광고환영

광고문의환영

जेजू के झरने के किनारे बस रहा ‘जलवायु-उत्तरदायी शहरी वन’: सोग्वीपो की नई पहल से क्या सीख सकता है भारत

जेजू के झरने के किनारे बस रहा ‘जलवायु-उत्तरदायी शहरी वन’: सोग्वीपो की नई पहल से क्या सीख सकता है भारत

प्रकृति, पर्यटन और नागरिक जीवन को एक साथ जोड़ने की कोशिश

दक्षिण कोरिया के जेजू द्वीप के दक्षिणी शहर सोग्वीपो में एक ऐसी परियोजना शुरू हुई है, जो पहली नजर में स्थानीय प्रशासन का नियमित हरित विकास कार्यक्रम लग सकती है, लेकिन गहराई से देखें तो यह हमारे समय की एक बड़ी बहस से जुड़ती है—जलवायु संकट के दौर में शहर कैसे सांस लें, लोग कैसे ठहरें, और पर्यटन केवल ‘देखने’ की चीज न रहकर ‘जीने’ का अनुभव कैसे बने। सोग्वीपो प्रशासन ने एंगत्तो झरने के आसपास ‘जलवायु-उत्तरदायी शहरी वन’ परियोजना के दूसरे चरण की शुरुआत की है। इस चरण में लगभग 2 हेक्टेयर क्षेत्र को विकसित किया जाएगा, 20 अरब वॉन नहीं बल्कि 20 करोड़ कोरियाई वॉन के बराबर स्थानीय बजट संरचना के अनुसार लगभग 2 अरब कोरियाई वॉन स्तर की सार्वजनिक राशि खर्च की जाएगी, और इसमें राष्ट्रीय स्तर के वन विभाग की 50 प्रतिशत वित्तीय हिस्सेदारी होगी। योजना के तहत 1.8 लाख से अधिक कार्बन-संग्रहण क्षमता वाले पेड़ लगाए जाएंगे, एक जलप्रपात-दर्शन मंच बनाया जाएगा, एक पगोड़ा शैली का विश्राम मंडप तैयार होगा और लगभग 1.5 किलोमीटर लंबा पैदल पथ विकसित किया जाएगा।

यह खबर केवल इतनी नहीं है कि कोरिया का एक शहर और पेड़ लगाने जा रहा है। असली कहानी इस बात में है कि वहां प्रशासन ‘वन’ को सिर्फ हरियाली नहीं, बल्कि रोजमर्रा के शहरी जीवन की बुनियादी सुविधा, जलवायु नीति का जमीन पर दिखने वाला रूप और स्थानीय पर्यटन की गुणवत्ता सुधारने वाले साधन के रूप में देख रहा है। भारत के पाठकों के लिए इसे ऐसे समझना आसान होगा जैसे किसी पहाड़ी झरने या झील के आसपास केवल रेलिंग और टिकट खिड़की लगाने के बजाय वहां सावधानी से पेड़, बैठने की जगह, पैदल मार्ग, छायादार विश्राम स्थल और प्राकृतिक दृश्य देखने के लिए तय बिंदु तैयार किए जाएं, ताकि वह स्थान ‘फोटो खिंचवाने का स्पॉट’ भर न रह जाए, बल्कि परिवार, बुजुर्ग, बच्चे और पर्यटक सबके लिए अनुभव का हिस्सा बने।

हमारे यहां अक्सर विकास और पर्यावरण को दो विरोधी खेमों की तरह पेश किया जाता है। सोग्वीपो की यह पहल बताती है कि यदि योजना संवेदनशील हो, तो प्रकृति की रक्षा, नागरिक सुविधा और स्थानीय अर्थव्यवस्था तीनों को एक साथ आगे बढ़ाया जा सकता है। जेजू पहले से ही दक्षिण कोरिया का प्रमुख पर्यटन क्षेत्र है, कुछ-कुछ वैसा ही जैसा भारत में गोवा, कश्मीर, ऊटी, मुन्नार या मेघालय के चुनिंदा हिस्से अपनी प्राकृतिक पहचान के कारण जाने जाते हैं। फर्क यह है कि वहां प्राकृतिक स्थलों को केवल पर्यटकों की दृष्टि से नहीं, स्थानीय समुदाय के दैनिक जीवन से जोड़ने की कोशिश भी साथ-साथ चल रही है।

यही कारण है कि एंगत्तो झरने के आसपास विकसित हो रहा यह शहरी वन केवल पेड़-पौधों का मामला नहीं, बल्कि शहरी नियोजन की एक ऐसी सोच है जिसमें जलवायु नीति रिपोर्टों और भाषणों से निकलकर लोगों के चलने, बैठने, देखने और सांस लेने के अनुभव में बदलती है। भारत में तेजी से गर्म होते शहरों, घटते सार्वजनिक हरित स्थलों और बेतरतीब पर्यटन विकास के बीच यह प्रयोग हमारे लिए भी प्रासंगिक हो जाता है।

‘जलवायु-उत्तरदायी शहरी वन’ का अर्थ क्या है, और यह क्यों महत्वपूर्ण है

कोरियाई प्रशासन ने इस परियोजना के लिए जिस शब्द का उपयोग किया है, उसका सीधा अर्थ है—ऐसा शहरी वन जो जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से निपटने में मदद करे और साथ ही नागरिकों के उपयोग का सार्वजनिक विश्राम क्षेत्र बने। यह समझना जरूरी है कि ‘जलवायु-उत्तरदायी’ और ‘शहरी वन’ यहां दो अलग-अलग विचार नहीं हैं। यह परियोजना इस मान्यता पर टिकी है कि शहरों के भीतर या शहर से लगे प्राकृतिक हरित क्षेत्र केवल सजावटी लैंडस्केप नहीं होते; वे तापमान कम करने, कार्बन सोखने, धूल और प्रदूषण कम करने, मानसूनी जलधारण बेहतर करने, जैव विविधता को सहारा देने और मानसिक स्वास्थ्य सुधारने जैसे कई कार्य करते हैं।

भारत में भी ‘अर्बन फॉरेस्ट’ या ‘नगर वन’ की अवधारणा अब नई नहीं रही। दिल्ली, हैदराबाद, बेंगलुरु, पुणे, इंदौर, अहमदाबाद और कई अन्य शहरों में इस दिशा में बातें होती रही हैं। लेकिन यहां समस्या अक्सर दो स्तरों पर सामने आती है—पहला, हरियाली को केवल पौधारोपण कार्यक्रम बनाकर छोड़ दिया जाता है; दूसरा, उसे नागरिक उपयोग, स्थानीय भूगोल और सांस्कृतिक संदर्भ से नहीं जोड़ा जाता। कोरिया की इस परियोजना में दिलचस्प बात यह है कि वहां पेड़ लगाने के साथ-साथ यह भी सोचा जा रहा है कि लोग उस वन को कैसे अनुभव करेंगे। यानी अगर शहर का निवासी या पर्यटक वहां पहुंचे, तो क्या वह सुरक्षित और सहज रूप से चल सकेगा? क्या उसे छांव मिलेगी? क्या वह कुछ देर बैठ सकेगा? क्या कोई ऐसा बिंदु होगा जहां से झरने को शांति से देखा जा सके? क्या यह जगह मौसम बदलने के साथ नए दृश्य देगी?

यह दृष्टिकोण इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि जलवायु संकट का अनुभव आम नागरिक अक्सर बहुत अमूर्त तरीके से करता है। ‘कार्बन उत्सर्जन’, ‘नेट-जीरो’, ‘अनुकूलन’, ‘सस्टेनेबिलिटी’ जैसे शब्द नीति दस्तावेजों में अच्छे लगते हैं, लेकिन रोजमर्रा के जीवन में उनका अनुवाद आसान नहीं होता। शहरी वन इस दूरी को कम करते हैं। जब कोई व्यक्ति गर्मी के दिनों में छायादार पथ पर चलता है, जब बच्चों को खेलने के लिए खुला लेकिन हरा सार्वजनिक क्षेत्र मिलता है, जब बुजुर्ग बिना भीड़भाड़ और शोर के कुछ समय बिता पाते हैं, तब जलवायु नीति किसी दूर की सरकारी योजना नहीं, बल्कि जीवन की गुणवत्ता का हिस्सा बन जाती है।

दक्षिण कोरिया में इस प्रकार की परियोजनाओं के लिए केंद्रीय और स्थानीय सरकार के साझा वित्त पोषण की व्यवस्था भी ध्यान देने योग्य है। सोग्वीपो की परियोजना में 50 प्रतिशत राष्ट्रीय सहायता बताती है कि वहां जलवायु और हरित अवसंरचना को केवल स्थानीय सौंदर्यीकरण नहीं, बल्कि सार्वजनिक नीति का हिस्सा माना जा रहा है। भारत में भी अगर राज्यों, नगरपालिकाओं और केंद्र के बीच अधिक समन्वित मॉडल बने, तो शहरी हरित क्षेत्र सिर्फ स्मारक-नुमा परियोजना न रहकर टिकाऊ सार्वजनिक संपत्ति बन सकते हैं।

यहां एक सांस्कृतिक पहलू भी समझना जरूरी है। कोरिया में सार्वजनिक स्थानों की योजना में ‘ठहरने’ का अनुभव महत्त्व रखता है। वहां पैदल चलने योग्य पथ, मौसमी फूलों की सज्जा, छोटे विश्राम मंडप, दृश्यावलोकन स्थल और सामुदायिक उपयोग की सुविधाएं आम तौर पर सोच-समझकर जोड़ी जाती हैं। भारतीय पाठकों के लिए ‘पगोड़ा’ शब्द कुछ अपरिचित हो सकता है। इस संदर्भ में यह एक सजावटी लेकिन उपयोगी खुला विश्राम मंडप है—कुछ-कुछ हमारे पार्कों या उद्यानों में बने छायादार मंडप, गज़ीबो या बैठकी स्थल जैसा, जहां लोग थोड़ी देर रुक सकें।

पहले चरण से दूसरे चरण तक: हरित अवसंरचना कैसे परत-दर-परत बनती है

इस परियोजना का दूसरा चरण अचानक शुरू नहीं हुआ। इसके पहले चरण का काम पिछले वर्ष पूरा किया जा चुका है, जिसमें लगभग 25 करोड़ वॉन के समतुल्य सार्वजनिक निवेश हुआ था और उसमें भी राष्ट्रीय सहायता 50 प्रतिशत थी। पहले चरण में 16 हजार से अधिक पेड़ लगाए गए, पैदल मार्ग, घास का खुला मैदान और एक पारंपरिक शैली का विश्राम स्थल जैसी सुविधाएं बनाई गईं। यदि पहले चरण को इस परियोजना की ‘बुनियाद’ कहा जाए, तो दूसरा चरण उसका विस्तार और गहनता है।

यहीं इस खबर की सबसे अहम प्रशासनिक सीख छिपी है। बड़े हरित क्षेत्र एक ही बार में नहीं, चरणबद्ध तरीके से बनते हैं। पहले मूल ढांचा तैयार होता है, फिर उपयोगिता बढ़ाई जाती है, फिर उसे स्थानीय पहचान से जोड़ा जाता है। एंगत्तो झरने के मामले में अब दूसरा चरण उस हरित क्षेत्र को झरने की प्राकृतिक पहचान के साथ अधिक सीधे ढंग से जोड़ रहा है। इसका परिणाम यह हो सकता है कि आगंतुक किसी एक ‘स्पॉट’ पर जाकर लौटने के बजाय कई पथों, दृश्य-बिंदुओं और ठहराव स्थलों से गुजरते हुए पूरे इलाके को अनुभव करे।

भारतीय संदर्भ में यह बात बहुत महत्वपूर्ण है। हमारे यहां कई पर्यटन स्थलों पर या तो अत्यधिक निर्माण कर दिया जाता है, जिससे मूल प्राकृतिक चरित्र बिगड़ जाता है, या फिर बिल्कुल न्यूनतम व्यवस्था छोड़ दी जाती है, जिससे भीड़, कचरा, अतिक्रमण और अव्यवस्था बढ़ती है। सोग्वीपो का मॉडल दिखाता है कि ‘हल्का लेकिन सोच-समझकर किया गया’ हस्तक्षेप सबसे कारगर हो सकता है। यदि किसी झरने, झील, पहाड़ी ढलान या जंगल किनारे के क्षेत्र को विकसित करना है, तो वहां भारी-भरकम कंक्रीट संरचनाएं खड़ी करने के बजाय पैदल पहुंच, दृश्य-निर्धारण, छाया, विश्राम और स्थानीय वनस्पति के माध्यम से अनुभव को बेहतर बनाया जा सकता है।

हरित अवसंरचना का मतलब सिर्फ इतना नहीं कि जमीन पर पेड़ खड़े हों। इसका मतलब है—लोग वहां तक पहुंच सकें, नियमित रूप से उपयोग कर सकें, मौसम के साथ उसका रिश्ता बना रहे, और प्रशासन रखरखाव के लिए जिम्मेदार ढांचा बनाए। कई भारतीय शहरों में पार्क तो बन जाते हैं, लेकिन उनमें या तो पर्याप्त छाया नहीं होती, या बैठने की जगह नहीं, या पैदल पथ ऐसे होते हैं कि बुजुर्गों के लिए उपयोग कठिन हो। इस दृष्टि से सोग्वीपो का यह विचार अधिक परिपक्व लगता है कि वन को ‘प्रयोगयोग्य’ बनाना उसकी दीर्घकालिक सफलता की शर्त है।

इस परियोजना की एक और खासियत है—यह स्थानीय भू-दृश्य को काटकर नया नकली दृश्य नहीं बनाती, बल्कि मौजूदा प्राकृतिक विरासत को शहरी जीवन से जोड़ती है। यानी जो चीज पहले से वहां की पहचान है—एंगत्तो झरना—उसी को केंद्र बनाकर उसके इर्द-गिर्द नया सार्वजनिक अनुभव रचा जा रहा है। भारत में भी अगर नगर नियोजन स्थानीय भूगोल को समझकर किया जाए, तो छोटे शहरों और पर्यटन नगरों का चरित्र अधिक संवेदनशील ढंग से विकसित किया जा सकता है।

झरने को केवल देखने की जगह नहीं, ठहरने की जगह बनाना

एंगत्तो झरने के आसपास दूसरे चरण की योजना का सबसे आकर्षक हिस्सा यह है कि वहां एक जलप्रपात-दर्शन मंच, थीम आधारित वनस्पति क्षेत्र, विश्राम मंडप और लंबा पैदल पथ विकसित किया जाएगा। सुनने में यह साधारण लग सकता है, लेकिन पर्यटन की भाषा में यह बड़ा बदलाव है। अब लक्ष्य यह नहीं कि पर्यटक आए, एक तस्वीर ले और आगे बढ़ जाए। लक्ष्य यह है कि वह वहां समय बिताए, आसपास की हरियाली को महसूस करे, मौसम के साथ दृश्य बदलते देखे, और स्थान के साथ एक स्मृति संबंध बना सके।

भारत में पर्यटन स्थलों की प्रतिस्पर्धा अब केवल ‘प्रसिद्ध दृश्य’ पर नहीं टिकती। लोग अनुभव चाहते हैं—साफ रास्ते, सुरक्षित पहुंच, बैठने की जगह, अच्छे दृश्य-बिंदु, पौधों और मौसम का बदलता रंग, परिवार के साथ कुछ देर रुकने की सुविधा, और ऐसा वातावरण जहां प्रकृति को बिना शोर-शराबे के देखा जा सके। यही कारण है कि देश के कई हिस्सों में बोर्डवॉक, लेकफ्रंट, रिवरफ्रंट, नेचर ट्रेल और व्यू-पॉइंट जैसे विचार लोकप्रिय हुए हैं। लेकिन इनका खतरा तब बढ़ता है जब विकास केवल इंस्टाग्राम-अनुकूल दृश्य तक सीमित रह जाता है। सोग्वीपो की परियोजना का दावा इससे आगे जाता है—वह प्रकृति की गरिमा बनाए रखते हुए ठहरने योग्य अनुभव बनाना चाहती है।

यहां ‘थीम वन’ की अवधारणा भी ध्यान देने योग्य है। कोरियाई नगर नियोजन में अक्सर ऐसे वनस्पति क्षेत्र बनाए जाते हैं जहां पेड़ों, फूलों या मौसमी प्रजातियों को किसी विशेष दृश्य, रंग या स्थानीय पहचान के अनुसार व्यवस्थित किया जाता है। भारतीय पाठकों के लिए इसे ऐसे समझा जा सकता है जैसे किसी शहर का उद्यान अमलतास, गुलमोहर, कचनार, चंपा, बांस या स्थानीय औषधीय वनस्पतियों के अलग-अलग खंडों के साथ डिजाइन किया जाए, ताकि वह केवल खाली हरित क्षेत्र न रहकर एक जीवित, बदलती हुई प्राकृतिक गैलरी बन सके।

एंगत्तो झरने को ‘देखने के स्थल’ से ‘रुकने के स्थल’ में बदलना इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे स्थानीय अर्थव्यवस्था पर असर पड़ता है। जब पर्यटक अधिक समय बिताता है, तो उसके खाने-पीने, स्थानीय परिवहन, स्मृति-चिह्न, आसपास की सेवाओं और अन्य गतिविधियों पर खर्च की संभावना बढ़ती है। दूसरे शब्दों में, ठहराव-आधारित पर्यटन स्थानीय समुदाय के लिए अधिक मूल्य पैदा कर सकता है। भारत के हिल स्टेशनों और प्राकृतिक पर्यटन स्थलों के लिए भी यह एक उपयोगी सबक है—गंतव्य की गुणवत्ता केवल होटल की संख्या से नहीं, सार्वजनिक स्थानों की गुणवत्ता से तय होती है।

इस पूरे विचार में एक सूक्ष्म मनोवैज्ञानिक पहलू भी है। आधुनिक शहरों में सार्वजनिक अवकाश का संकट गहराता जा रहा है। लोग या तो मॉल में जाते हैं, या फिर भीड़भाड़ वाले सीमित पार्कों में। प्रकृति के साथ धीमा, सुलभ और सम्मानजनक रिश्ता टूटता जाता है। यदि किसी शहर के भीतर या उसके आसपास ऐसा स्थान हो, जहां पानी, पेड़, पैदल रास्ता और दृश्य-स्थिरता एक साथ मिलें, तो वह मानसिक स्वास्थ्य के लिए भी अहम होता है। कोरिया की यह योजना इस मानवीय आयाम को समझती दिखती है।

1.8 लाख पेड़, 1.5 किलोमीटर पथ और कार्बन अवशोषण की राजनीति

इस परियोजना का सबसे अधिक ध्यान खींचने वाला आंकड़ा है—1.8 लाख से अधिक कार्बन-संग्रहण क्षमता वाले वृक्षों का रोपण। यह संख्या स्वाभाविक रूप से आकर्षक है, लेकिन इसे केवल ‘कितने पेड़’ के रूप में पढ़ना पर्याप्त नहीं होगा। असली प्रश्न है—किस प्रकार के पेड़, किस घनत्व पर, किस पारिस्थितिक तर्क के साथ, किस रखरखाव व्यवस्था में और किस दीर्घकालिक निगरानी के तहत लगाए जाएंगे। यदि ये सभी पहलू संतुलित हों, तभी ऐसा रोपण वास्तविक कार्बन अवशोषण और शहरी पारिस्थितिकी में योगदान देता है।

भारत में पौधारोपण अभियानों का अनुभव हमें सिखाता है कि संख्या का आकर्षण कई बार स्थायित्व पर भारी पड़ता है। लाखों पौधे लगाने की घोषणा होती है, लेकिन कुछ वर्ष बाद उनका बड़ा हिस्सा जीवित नहीं रहता। इसलिए सोग्वीपो की इस परियोजना का मूल्यांकन भी अंततः उसके रखरखाव, स्थानीय प्रजातियों की उपयुक्तता, जल प्रबंधन और मानवीय उपयोग के संतुलन से होगा। फिर भी, यह स्पष्ट है कि प्रशासन पेड़ लगाने को केवल प्रतीकात्मक कार्यक्रम नहीं, बल्कि जलवायु प्रतिक्रिया और सार्वजनिक अवसंरचना दोनों का केंद्रीय तत्व बना रहा है।

1.5 किलोमीटर लंबा पैदल पथ इस परियोजना का उतना ही महत्वपूर्ण हिस्सा है। पैदल पथ केवल चलने का साधन नहीं होता; वह किसी हरित क्षेत्र को जीवित बनाता है। बिना पथ के वन दर्शनीय हो सकता है, लेकिन सामाजिक रूप से सीमित रह जाता है। पथ लोगों को आमंत्रित करता है, गति को नियंत्रित करता है, दृश्य खोलता है, और स्थान का अनुभव क्रमबद्ध बनाता है। भारत के अनेक प्राकृतिक स्थलों में अनौपचारिक रास्तों के कारण मिट्टी कटान, पौधों को नुकसान और भीड़-जनित अव्यवस्था बढ़ती है। नियोजित पथ इस दबाव को नियंत्रित करने में मदद कर सकते हैं।

जलवायु परिवर्तन की राजनीति में अक्सर बड़े लक्ष्य सामने रखे जाते हैं—कार्बन न्यूट्रैलिटी, हरित संक्रमण, ऊर्जा बदलाव। लेकिन स्थानीय स्तर पर इन लक्ष्यों का अर्थ तभी बनता है जब शहर और कस्बे ठोस रूप में बदलते दिखें। एक छायादार पथ, एक जीवित वन, एक जलप्रपात-दर्शन मंच, एक बैठकी स्थल—ये सब मिलकर उस बड़े लक्ष्य की छोटी लेकिन ठोस अभिव्यक्तियां हैं। सोग्वीपो का प्रयोग बताता है कि जलवायु नीति को लोगों से जोड़ने के लिए तकनीकी भाषा से अधिक दृश्य और स्पर्शनीय सार्वजनिक स्थानों की जरूरत है।

यहां यह भी ध्यान देना चाहिए कि ऐसे वन स्थानीय तापमान को संतुलित करने, वर्षा जल के अवशोषण में मदद करने और पर्यटन-प्रधान क्षेत्रों में पर्यावरणीय दबाव कम करने की दिशा में उपयोगी हो सकते हैं। जेजू द्वीप समुद्री जलवायु, पर्यटन भार और पर्यावरणीय संवेदनशीलता—तीनों का संगम है। ऐसे में हरित क्षेत्र केवल सौंदर्य नहीं, लचीलापन भी प्रदान करते हैं। भारत के तटीय और पहाड़ी राज्यों—केरल, गोवा, सिक्किम, हिमाचल, उत्तराखंड, मेघालय—के लिए यह विमर्श विशेष रूप से प्रासंगिक है।

स्थानीय अर्थव्यवस्था, जीवन-गुणवत्ता और भारत के लिए सबक

सोग्वीपो प्रशासन का अनुमान है कि दूसरे चरण के पूरा होने के बाद एंगत्तो पार्क का यह जलवायु-उत्तरदायी शहरी वन लगभग 45 करोड़ वॉन के कुल निवेश वाला समेकित हरित परियोजना क्षेत्र बन जाएगा। पहले चरण के 25 और दूसरे चरण के 20—दोनों मिलकर एक ऐसा मॉडल तैयार करते हैं जिसमें पर्यावरण, नागरिक विश्राम और पर्यटन एक ही भू-भाग में एक-दूसरे के पूरक बनते हैं। यह छोटे या मध्यम शहरों के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण संकेत है। बड़े महानगरों की तुलना में ऐसे शहर सीमित संसाधनों के बावजूद अधिक फुर्तीले और प्रयोगधर्मी हो सकते हैं।

इस परियोजना का स्थानीय असर कई स्तरों पर पढ़ा जा सकता है। पहला, यह नागरिकों के लिए गुणवत्तापूर्ण सार्वजनिक स्थान बढ़ाती है। दूसरा, यह पर्यटकों को अधिक समय रुकने के लिए प्रेरित कर सकती है। तीसरा, यह जेजू की प्राकृतिक पहचान को और व्यवस्थित रूप से प्रस्तुत करती है। चौथा, यह जलवायु प्रतिक्रिया को दृश्य रूप देती है। पांचवां, यह दिखाती है कि विकास केवल बड़ी इमारतों, चौड़ी सड़कों या वाणिज्यिक परिसरों का नाम नहीं है; कभी-कभी सबसे प्रभावी निवेश वह होता है जो किसी शहर को रहने योग्य और याद रखने योग्य बनाता है।

भारत में इस समय दो समानांतर चुनौतियां दिखाई देती हैं। एक ओर शहरों में गर्मी, प्रदूषण और सार्वजनिक स्थानों की कमी बढ़ रही है। दूसरी ओर पर्यटन स्थलों पर अनियंत्रित निर्माण, वाहन दबाव, कचरा और प्राकृतिक क्षरण चिंता पैदा कर रहे हैं। ऐसे में सोग्वीपो की यह पहल हमें याद दिलाती है कि हरित अवसंरचना कोई विलासिता नहीं, बल्कि बुनियादी शहरी आवश्यकता है। यदि नगर निकाय, राज्य सरकारें और स्थानीय समुदाय मिलकर ऐसे मॉडल विकसित करें, तो झीलों, पहाड़ी पथों, नदी किनारों, झरनों, समुद्र तटों और शहरी किनारे के जंगलों को कहीं अधिक संवेदनशील ढंग से पुनर्जीवित किया जा सकता है।

यह भी सच है कि किसी भी देश का मॉडल हूबहू दूसरे देश पर नहीं चढ़ाया जा सकता। कोरिया की प्रशासनिक क्षमता, रखरखाव अनुशासन और सार्वजनिक उपयोग की संस्कृति भारतीय परिस्थितियों से अलग है। भारत में भूमि विवाद, बहु-एजेंसी प्रबंधन, अतिक्रमण, सीमित रखरखाव बजट और जनसंख्या घनत्व जैसी जटिलताएं अलग प्रकार की चुनौतियां पेश करती हैं। फिर भी, सिद्धांत वही रह सकता है—स्थानीय प्राकृतिक संपदा को नागरिकों के दैनिक जीवन से जोड़ा जाए, हरित क्षेत्र को उपयोग योग्य बनाया जाए, और पर्यटन विकास को प्रकृति के प्रति विनम्र रखा जाए।

सोग्वीपो की खबर अंततः हमें यही बताती है कि एक झरने के आसपास पेड़ लगाना भी बड़ी राजनीति का हिस्सा हो सकता है—यदि उसमें जलवायु, समुदाय और अनुभव तीनों को साथ रखा जाए। भारत के लिए यह एक समयोचित संकेत है। हमारे शहरों और कस्बों को शायद अब ऐसे ही सार्वजनिक स्थानों की जरूरत है, जहां विकास का अर्थ कंक्रीट की मात्रा नहीं, बल्कि छाया, हवा, पानी, पैदल चलने की सुविधा और मानवीय ठहराव की गुणवत्ता से तय हो। जेजू के इस प्रयोग को इसलिए केवल कोरिया की स्थानीय खबर समझना भूल होगी; यह एशिया के उन समाजों के लिए साझा सबक है जो तेजी से शहरी हो रहे हैं, गर्म हो रहे हैं, और फिर भी बेहतर जीवन की तलाश में हैं।

Source: Original Korean article - Trendy News Korea

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ