लाई चेन अनुकूलन और वास्तविक समय में निर्णय लेने की प्रणालियां एक साथ काम करें। भारतीय पाठकों के लिए इसकी तुलना ऐसे की जा सकती है जैसे ऑटोमोबाइल, फार्मा या इलेक्ट्रॉनिक्स के बड़े औद्योगिक गलियारों में केवल मशीनें नहीं, बल्कि डेटा-संचालित बुद्धिमान संचालन मॉडल विकसित किए जाएं।
एलजी समूह और नेवर जैसे नाम इसीलिए महत्वपूर्ण हैं क्योंकि वे कोरिया की एआई कहानी को केवल हार्डवेयर तक सीमित नहीं रहने देते। एलजी इलेक्ट्रॉनिक्स, डिस्प्ले, बैटरी और उपभोक्ता उपकरणों में फैला हुआ समूह है, जबकि नेवर कोरिया का प्रमुख इंटरनेट प्लेटफॉर्म है। जब एक ही यात्रा में ऐसे विविध क्षेत्रों के खिलाड़ी शामिल होते हैं, तो संदेश साफ होता है कि एआई पारिस्थितिकी तंत्र अब एकल उद्योग का मामला नहीं रहा। यह वैसा ही है जैसे भारत में अगर कोई वैश्विक तकनीकी कंपनी एक साथ टाटा, रिलायंस जियो, इंफोसिस, महिंद्रा और किसी बड़े उपभोक्ता इंटरनेट मंच से बातचीत करे, तो उसका संकेत केवल खरीद-बिक्री नहीं, बल्कि पूरे आर्थिक ढांचे में तकनीकी पुनर्संयोजन होगा।
यही कारण है कि कोरिया के लिए यह यात्रा प्रतीकात्मक से अधिक संरचनात्मक महत्व रखती है। वह केवल चिप का कारखाना नहीं, बल्कि एआई अनुप्रयोगों, औद्योगिक परिवर्तन और डिजिटल प्लेटफॉर्म विस्तार का एक संयुक्त मंच बनकर उभरना चाहता है।
ताइवान और कोरिया: एआई सेमीकंडक्टर धुरी का निर्माण
जेनसन हुआंग की यात्रा का दूसरा बड़ा अर्थ ताइवान और दक्षिण कोरिया को एक साझा एआई सेमीकंडक्टर धुरी के रूप में पढ़े जाने में है। ताइवान लंबे समय से उन्नत चिप निर्माण का वैश्विक केंद्र माना जाता है। टीएसएमसी का नाम आज दुनिया में लगभग उसी तरह लिया जाता है जैसे किसी जमाने में तेल उत्पादक देशों का ऊर्जा बाजार में लिया जाता था—एक ऐसा केंद्र, जिसके बिना बड़े औद्योगिक समीकरण पूरे नहीं होते। यदि एनविडिया एआई का रणनीतिक दिमाग है, तो टीएसएमसी उसका निर्माण-आधार है।
ताइवान में जेनसन हुआंग की लंबी मौजूदगी और वहां बड़े निवेश के संकेत इस बात को और मजबूत करते हैं कि एआई की अगली लहर के लिए विनिर्माण क्षमता निर्णायक होगी। लेकिन उतना ही महत्वपूर्ण यह है कि कोरिया इस धुरी में प्रतिस्पर्धी होने के साथ-साथ पूरक भी है। कोरिया की ताकत मेमोरी, उन्नत इलेक्ट्रॉनिक्स, बैटरी, डिस्प्ले और भारी उद्योग-आधारित अनुप्रयोगों में है। दूसरे शब्दों में, ताइवान जहां अत्यधिक उन्नत उत्पादन और असेंबली के केंद्र के रूप में चमकता है, वहीं कोरिया एआई को औद्योगिक ढांचों और व्यापक कॉरपोरेट उपयोग में उतारने की क्षमता के कारण अलग पहचान बनाता है।
यहां एक दिलचस्प भारतीय संदर्भ भी है। भारत लंबे समय से इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण, सेमीकंडक्टर पैकेजिंग, डिजाइन सेवाओं और डिजिटल प्लेटफॉर्म विकास को एक साथ जोड़ने की कोशिश कर रहा है। लेकिन पूर्वी एशिया का यह उदाहरण बताता है कि एआई इकोसिस्टम में अकेले किसी एक क्षेत्र में मजबूत होना पर्याप्त नहीं है। निर्माण, मेमोरी, सॉफ्टवेयर, सर्वर, डेटा सेंटर और वास्तविक औद्योगिक मांग—इन सबका तालमेल जरूरी है। यही वजह है कि ताइवान और कोरिया को एक द्वि-ध्रुवीय शक्ति-समूह की तरह देखा जा रहा है।
यह प्रतिस्पर्धा का संबंध भी है और साझेदारी का भी। दोनों अर्थव्यवस्थाएं अलग-अलग ताकत लेकर आती हैं, लेकिन एआई मूल्य-श्रृंखला में वे एक-दूसरे को पूरा करती हैं। एनविडिया जैसे खिलाड़ी के लिए यह संयोजन आदर्श है—एक ओर सबसे उन्नत निर्माण, दूसरी ओर विशाल औद्योगिक प्रयोग और मेमोरी क्षमता। इसलिए हुआंग की यात्रा को केवल शिष्टाचार नहीं, बल्कि उस नए एशियाई मानचित्र के रूप में पढ़ा जा रहा है, जहां एआई की असली शक्ति केवल सिलिकॉन वैली में नहीं, बल्कि सियोल और ताइपे की फैक्ट्रियों, प्रयोगशालाओं और बोर्डरूम में भी आकार ले रही है।
जापान की चिंता: तकनीकी महाशक्ति होने के बावजूद बेचैनी क्यों
जापान की चिंता को समझना भी जरूरी है, क्योंकि यही चिंता इस पूरी कहानी को और ज्यादा अर्थ देती है। जापान लंबे समय तक वैश्विक तकनीकी और औद्योगिक क्षमता का पर्याय रहा है। सेमीकंडक्टर उपकरण, रसायन, विशेष सामग्री, सटीक निर्माण और औद्योगिक अनुशासन में उसकी प्रतिष्ठा अब भी मजबूत है। टोक्यो इलेक्ट्रॉन, एडवांटेस्ट और शिन-एत्सु केमिकल जैसी कंपनियां आज भी वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। फिर भी सवाल यह उठ रहा है कि यदि एआई युग के केंद्रीय प्लेटफॉर्म खिलाड़ी के साथ जापान का प्रत्यक्ष और घनिष्ठ जुड़ाव सीमित है, तो क्या उसकी पारंपरिक मजबूती भविष्य की निर्णायक शक्ति में तब्दील हो पाएगी?
यही जापान की बेचैनी का मूल है। बीते दशकों में किसी देश के लिए यह पर्याप्त माना जाता था कि वह निर्माण उपकरण, औद्योगिक सामग्री या मशीनरी में अग्रणी हो। लेकिन आज एआई अर्थव्यवस्था में मूल्य-सृजन की धुरी वहां है जहां चिप डिजाइन, सॉफ्टवेयर प्लेटफॉर्म, विशाल कंप्यूटिंग ढांचा और बड़े औद्योगिक उपयोग एक साथ जुड़ते हैं। यानी खेल अब केवल ‘सबसे अच्छा पुर्जा किसके पास है’ का नहीं, बल्कि ‘निर्णायक नेटवर्क में कौन शामिल है’ का हो गया है।
भारत के संदर्भ में इसे हम दूरसंचार या डिजिटल भुगतान के अनुभव से समझ सकते हैं। जिन कंपनियों ने सिर्फ हार्डवेयर बेचा, वे महत्वपूर्ण रहीं; लेकिन असली प्रभाव उन संस्थाओं का बढ़ा जिन्होंने प्लेटफॉर्म, नेटवर्क और उपयोगकर्ता व्यवहार को जोड़ दिया। ठीक वैसा ही एआई के साथ हो रहा है। जापान के पास श्रेष्ठ औद्योगिक क्षमता है, लेकिन यदि वह एनविडिया जैसे मंचों के साथ रणनीतिक रूप से पर्याप्त दिखाई नहीं देता, तो बाजार इसे संभावित पिछड़ापन मानने लगता है।
यह भी ध्यान रखना चाहिए कि किसी एक यात्रा से किसी देश का भाग्य तय नहीं होता। जापान को खारिज कर देना जल्दबाजी होगी। उसके पास पूंजी, तकनीक, संस्थागत क्षमता और पुनर्गठन की ताकत अब भी है। लेकिन यह घटना जापानी उद्योग और नीति-निर्माताओं के लिए एक चेतावनी की तरह जरूर देखी जा रही है कि एआई युग में पुरानी उपलब्धियां स्वतः भविष्य की गारंटी नहीं बनतीं। आपको सही नेटवर्क, सही साझेदार और सही समय पर निर्णायक उपस्थिति भी चाहिए।
व्यावसायिक डिनर और ‘समग्योपसल’ की राजनीति: एशियाई कारोबारी संस्कृति का संकेत
जेनसन हुआंग की कोरिया यात्रा का एक मानवीय और सांस्कृतिक पक्ष भी चर्चा में रहा—कोरियाई शैली के भोजन के दौरान शीर्ष कारोबारियों के साथ उनकी मुलाकात। रिपोर्टों में समग्योपसल, यानी कोरियाई शैली के ग्रिल्ड पोर्क बेली डिनर, का विशेष उल्लेख आया। भारतीय पाठकों के लिए यह बात साधारण लग सकती है कि बड़े कारोबारी लोग डिनर पर मिले। लेकिन पूर्वी एशियाई कारोबारी संस्कृति में ऐसे भोजन-सत्र केवल सामाजिक औपचारिकता नहीं होते; वे भरोसे, रिश्ते और अनौपचारिक तालमेल की गहराई का संकेत भी माने जाते हैं।
भारत में भी इसका एक समानांतर रूप देखा जा सकता है। यहां कई बार किसी उद्योगपति और नीति-निर्माता या दो बड़े व्यावसायिक समूहों की मुलाकात केवल सम्मेलन कक्ष में नहीं, बल्कि लंबे भोजन-सत्र, बंद दरवाजे की बैठकों या निजी वार्ताओं में आगे बढ़ती है। उस दौरान हर बात सार्वजनिक नहीं होती, लेकिन संबंधों की दिशा समझ में आने लगती है। कोरिया में ऐसे साझा भोजन अक्सर संकेत देते हैं कि बातचीत केवल परिचय के स्तर पर नहीं, बल्कि भरोसे और भविष्य के सहयोग के स्तर पर पहुंच रही है।
यहां सावधानी की भी जरूरत है। केवल किसी डिनर या मुलाकात के आधार पर नए अनुबंध, निवेश या रणनीतिक समझौतों का निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा, जब तक उसकी औपचारिक घोषणा न हो। पत्रकारिता में तथ्य और व्याख्या की सीमा बनाए रखना जरूरी है। लेकिन इतना जरूर कहा जा सकता है कि एनविडिया के प्रमुख का कई दिनों तक कोरिया में रहना और वहां उद्योग जगत के सबसे प्रभावशाली चेहरों से औपचारिक तथा अनौपचारिक दोनों स्तरों पर संवाद करना, स्वयं में एक मजबूत संकेत है।
इसका एक सांस्कृतिक अर्थ यह भी है कि एआई की दुनिया चाहे जितनी डिजिटल और एल्गोरिद्मिक हो, उसकी बड़ी साझेदारियां आज भी इंसानी रिश्तों, भरोसे और राजनीतिक-व्यावसायिक समझ पर टिकती हैं। चिप की दुनिया मशीनों से बनती है, लेकिन गठजोड़ अभी भी लोग ही तय करते हैं। समग्योपसल की मेज इसलिए प्रतीक बनती है—वह हमें बताती है कि भविष्य की फैक्टरी के पीछे आज भी बहुत कुछ व्यक्तिगत संवाद की गर्माहट में तय होता है।
भारत के लिए सबक: केवल आईटी सेवा नहीं, पूरी एआई वैल्यू चेन की जरूरत
इस पूरी कहानी को केवल कोरिया, ताइवान और जापान के क्षेत्रीय समीकरण तक सीमित समझना भारतीय पाठकों के लिए अधूरा होगा। असली प्रश्न यह है कि भारत इस उभरते एआई मानचित्र से क्या सीख सकता है। भारत लंबे समय से सॉफ्टवेयर सेवाओं, डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर, स्टार्टअप नवाचार और विशाल उपभोक्ता बाजार के कारण तकनीकी विमर्श के केंद्र में है। हमारे पास यूपीआई जैसा मॉडल है, आधार जैसी पहचान प्रणाली है, क्लाउड उपयोग में तेजी है, और एआई प्रतिभा का बड़ा आधार भी है। लेकिन एआई की वैश्विक शक्ति-संरचना अब यह बता रही है कि केवल कोडिंग या ऐप निर्माण काफी नहीं होगा।
यदि भारत को अगली तकनीकी छलांग में निर्णायक भूमिका निभानी है, तो उसे चिप डिजाइन, पैकेजिंग, डेटा सेंटर, ऊर्जा आपूर्ति, उन्नत विनिर्माण, औद्योगिक एआई और क्षेत्रीय भाषा एआई—इन सबको जोड़ना होगा। पूर्वी एशिया की यह कहानी हमें दिखाती है कि जिसने सप्लाई चेन और उपयोग-श्रृंखला दोनों पर पकड़ बनाई, वही असली साझेदार बनता है। केवल उपभोक्ता बाजार होना पर्याप्त नहीं है। केवल प्रतिभा होना भी पर्याप्त नहीं है। जरूरी यह है कि क्या हमारे उद्योग समूह, तकनीकी कंपनियां, राज्य सरकारें और नीति ढांचा मिलकर ऐसा वातावरण बना रहे हैं, जहां वैश्विक एआई कंपनियां भारत को केवल ग्राहक नहीं, बल्कि रणनीतिक साझेदार के रूप में देखें।
भारत में भी इसके बीज मौजूद हैं। इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण बढ़ रहा है, सेमीकंडक्टर मिशन पर काम हो रहा है, डेटा सेंटर निवेश आ रहे हैं, और ऑटोमोबाइल से लेकर स्वास्थ्य और कृषि तक एआई उपयोग के नए मॉडल उभर रहे हैं। लेकिन तुलना हमें यह भी सिखाती है कि गति, पैमाना और संस्थागत समन्वय कितने महत्वपूर्ण हैं। कोरिया और ताइवान की ताकत यह है कि उन्होंने तकनीकी औद्योगिकीकरण को राष्ट्रीय प्राथमिकता के रूप में दशकों तक लगातार साधा। भारत को भी यही लंबी दृष्टि चाहिए।
भारतीय उद्योग जगत के लिए एक और सबक है। एआई को केवल चैटबॉट, ऑफिस उत्पादकता या ग्राहक सेवा का उपकरण मानना बहुत सीमित दृष्टि होगी। असली प्रतिस्पर्धा उत्पादन इकाइयों, लॉजिस्टिक्स, ऊर्जा, रक्षा, स्वास्थ्य अवसंरचना और शहरी प्रबंधन तक फैलेगी। जो देश और कंपनियां इन क्षेत्रों में एआई को बड़े पैमाने पर तैनात करेंगी, वही वैश्विक मूल्य श्रृंखला में ऊंचे स्तर पर बैठेंगी।
अभी जीत नहीं, पर बड़ा अवसर जरूर: कोरिया की बढ़त का सही अर्थ
दक्षिण कोरिया के लिए यह क्षण उत्साहजनक जरूर है, लेकिन इसे अंतिम विजय मानना गलत होगा। एनविडिया के साथ घनिष्ठ संवाद, सेमीकंडक्टर आपूर्ति में केंद्रीय भूमिका, एआई फैक्टरी जैसे सहयोगी विचार और हार्डवेयर से प्लेटफॉर्म तक फैली औद्योगिक उपस्थिति—ये सभी संकेत कोरिया को मजबूत स्थिति में दिखाते हैं। लेकिन एआई की दौड़ इतनी तेज है कि आज का साझेदार कल चुनौती का सामना कर सकता है। तकनीक बदलती है, मांग बदलती है, भू-राजनीतिक प्राथमिकताएं बदलती हैं, और निवेश का रुख भी अचानक बदल सकता है।
इसलिए इस यात्रा का सबसे संतुलित अर्थ यह है कि कोरिया को एक रणनीतिक अवसर मिला है। वह अब केवल मेमोरी चिप निर्यातक या इलेक्ट्रॉनिक्स महाशक्ति के रूप में नहीं, बल्कि एआई इकोसिस्टम के बहु-स्तरीय भागीदार के रूप में देखा जा रहा है। यदि वह इस मौके को वास्तविक औद्योगिक उत्पादकता, सेवा नवाचार, घरेलू एआई क्षमता और वैश्विक साझेदारी में बदल पाता है, तभी यह लाभ टिकाऊ होगा।
जापान के लिए यह चेतावनी है कि पुरानी तकनीकी प्रतिष्ठा को नए नेटवर्क से जोड़ना होगा। ताइवान के लिए यह पुष्टि है कि वह अभी भी एआई निर्माण शृंखला का धड़कता केंद्र है। और भारत के लिए यह स्पष्ट संदेश है कि एआई की अगली सदी में सम्मानजनक स्थान पाने के लिए सॉफ्टवेयर, हार्डवेयर, अवसंरचना और औद्योगिक उपयोग को एक साझा राष्ट्रीय परियोजना की तरह देखना पड़ेगा।
जेनसन हुआंग की यह यात्रा आखिरकार केवल एक सीईओ के कार्यक्रम की कहानी नहीं है। यह उस बदलते एशिया की कहानी है जहां तकनीक, भू-राजनीति और उद्योग नए गठजोड़ बना रहे हैं। सवाल यह नहीं कि किस देश को एक बार बुलावा मिला और कौन छूट गया। असली सवाल यह है कि किस देश ने खुद को उस भविष्य के लिए तैयार किया है जिसमें एआई केवल कंप्यूटर स्क्रीन पर नहीं, बल्कि फैक्टरी, कार, क्लाउड, अस्पताल, बंदरगाह और रोजमर्रा की अर्थव्यवस्था के हर कोने में काम करेगा। इस कसौटी पर देखें, तो कोरिया ने एक महत्वपूर्ण संकेत हासिल किया है—लेकिन अंतिम परीक्षा अभी बाकी है।
0 टिप्पणियाँ