광고환영

광고문의환영

जापानी टीवी पर चमका जेजू: ‘गोडोकु नो गुरमे’ के चेहरे के साथ कोरिया का यह द्वीप एशियाई पर्यटन की नई कहानी क्यों लिख रहा ह

जापानी टीवी पर चमका जेजू: ‘गोडोकु नो गुरमे’ के चेहरे के साथ कोरिया का यह द्वीप एशियाई पर्यटन की नई कहानी क्यों लिख रहा ह

जेजू की तस्वीर अब सिर्फ पोस्टकार्ड नहीं, एक सांस्कृतिक कहानी है

दक्षिण कोरिया का जेजू द्वीप लंबे समय से अपने ज्वालामुखीय भू-दृश्य, समुद्री हवा, लोक-संस्कृति और विशिष्ट भोजन परंपरा के लिए जाना जाता रहा है। लेकिन इस बार जेजू को जिस ढंग से जापानी दर्शकों के सामने पेश किया जा रहा है, वह साधारण पर्यटन प्रचार से अलग है। कोरिया के जेजू प्रांत, कोरिया पर्यटन संगठन की फुकुओका शाखा, जेजू पर्यटन संगठन और जापान के क्यूशू क्षेत्र के प्रसारक आरकेबी माइनिची ब्रॉडकास्टिंग ने मिलकर एक घंटे का विशेष टीवी कार्यक्रम तैयार किया है, जिसमें जेजू की प्रकृति और खानपान को केंद्र में रखा गया है। इस कार्यक्रम का सबसे बड़ा आकर्षण जापानी अभिनेता मात्सुशिगे युताका हैं, जिन्हें दुनिया भर के एशियाई दर्शक लोकप्रिय जापानी सीरीज़ ‘गोडोकु नो गुरमे’ यानी ‘द सॉलिटरी गॉरमेट’ के चेहरे के रूप में पहचानते हैं।

भारतीय पाठकों के लिए यह समझना दिलचस्प होगा कि यह घटना महज एक प्रसारण नहीं, बल्कि सांस्कृतिक रणनीति का हिस्सा है। जैसे हमारे यहां किसी प्रसिद्ध यात्रा-प्रेमी अभिनेता या फूड शो के लोकप्रिय चेहरे को लेकर कश्मीर, कच्छ, कोडाईकनाल या मेघालय की कहानी कही जाए, तो दर्शक उस जगह को सिर्फ देखने भर की वस्तु नहीं, बल्कि अनुभव करने योग्य संसार मानने लगते हैं। ठीक वही काम जेजू के साथ किया जा रहा है। फर्क सिर्फ इतना है कि यहां मंच जापानी टेलीविजन है, विषय कोरियाई द्वीप है, और माध्यम वह अभिनेता है जिसकी छवि भोजन, अकेलेपन, शहर और रोजमर्रा की संवेदनाओं को जोड़ती रही है।

आज पर्यटन उद्योग में केवल ‘सुंदर जगह’ दिखा देना काफी नहीं होता। दर्शक यह जानना चाहता है कि वहां का स्वाद कैसा है, हवा कैसी है, लोग कैसे रहते हैं, और उस जगह की गति क्या है। जेजू को इस कार्यक्रम में ‘हीलिंग आइलैंड’ यानी ‘चिकित्सक-सरीखा सुकून देने वाला द्वीप’ के रूप में प्रस्तुत किया गया है। भारत में ‘हीलिंग’ शब्द आजकल योग रिट्रीट, आयुर्वेद, पहाड़ी प्रवास और माइंडफुलनेस जैसी अवधारणाओं के साथ जुड़ चुका है। इसलिए भारतीय नजर से देखें तो जेजू की यह छवि कुछ-कुछ ऋषिकेश की आध्यात्मिक शांति, केरल के वेलनेस पर्यटन, दार्जिलिंग की धीमी लय और अंडमान के समुद्री विस्तार के मिश्रण जैसी लगती है।

इस विशेष प्रसारण का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि यह कोरियाई वेव, या कहें हल्ल्यू, के अगले चरण की ओर इशारा करता है। अब कहानी सिर्फ के-पॉप, ड्रामा या ब्यूटी प्रोडक्ट्स तक सीमित नहीं है; अब कोरिया अपने क्षेत्रों, अपने स्थानीय भोजन, अपने प्राकृतिक भूगोल और अपनी दैनिक जीवन-संवेदना को भी निर्यात कर रहा है। जेजू इस नई सांस्कृतिक राजनीति का एक प्रभावशाली उदाहरण बनता दिख रहा है।

मात्सुशिगे युताका की मौजूदगी: जब एक अभिनेता जगह को विश्वसनीय बना देता है

इस कार्यक्रम की सबसे मजबूत संपत्ति मात्सुशिगे युताका की वह सार्वजनिक छवि है, जिसे उन्होंने ‘गोडोकु नो गुरमे’ के जरिए बरसों में गढ़ा है। इस सीरीज़ में भोजन कभी महज खाने की चीज नहीं होता; वह शहर का चरित्र, व्यक्ति की मनःस्थिति और रोजमर्रा के जीवन का शांत उत्सव बन जाता है। यही कारण है कि जब वही अभिनेता जेजू के भोजन, जंगलों और पहाड़ी दृश्यों को देखता-परखता है, तो दर्शक उस दृश्य पर सामान्य पर्यटन विज्ञापन की तुलना में कहीं अधिक भरोसा करता है।

भारत में इसका समांतर समझना हो, तो सोचिए यदि कोई ऐसा कलाकार, जिसे दर्शक भोजन और यात्रा की संवेदनशील समझ के लिए जानते हों, अचानक किसी क्षेत्रीय गंतव्य पर पहुंचे और वहां की स्थानीय थाली, बाजार, समुद्र या जंगल के साथ अपना रिश्ता बनाए। दर्शक को लगेगा कि वह केवल ‘स्पॉन्सर्ड विजुअल’ नहीं देख रहा, बल्कि एक परिचित व्यक्ति की नज़र से उस जगह को परख रहा है। यही मनोवैज्ञानिक भरोसा इस कार्यक्रम की असली ताकत है।

समाचार के अनुसार मात्सुशिगे युताका ने जेजू के प्रतीक माने जाने वाले सोंगसान इलचुलबोंग का दौरा किया, जिसे अंग्रेज़ी में ‘सनराइज़ पीक’ कहा जाता है। यह ज्वालामुखीय संरचना जेजू के सबसे पहचाने जाने वाले प्राकृतिक स्थलों में गिनी जाती है। इसके साथ उन्होंने सोग्वीपो हीलिंग फॉरेस्ट भी देखा, जो जेजू की उस छवि को पुष्ट करता है जिसमें जंगल, स्वच्छ हवा और धीमे कदमों वाली यात्रा शामिल है। कोरियाई संदर्भ में ‘हीलिंग’ सिर्फ चिकित्सा का शब्द नहीं, बल्कि मानसिक विश्राम, प्रकृति के बीच ठहराव और दैनिक तनाव से राहत का सांस्कृतिक विचार है। बीते दशक में कोरिया में ‘हीलिंग कंटेंट’ एक बड़ा ट्रेंड रहा है—ऐसे शो, संगीत, यात्रा वृत्तांत और कैफे संस्कृति, जो दर्शक को भावनात्मक आराम दें।

मात्सुशिगे की उपस्थिति इस पूरी परियोजना को भावनात्मक गहराई देती है। वह जेजू के भोजन को मेन्यू की सूची के रूप में नहीं, बल्कि पर्यावरण से उपजे जीवन-तरीके के रूप में पेश करते हैं। जब किसी द्वीप की ताजी सामग्री, समुद्री स्वाद, स्थानीय कृषि और मौसमी पकवान किसी परिचित अभिनेता के अनुभव से जुड़ते हैं, तो दर्शक को ऐसा लगता है कि वह जगह ‘घूमने’ के साथ-साथ ‘जीने’ लायक भी है। यही वह अंतर है जो पर्यटन प्रचार और सांस्कृतिक कथन के बीच रेखा खींचता है।

जापानी दर्शकों के लिए यह एक परिचित चेहरा है; भारतीय पाठकों के लिए यह समझना महत्वपूर्ण है कि पूर्वी एशिया में अभिनेता की व्यक्तिगत छवि अक्सर यात्रा गंतव्यों की स्वीकार्यता बदल देती है। जैसे के-ड्रामा के बाद किसी लोकेशन पर पर्यटकों की संख्या बढ़ जाती है, वैसे ही यहां एक जापानी ड्रामा स्टार कोरियाई द्वीप को ‘देखने लायक’ ही नहीं, ‘महसूस करने लायक’ बना रहा है।

जेजू को ‘हीलिंग आइलैंड’ बनाकर पेश करने की रणनीति क्या कहती है

जेजू को इस विशेष कार्यक्रम में ऐसे द्वीप के रूप में सामने लाया गया है जहां यूनेस्को विश्व प्राकृतिक धरोहर का गौरव, समुद्र की पन्ना-सी चमक, जंगलों की नमी, पहाड़ी दृश्य और स्थानीय स्वाद एक साथ मिलते हैं। 2007 में जेजू को यूनेस्को विश्व प्राकृतिक धरोहर सूची में शामिल किया गया था, और यह तथ्य उसके ब्रांड निर्माण का एक स्थायी आधार बन चुका है। लेकिन इस कार्यक्रम में जेजू को केवल ‘प्राकृतिक विरासत’ कहकर नहीं छोड़ा गया; इसे ऐसी जगह बताया गया है जहां प्रकृति और जीवन-शैली एक-दूसरे में घुली हुई हैं।

यह प्रस्तुति वैश्विक पर्यटन बाजार की बदलती भाषा को समझती है। पहले प्रचार सामग्री में अक्सर होटल, बीच, खरीदारी या सुविधा पर जोर दिया जाता था। अब शब्द बदल गए हैं—स्लो ट्रैवल, लोकल फूड, वेलनेस, स्टे, सेंसरी एक्सपीरियंस, माइंडफुल जर्नी। जेजू का यह कार्यक्रम इन्हीं कोड्स में बात करता है। वह कहता है कि इस द्वीप को केवल देखना नहीं, यहां ठहरना, चखना और सांस लेना है।

भारतीय संदर्भ में यह बदलाव बहुत परिचित है। पिछले कुछ वर्षों में घरेलू पर्यटन के भीतर भी ‘भाग-दौड़ से दूर’ यात्रा की मांग बढ़ी है। लोग अब छुट्टी को केवल दर्शनीय स्थलों की सूची पूरी करने के रूप में नहीं देखते; वे होमस्टे, स्थानीय व्यंजन, छोटी कॉफी शॉप, पैदल रास्ते, सूर्योदय बिंदु, जैविक खेती और क्षेत्रीय संस्कृति के साथ जुड़ना चाहते हैं। हिमाचल के छोटे गांव, उत्तराखंड के शांत ठिकाने, कूर्ग की कॉफी एस्टेट, सिक्किम के ईको-टूरिज्म मॉडल और गोवा के गांव-आधारित अनुभवों की लोकप्रियता इसी बदलती मानसिकता का हिस्सा है। जेजू भी खुद को इसी भाव में अनुवादित कर रहा है।

‘हीलिंग’ को एक निर्यात योग्य विचार बनाना भी दिलचस्प है। भाषा और देश बदल सकते हैं, पर आराम, शांति, प्रकृति, अच्छा भोजन और धीमा समय—ये लगभग सार्वभौमिक इच्छाएं हैं। इसीलिए जेजू का संदेश जापानी दर्शकों के लिए भी सुलभ है। उन्हें कोरियाई इतिहास या स्थानीय राजनीति की पूरी जानकारी न हो, तब भी वे समझ सकते हैं कि यह एक ऐसा द्वीप है जहां पहाड़, समुद्र, जंगल और भोजन मिलकर विश्राम का अनुभव रचते हैं।

इस तरह का सांस्कृतिक अनुवाद भविष्य के पर्यटन अभियानों की कुंजी है। यह वही सूत्र है जो किसी जगह को ‘बहुत विदेशी’ बनने से रोकता है और उसे ‘अगली यात्रा’ की श्रेणी में ले आता है। जेजू को बहुत दूर, बहुत कठिन, बहुत अलग बताने की बजाय यह कार्यक्रम उसे भावनात्मक रूप से सुलभ बनाता है। यही उसकी सबसे परिष्कृत रणनीति है।

सिर्फ भोजन नहीं, जीवनशैली: जेजू की मेज पर क्या परोसा जा रहा है

इस विशेष कार्यक्रम का दूसरा बड़ा स्तंभ है—मिशिक, यानी भोजन और खाद्य-संस्कृति। कोरियाई समाचार सारांश में बार-बार यह बात सामने आती है कि जेजू के ‘स्वच्छ’ या ‘शुद्ध’ स्थानीय अवयवों से बनी रसोई को कार्यक्रम ने प्रमुखता दी है। यहां भोजन को मेन्यू कार्ड की वस्तु के रूप में नहीं, बल्कि द्वीप की जलवायु, समुद्री पर्यावरण, कृषि और स्थानीय जीवन के विस्तार के रूप में देखा गया है। यह दृष्टिकोण आज की विश्व-स्तरीय फूड स्टोरीटेलिंग की पहचान बन चुका है।

भारत में भी अब ‘लोकल इज़ लक्ज़री’ का विचार मजबूत हो रहा है। बिहार की लिट्टी-चोखा, नागालैंड के धुएँदार मांसाहारी व्यंजन, कश्मीर के वज़वान, केरल का सीफूड, राजस्थान की बाजरे की परंपरा या पश्चिम बंगाल की नदी और समुद्र-आधारित रसोई को अब केवल ‘स्थानीय खाना’ नहीं, बल्कि सांस्कृतिक पूंजी के रूप में देखा जा रहा है। जेजू इसी भाषा में अपने भोजन को जापानी दर्शकों तक पहुंचा रहा है।

पूर्वी एशिया की फूड संस्कृति में ‘मौसमीपन’ और ‘स्थानीयता’ का बहुत महत्व है। कौन-सी सामग्री किस मौसम में सबसे अच्छी है, कौन-सा स्वाद किस क्षेत्र का प्रतिनिधि है, और किस भूगोल ने किस तरह की पाक-शैली पैदा की—ये बातें वहां के दर्शक गंभीरता से लेते हैं। ऐसे में जब मात्सुशिगे युताका जैसे अभिनेता जेजू के खाद्य अनुभव का मार्गदर्शन करते हैं, तो वह केवल स्वाद की प्रशंसा नहीं कर रहे होते, बल्कि एक सांस्कृतिक विश्वसनीयता को भी साथ ला रहे होते हैं।

कार्यक्रम का संकेत यह है कि जेजू का भोजन केवल खाने भर का सुख नहीं देता, वह द्वीप के वातावरण को समझने का जरिया है। समुद्र, पहाड़ और जंगलों से घिरा एक क्षेत्र अपनी रसोई में भी अपना भूगोल लेकर आता है। भारतीय यात्रियों के लिए यह बात बिल्कुल नई नहीं है—मालाबार की थाली और लद्दाख का भोजन अलग होगा, क्योंकि भूमि, मौसम और जीवन-तरीका अलग हैं। इसी तरह जेजू की खाद्य पहचान भी उसके पर्यावरण से उपजती है।

यहां ध्यान देने योग्य बात यह भी है कि भोजन पर्यटन अब सोशल मीडिया, यात्रा वृत्तांत और स्क्रीन संस्कृति के कारण अधिक प्रभावशाली हो चुका है। कोई एक डिश, कोई एक कैफे, कोई एक समुद्र-दृश्य या एक विशेष स्थानीय बाज़ार वायरल होकर पूरे क्षेत्र की पहचान बदल सकता है। जेजू के लिए यह कार्यक्रम ऐसे कई दृश्य-चिह्न तैयार करता है—भोजन की मेज, जंगल का रास्ता, समुद्र किनारे का विराम और अभिनेता की शांत प्रतिक्रिया। यही वे तत्व हैं जो भविष्य में दर्शकों की स्मृति में बार-बार लौटते हैं।

इगेता हिरोए और जेजू की ‘इमोशनल ट्रैवल’ छवि

इस कार्यक्रम में अभिनेत्री और प्रस्तोता इगेता हिरोए की भागीदारी भी महत्वपूर्ण है। यदि मात्सुशिगे युताका जेजू के गहरे, धीमे, स्वाद-प्रधान और चिंतनशील पक्ष का प्रतिनिधित्व करते हैं, तो इगेता हिरोए उसकी उजली, हल्की, धूपभरी और भावनात्मक यात्रा छवि को सामने लाती हैं। समाचार के अनुसार उन्होंने जेजू के पन्ना-हरे समुद्र, धूप और अनुभव-आधारित यात्रा को दर्शाया, साथ ही उन कैफे स्थलों का भी परिचय कराया जो आज के जेजू पर्यटन का आधुनिक चेहरा बन चुके हैं।

भारतीय पाठकों के लिए यह समझना उपयोगी है कि कोरिया और जापान दोनों में ‘कैफे संस्कृति’ अब सामान्य शहरी आदत भर नहीं रही। यह सौंदर्यबोध, फोटोग्राफी, धीमे समय, व्यक्तिगत स्पेस और स्थानीय डिजाइन की दुनिया बन चुकी है। जेजू में कैफे अक्सर ऐसे स्थान होते हैं जहां लोग सिर्फ कॉफी पीने नहीं जाते; वे समुद्र को देखने, इमारत की डिजाइन महसूस करने, तस्वीरें लेने, संगीत सुनने और कुछ समय बस रहने जाते हैं। यह अनुभव भारत के शहरी युवाओं को भी परिचित लगेगा—जयपुर के डिजाइन-कैफे, बेंगलुरु की कॉफी संस्कृति, गोवा के बीच-कैफे, शिलांग के शांत संगीत-कैफे या मुंबई के आर्ट-कैफे में इसी तरह का ‘स्पेस कंजम्प्शन’ देखा जाता है।

इगेता की भूमिका इसीलिए अहम है क्योंकि वह जेजू की उस परत को दिखाती हैं जो युवा यात्रियों, सोशल मीडिया-प्रेरित दर्शकों और अनुभव-आधारित पर्यटन चाहने वालों के लिए सबसे आकर्षक हो सकती है। समुद्र, धूप, कैफे और हल्की-फुल्की अनुभव यात्रा—ये सब मिलकर जेजू को केवल प्राकृतिक धरोहर या शांत विश्राम स्थल नहीं रहने देते, बल्कि उसे समकालीन जीवन-शैली का हिस्सा बना देते हैं।

आज के पर्यटन अभियानों में यह दोहरी संरचना अक्सर सफल मानी जाती है: एक ओर गहराई, परंपरा, प्रकृति और भोजन; दूसरी ओर दृश्यात्मकता, कैफे, फोटोजेनिक स्पॉट, अनुभव और हल्का रोमांच। जेजू कार्यक्रम में यही संतुलन बनाया गया है। मात्सुशिगे और इगेता एक तरह से दो अलग कैमरों की तरह काम करते हैं—एक धीमे स्वाद और विचार का कैमरा, दूसरा उजले मूड और भावनात्मक दृश्यता का कैमरा। परिणाम यह होता है कि जेजू किसी एक वर्ग के दर्शक तक सीमित नहीं रहता।

यह मॉडल भारतीय पर्यटन प्रचारकों के लिए भी सीखने योग्य है। जब कोई क्षेत्र केवल विरासत या केवल मनोरंजन पर निर्भर रहता है, तो उसकी पहुंच सीमित हो सकती है। लेकिन जब वह भोजन, प्रकृति, आधुनिकता, दृश्य-संवेदना और डिजिटल साझा-योग्यता को एक साथ जोड़ता है, तो उसकी अपील कहीं व्यापक हो जाती है।

क्यूशू से जेजू तक: भौगोलिक निकटता और सांस्कृतिक दूरी को कम करने का माध्यम

इस कार्यक्रम का प्रसारण जापान के क्यूशू क्षेत्र के दर्शकों के लिए किया जाना भी महत्वपूर्ण है। क्यूशू, जापान का वह प्रमुख क्षेत्र है जो भौगोलिक रूप से कोरिया के अपेक्षाकृत करीब माना जाता है। यात्रा मनोविज्ञान के स्तर पर यह निकटता महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। बहुत दूर के किसी देश की तुलना में अपेक्षाकृत निकट स्थित गंतव्य को दर्शक ‘संभव यात्रा’ की श्रेणी में जल्दी रखता है। जेजू का जापानी क्षेत्रीय चैनल पर आना इसी मानसिक दूरी को कम करता है।

भारतीय अनुभव में भी हम यह देखते हैं कि पड़ोसी या निकटवर्ती देशों को लेकर पर्यटन कल्पना अलग होती है। नेपाल, भूटान, श्रीलंका, थाईलैंड या बाली जैसे गंतव्यों की लोकप्रियता में केवल सुंदरता नहीं, बल्कि मनोवैज्ञानिक उपलब्धता भी भूमिका निभाती है। पूर्वी एशिया में जेजू, खासकर जापान के कुछ हिस्सों के लिए, ऐसा ही गंतव्य बन सकता है—बहुत दूर नहीं, पर इतना अलग कि आकर्षक लगे।

समाचार के अनुसार कार्यक्रम की शूटिंग 24 अप्रैल से 2 मई के बीच जेजू के विभिन्न हिस्सों में हुई। यह विवरण छोटा लग सकता है, पर इसका अर्थ बड़ा है। जब कोई कार्यक्रम केवल एक-दो प्रसिद्ध स्थलों तक सीमित नहीं रहता, तब वह क्षेत्र की व्यापकता दिखाने में सफल होता है। इससे जेजू की छवि केवल ‘एक सुंदर फोटो स्पॉट’ तक सीमित नहीं रहती, बल्कि एक बहुस्तरीय द्वीप के रूप में उभरती है जहां अलग-अलग अनुभव मौजूद हैं।

टेलीविजन प्रसारण के बाद इस कार्यक्रम को आरकेबी माइनिची ब्रॉडकास्टिंग के आधिकारिक न्यूज़ यूट्यूब चैनल पर भी उपलब्ध कराया जाएगा। यह कदम डिजिटल युग के लिहाज से अत्यंत निर्णायक है। अब किसी कार्यक्रम का प्रभाव केवल निर्धारित प्रसारण स्लॉट तक सीमित नहीं रहता। क्लिप, शॉर्ट वीडियो, फूड कट, समुद्र-दृश्य, अभिनेता की प्रतिक्रियाएं—ये सब सोशल मीडिया और वीडियो प्लेटफॉर्म पर नई ज़िंदगी पाते हैं। एक बार डिजिटल स्पेस में प्रवेश करने के बाद कोई पर्यटन छवि धीरे-धीरे, पर लगातार फैल सकती है।

यही कारण है कि इस तरह के अभियानों की सफलता का आकलन केवल तत्काल टिकट बिक्री या होटल बुकिंग से नहीं किया जा सकता। असल असर तब बनता है जब दर्शक के मन में किसी जगह को लेकर एक वांछनीय, दोहराने योग्य, साझा करने योग्य छवि बैठ जाए। जेजू इस दिशा में एक और कदम बढ़ाता दिख रहा है।

के-कॉन्टेंट का अगला चरण: ड्रामा और पॉप से आगे, क्षेत्रीय कोरिया की ओर

दुनिया भर में के-पॉप और के-ड्रामा की सफलता के बाद अब दक्षिण कोरिया की सांस्कृतिक पहुंच नए आयाम तलाश रही है। पहले वैश्विक दर्शकों को कोरियाई संगीत, फैशन, स्किनकेयर और सीरीज़ ने आकर्षित किया। फिर भोजन—किम्ची, राम्योन, कोरियन बारबेक्यू, स्ट्रीट फूड—ने प्रवेश किया। अब क्षेत्रीय पर्यटन, स्थानीय परिदृश्य, छोटे शहरों और विशेष द्वीपीय या पर्वतीय पहचान की बारी है। जेजू का यह जापानी टीवी कार्यक्रम इसी क्रम की स्वाभाविक अगली सीढ़ी है।

यहां ध्यान देने योग्य बात यह है कि किसी भी देश की ‘सॉफ्ट पावर’ तब परिपक्व मानी जाती है जब वह केवल अपनी राजधानी, बड़े शहरों या सुपरस्टार उत्पादों के सहारे नहीं, बल्कि अपने क्षेत्रों की कहानियों के सहारे भी आकर्षण पैदा कर सके। भारत की तरह कोरिया भी इस चुनौती को समझता है। जैसे हमारे यहां वाराणसी, कच्छ, स्पीति, माजुली, जयपुर, चेन्नई, हम्पी, अल्लेप्पी और मेघालय—सब भारत की एक-एक अलग सांस्कृतिक खिड़की हैं, वैसे ही कोरिया के लिए जेजू एक विशिष्ट खिड़की है।

जेजू का महत्व यह भी है कि वह कोरिया की मुख्यभूमि से थोड़ा अलग भाव-बोध रखता है। वह केवल सियोल का विस्तार नहीं है। उसकी अपनी बोली, लोक-परंपराएं, महिला गोताखोरों की प्रसिद्ध ‘हैन्यो’ परंपरा, समुद्री रसोई, प्राकृतिक धरोहर और द्वीपीय जीवनशैली उसे अलग पहचान देती है। भारतीय पाठकों के लिए हैन्यो का उल्लेख विशेष रुचि का विषय हो सकता है—ये वे पारंपरिक महिला गोताखोर हैं जो समुद्र में उतरकर समुद्री संसाधन जुटाती रही हैं। यह जेजू की सांस्कृतिक विशिष्टता का एक प्रमुख प्रतीक है, हालांकि इस विशेष टीवी कार्यक्रम का केंद्र उससे आगे बढ़कर प्रकृति और खाद्य अनुभव पर है।

के-कॉन्टेंट का विस्तार अब इसी तरह हो रहा है—किसी मशहूर अभिनेता के जरिए, किसी यात्रा कार्यक्रम के जरिए, किसी लोकप्रिय स्ट्रीमिंग लोकेशन के जरिए, या किसी ऐसे खाद्य अनुभव के जरिए जो स्क्रीन से बाहर निकलकर पर्यटन में बदल सके। यह प्रक्रिया भारतीय दर्शकों के लिए भी समझने योग्य है, क्योंकि हमने भी देखा है कि फिल्मों और वेब सीरीज़ के बाद कई स्थान अचानक लोकप्रिय हो जाते हैं। फर्क बस इतना है कि कोरिया इस संबंध को अधिक संगठित, संस्थागत और अंतरराष्ट्रीय रूप से नियोजित रूप में इस्तेमाल कर रहा है।

भारतीय नज़र से जेजू: क्या यह एशियाई पर्यटन का नया साझा सपना बन सकता है?

भारत में कोरियाई संस्कृति के प्रति रुचि पिछले दशक में लगातार बढ़ी है। पहले के-ड्रामा और के-पॉप ने शहरी युवाओं को आकर्षित किया, फिर ब्यूटी और फैशन का प्रभाव आया, और अब भोजन तथा यात्रा के प्रति जिज्ञासा भी बढ़ रही है। इस माहौल में जेजू की ऐसी प्रस्तुति भारतीय दर्शकों के लिए भी रोचक संकेत देती है। यह संभव है कि जापानी दर्शकों के लिए तैयार कार्यक्रम की चर्चा आगे चलकर व्यापक एशियाई डिजिटल स्पेस में पहुंचे और वहां से भारतीय कोरिया-रुचि रखने वाले दर्शकों तक भी आए।

जेजू का आकर्षण भारतीय मन के लिए कई स्तरों पर काम कर सकता है। एक, यह एक द्वीपीय गंतव्य है, और भारतीय यात्री समुद्र-आधारित अवकाश स्थलों से परिचित हैं। दो, इसमें प्रकृति और भोजन का ऐसा संयोजन है जो अब भारतीय मध्यवर्गीय और युवा यात्रियों को खूब पसंद आता है। तीन, इसकी ब्रांडिंग ‘हीलिंग’ के रूप में की जा रही है, जो महामारी के बाद की दुनिया में और भी प्रभावी शब्द बन चुका है। चार, इसके साथ स्क्रीन संस्कृति का जुड़ाव है—यानी वह अनुभव जिसे लोग पहले देखेंगे, फिर चाहेंगे, फिर साझा करेंगे।

यहां एक दिलचस्प भारतीय संदर्भ भी याद किया जा सकता है। हाल के वर्षों में भारतीय कलाकारों और प्रोडक्शनों की कोरिया में मौजूदगी बढ़ी है, और जेजू भी कभी-कभार ऐसी खबरों में आता रहा है। इससे भारतीय पाठकों के लिए यह द्वीप केवल कोरियाई मानचित्र का एक दूरस्थ नाम नहीं रहता, बल्कि एक सांस्कृतिक संपर्क-बिंदु बनता है। जब कोई जगह बार-बार संगीत, सिनेमा, यात्रा और भोजन की खबरों में आए, तो वह धीरे-धीरे कल्पना का हिस्सा बन जाती है।

पर असली प्रश्न यह है कि क्या जेजू एशिया के साझा पर्यटन सपने में बदल सकता है? इसका उत्तर काफी हद तक हां में दिखाई देता है। उसके पास प्राकृतिक दृश्य हैं, मजबूत दृश्यात्मक पहचान है, भोजन है, विश्व धरोहर का तमगा है, कैफे संस्कृति है, और अब ऐसे चेहरे भी हैं जो विभिन्न देशों के दर्शकों को उससे भावनात्मक रिश्ता बनाने में मदद कर सकते हैं। यदि कोरियाई संस्थाएं इसी तरह सुविचारित साझेदारियों के माध्यम से क्षेत्रीय कथाओं को अंतरराष्ट्रीय मंच देती रहीं, तो जेजू केवल कोरिया का लोकप्रिय द्वीप नहीं, बल्कि एशियाई सांस्कृतिक पर्यटन का एक प्रमुख प्रतीक बन सकता है।

इस खास कार्यक्रम की खबर हमें एक बड़ी बात समझाती है: आज पर्यटन सिर्फ टिकट, होटल और सुंदर दृश्य का मामला नहीं रहा। वह कहानी कहने की कला है। और जब इस कहानी में एक लोकप्रिय अभिनेता, स्थानीय भोजन, प्राकृतिक विरासत, कैफे संस्कृति, डिजिटल प्लेटफॉर्म और भावनात्मक भाषा एक साथ आ जाएं, तो एक द्वीप किसी नक्शे की जगह नहीं, बल्कि चाहत की जगह बन जाता है। जेजू के साथ इस समय ठीक यही हो रहा है।

Source: Original Korean article - Trendy News Korea

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ