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दक्षिण कोरिया के गंगनेउंग समुद्रतट पर लहरों का कहर: बचाव तंत्र सक्रिय रहा, फिर भी एक जान नहीं बच सकी

दक्षिण कोरिया के गंगनेउंग समुद्रतट पर लहरों का कहर: बचाव तंत्र सक्रिय रहा, फिर भी एक जान नहीं बच सकी

गंगनेउंग के समुद्रतट से उठता एक बड़ा सवाल

दक्षिण कोरिया के पूर्वी तट पर बसे गंगनेउंग शहर के यंगजिन समुद्रतट पर 6 जून की सुबह घटी एक दुखद घटना ने फिर यह याद दिलाया है कि समुद्र कभी पूरी तरह अनुमान के भीतर नहीं आता। स्थानीय समय के अनुसार सुबह 5 बजकर 9 मिनट पर सूचना मिली कि दो महिलाएं लहरों की चपेट में आकर बह गई हैं। कोरियाई तटरक्षक बल ने तुरंत बचाव अभियान शुरू किया, दोनों को पानी से बाहर निकाला भी गया, लेकिन उनमें से एक, लगभग 30 वर्ष आयु की महिला, अंततः बच नहीं सकी। दूसरी महिला को जीवित निकाल लिया गया। देखने में यह कुछ पंक्तियों की दुर्घटना-खबर लग सकती है, पर इसके भीतर सार्वजनिक सुरक्षा, त्वरित बचाव, समुद्री जोखिम और आधुनिक राज्य की सीमाओं तक कई परतें छिपी हैं।

भारतीय पाठकों के लिए यह खबर इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि हमारे यहां भी पुरी, मुंबई, गोवा, चेन्नई, विशाखापत्तनम, दीघा या कन्याकुमारी जैसे समुद्रतटीय इलाकों में हर साल ऐसी घटनाएं सामने आती रहती हैं। कभी पर्यटक सेल्फी लेते-लेते तेज लहरों में फंस जाते हैं, कभी तैराकी का गलत अनुमान जानलेवा साबित होता है, और कभी समुद्र की सतह शांत दिखने के बावजूद भीतर का बहाव शरीर को पल भर में खींच लेता है। दक्षिण कोरिया जैसी तकनीकी रूप से सक्षम और उच्च-प्रशिक्षित आपदा-प्रतिक्रिया व्यवस्था वाले देश में भी अगर समय पर पहुंचने के बावजूद जान न बच सके, तो यह हमें बताता है कि समुद्री हादसों में कुछ मिनट नहीं, कई बार कुछ सेकंड ही निर्णायक होते हैं।

कोरिया में 6 जून एक राष्ट्रीय अवकाश का दिन भी होता है। इस कारण यह घटना केवल एक स्थानीय दुर्घटना नहीं रह जाती, बल्कि सार्वजनिक अवकाश, तटीय घूमने-फिरने की संस्कृति और नागरिक सुरक्षा के सवाल से जुड़ जाती है। भारत में जैसे किसी त्योहार, लंबे वीकेंड या राष्ट्रीय अवकाश के दिन भीड़भाड़ वाले धार्मिक स्थलों, पहाड़ी सड़कों या समुद्रतटों पर जोखिम बढ़ जाता है, उसी तरह कोरिया में भी छुट्टी वाले दिनों में सार्वजनिक स्थानों पर सुरक्षा का अर्थ केवल व्यवस्था बनाए रखना नहीं, बल्कि संभावित खतरे को पहले से पहचानना भी है।

इस घटना का सबसे पीड़ादायक पक्ष यह है कि बचाव हुआ, लेकिन परिणाम दोनों के लिए एक जैसा नहीं रहा। यही वह बिंदु है जो इस खबर को साधारण दुर्घटना-रिपोर्ट से उठाकर सामाजिक महत्व की खबर बनाता है। राज्य की मशीनरी सक्रिय हुई, सूचना प्रणाली ने काम किया, स्थानीय तटरक्षक इकाई मौके पर पहुंची, रस्सियों के सहारे पानी में उतरकर दोनों को निकाला गया, प्राथमिक उपचार दिया गया, एम्बुलेंस से अस्पताल भेजा गया; फिर भी एक जीवन हाथ से फिसल गया। यह बताता है कि सार्वजनिक तंत्र का काम करना और जीवन का बच जाना, दोनों हमेशा एक ही बात नहीं होते।

सुबह 5 बजकर 9 मिनट: कुछ मिनटों में कैसे बदल गई तस्वीर

उपलब्ध जानकारी के अनुसार, दुर्घटना की सूचना सुबह 5:09 पर मिली। स्थान स्पष्ट था—गंगवोन प्रांत के गंगनेउंग शहर का यंगजिन समुद्रतट। यह शुरुआती सूचना ही समुद्री बचाव में अत्यंत महत्वपूर्ण होती है, क्योंकि समय और सटीक स्थान, दोनों मिल जाएं तो प्रतिक्रिया तेज हो सकती है। भारतीय संदर्भ में भी राष्ट्रीय आपदा मोचन बल, तटरक्षक, पुलिस या स्थानीय लाइफगार्ड के लिए सबसे बड़ी चुनौती अक्सर यही होती है कि हादसा कहां और कब हुआ, इसका पता देर से चलता है। इस मामले में कम से कम सूचना मिलने में शुरुआती देरी दिखाई नहीं देती।

रिपोर्ट के मुताबिक, तटरक्षक बल के पहुंचने के बाद जुमुंजिन थाने की तटीय गश्ती टीम ने बचाव-रस्सियों जैसे उपकरणों का इस्तेमाल करते हुए सीधे पानी में उतरकर दोनों महिलाओं को बाहर निकाला। यह विवरण महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे पता चलता है कि हालात ऐसे थे जिन्हें केवल किनारे से खड़े होकर नियंत्रित नहीं किया जा सकता था। कई बार समुद्री लहरें देखने वालों को कम खतरनाक लगती हैं, लेकिन उनका खिंचाव, तली का ढलान और बार-बार लौटती लहरें शरीर को संतुलन खोने पर मजबूर कर देती हैं। एक बार व्यक्ति गिर गया, तो अगली लहर और वापसी का पानी उसे और दूर धकेल सकता है।

यही वजह है कि समुद्री दुर्घटनाओं में ‘डूबना’ हमेशा किसी फिल्मी दृश्य की तरह लंबे संघर्ष का नाम नहीं होता। कई मामलों में यह बहुत तेज, बहुत चुप और बहुत कम समय में घटता है। उपलब्ध जानकारी बताती है कि जब दोनों को निकाला गया, तब उनमें से एक महिला अचेत अवस्था में थी और उसका हृदय काम नहीं कर रहा था। तटरक्षक बल ने मौके पर ही हृदय-फेफड़ा पुनर्जीवन यानी सीपीआर जैसी आपात चिकित्सा दी, फिर उसे 119 एम्बुलेंस के जरिए अस्पताल पहुंचाया गया, लेकिन डॉक्टर उसे बचा नहीं सके। कोरिया में 119 वह आपात सेवा नंबर है, जिसे भारत में 108 या 112 जैसी सेवाओं की तरह समझा जा सकता है।

घटना का यह क्रम बेहद संक्षिप्त है, लेकिन इसी संक्षिप्तता में उसका भयावह अर्थ छिपा है। सूचना, रवाना होना, मौके पर पहुंचना, पानी में उतरना, दोनों को बाहर लाना, प्राथमिक उपचार, अस्पताल—सब कुछ हुआ। फिर भी एक जीवन समाप्त हो गया। इससे यह समझना जरूरी है कि समुद्री सुरक्षा का अर्थ केवल ‘बचाव दल मौजूद है’ नहीं, बल्कि ‘व्यक्ति किस अवस्था में बचाव तक पहुंचा’ भी है। यदि पानी में बह जाने के बाद कुछ मिनट तक सांस रुक गई, या शरीर ने अत्यधिक पानी निगल लिया, या ठंडे पानी और घबराहट का असर तेजी से बढ़ा, तो तंत्र के सक्रिय होने के बावजूद परिणाम दुखद हो सकता है।

कोरियाई तटीय सुरक्षा तंत्र क्या है और यह क्यों मायने रखता है

भारतीय पाठकों के लिए यह समझना उपयोगी होगा कि दक्षिण कोरिया में तटीय सुरक्षा और समुद्री कानून-व्यवस्था की जिम्मेदारी मुख्य रूप से कोरिया कोस्ट गार्ड यानी तटरक्षक बल निभाता है। यह संस्था भारत के तटरक्षक बल, समुद्री पुलिस और स्थानीय आपदा तंत्र के बीच की कुछ साझा भूमिकाओं जैसी लग सकती है। हादसे की स्थिति में स्थानीय स्टेशन, गश्ती इकाई, आपात चिकित्सा सेवा और अस्पतालों के बीच समन्वय तेज गति से स्थापित किया जाता है। इस मामले में भी यही हुआ—सूचना मिलते ही स्थानीय तटीय इकाई सक्रिय हुई, गश्ती टीम ने मौके पर भौतिक बचाव किया, फिर 119 आपात चिकित्सा व्यवस्था से अस्पताल तक पहुंचाने की प्रक्रिया चली।

समाचार का एक अहम पहलू यह है कि बचाव केवल तकनीकी आदेश भर नहीं रहा, बल्कि बचावकर्मी स्वयं पानी में उतरे। समुद्रतटीय दुर्घटनाओं में यह निर्णय आसान नहीं होता। लहरों की दिशा, हवा, पानी की गहराई, नीचे की सतह, बहाव की तीव्रता और पीड़ित की स्थिति—इन सबका अनुमान कुछ ही क्षणों में लगाना पड़ता है। भारत में भी प्रशिक्षित लाइफगार्ड अक्सर यही बताते हैं कि घबराए हुए व्यक्ति तक पहुंचना उतना ही जोखिम भरा हो सकता है जितना समुद्र का बहाव, क्योंकि डूबता हुआ व्यक्ति कई बार बचाने वाले को भी जकड़ लेता है। इसीलिए रस्सियां, फ्लोटेशन उपकरण और कोण बनाकर पहुंचने की पद्धति जैसी तकनीकें इस्तेमाल की जाती हैं।

यह खबर एक और बात दिखाती है—सार्वजनिक सुरक्षा तंत्र का मूल्य केवल तब समझ में आता है जब घटना हो चुकी हो। सामान्य दिनों में तटीय गश्त, रेडियो संचार, उपकरण, प्रशिक्षण, प्रतिक्रिया-समय और स्थानीय भूगोल की समझ जैसे विषय लोगों की नजर में नहीं आते। पर हादसे के क्षण में यही सब किसी जीवन और मृत्यु के बीच का अंतर बन जाते हैं। यहां भी एक महिला को बचा लिया गया; इसका अर्थ है कि तंत्र निष्क्रिय नहीं था। लेकिन दूसरी महिला की मृत्यु हमें यह भी बताती है कि प्रतिक्रिया प्रणाली की उपस्थिति, दुर्घटना के हर भौतिक परिणाम को पलट देने की गारंटी नहीं होती।

भारत में जब हम आपदा या दुर्घटना के बाद प्रशासन की आलोचना करते हैं, तो प्रायः दो अतियों में चले जाते हैं—या तो मान लेते हैं कि पूरा तंत्र विफल रहा, या फिर यह सोच लेते हैं कि चूंकि प्रतिक्रिया हुई, इसलिए व्यवस्था पूरी तरह सफल है। गंगनेउंग की यह घटना इन दोनों के बीच का यथार्थ सामने रखती है। बचाव हुआ, लेकिन हानि भी हुई। यानी राज्य की क्षमता और प्रकृति की हिंस्रता, दोनों एक साथ मौजूद थे। यही किसी भी गंभीर सामाजिक रिपोर्टिंग का मूल बिंदु होना चाहिए।

एक ही हादसे में दो अलग नतीजे: समुद्री दुर्घटनाएं इतनी क्रूर क्यों होती हैं

इस घटना का सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि दोनों महिलाएं एक ही समय, एक ही समुद्रतट और लगभग एक जैसी परिस्थिति में लहरों की चपेट में आईं, लेकिन परिणाम अलग निकला। इसका मतलब यह नहीं कि एक के लिए भाग्य अच्छा और दूसरी के लिए खराब था; बल्कि यह बताता है कि समुद्री दुर्घटनाओं में शरीर की स्थिति, बहाव के बीच बीता समय, पानी का प्रवेश, घबराहट, ठंड और बचाव तक पहुंचने के सेकंड भी निर्णायक होते हैं। यही समुद्र की क्रूरता है—वह समान परिस्थितियों में भी असमान परिणाम देता है।

भारतीय समुद्रतटों पर जाने वाले लोग अक्सर लहरों की ऊंचाई को ही जोखिम मान लेते हैं। लेकिन वास्तविक खतरा कई बार लहर की ऊंचाई में नहीं, उसके लौटने की ताकत में होता है। इसे सरल भाषा में ऐसे समझा जा सकता है: समुद्र का पानी जब तेजी से किनारे की ओर आता है, तो व्यक्ति को धक्का लगता है; और जब वही पानी वापस जाता है, तो पैरों के नीचे की रेत खिसकती है तथा शरीर संतुलन खो देता है। यदि वहां गहराई अचानक बढ़ती हो या साइड करंट यानी तिरछा बहाव हो, तो व्यक्ति को किनारे की सीध से बाहर खींचा जा सकता है। कोरिया के पूर्वी तट के कई हिस्सों में लहरें आकर्षक दिखती हैं, लेकिन उनका झटका बहुत तेज हो सकता है।

यही कारण है कि अनुभवी तैराक भी हमेशा सुरक्षित नहीं होते। समुद्र, स्विमिंग पूल नहीं है; वहां पानी स्थिर नहीं रहता, और हर लहर पिछले क्षण को बदल देती है। दुर्घटना की खबरों में जब लिखा जाता है कि कोई ‘लहरों में बह गया’, तो यह वाक्य कई पाठकों को साधारण लग सकता है। पर वास्तव में इसका अर्थ होता है कि उस व्यक्ति पर एक साथ कई शक्तियां काम कर रही थीं—शरीर की थकान, दिशा का भ्रम, सांस का टूटना, घबराहट का बढ़ना, और बचाव-समय का सिकुड़ना। गंगनेउंग की घटना इसी सच्चाई का कठोर उदाहरण है।

एक महिला के जीवित बच जाने का अर्थ यह भी है कि बचाव दल की तत्परता ने कम से कम अतिरिक्त त्रासदी रोकी। यदि प्रतिक्रिया में देरी होती, तो संभव था कि दोनों की जान जाती। इसलिए यह खबर केवल मृत्यु की नहीं, बल्कि संकट-प्रबंधन की भी खबर है। यह दोहरी सच्चाई भारतीय पाठकों के लिए समझना जरूरी है: किसी हादसे में मौत हुई हो, तब भी यह जरूरी नहीं कि बचाव असफल रहा; और किसी को बचा लिया गया हो, तब भी यह मान लेना गलत होगा कि खतरा मामूली था।

छुट्टी, समुद्रतट और सार्वजनिक जोखिम: भारत के लिए क्या सबक

दक्षिण कोरिया में 6 जून राष्ट्रीय स्मरण और अवकाश का दिन माना जाता है। छुट्टी के दिन लोग परिवार या मित्रों के साथ बाहर निकलते हैं, जैसे भारत में लंबे वीकेंड, गर्मियों की छुट्टियां, दशहरे-दिवाली के बाद की यात्राएं या नए साल पर समुद्रतटों की भीड़ बढ़ जाती है। ऐसे दिनों में प्रशासन के लिए जोखिम कई गुना हो जाता है, क्योंकि अधिक लोग खुले सार्वजनिक स्थलों पर मौजूद होते हैं, और उनमें से कई उस इलाके के भूगोल से अनजान होते हैं।

भारत में गोवा, मुंबई के गिरगांव चौपाटी और जुहू, ओडिशा के पुरी, पश्चिम बंगाल के मंदारमणि या दीघा, आंध्र प्रदेश के आर.के. बीच, तमिलनाडु के मरीना बीच तथा केरल के कई समुद्रतटों पर यह समस्या बार-बार सामने आती है। पर्यटक पानी को मनोरंजन का क्षेत्र मानते हैं, जबकि स्थानीय प्रशासन उसे नियंत्रित जोखिम वाला क्षेत्र समझता है। यही धारणा-अंतर दुर्घटनाओं को जन्म देता है। जो व्यक्ति पहली बार समुद्र के निकट आया है, उसके लिए घुटने तक का पानी भी सुरक्षित लग सकता है; लेकिन अनुभवी स्थानीय गार्ड जानता है कि अगले दस सेकंड में आती लहर का मिजाज अलग हो सकता है।

कोरिया की इस घटना से पहला सबक यही निकलता है कि समुद्री सुरक्षा को केवल स्थानीय प्रशासन का मामला मानना पर्याप्त नहीं। यह नागरिक शिक्षा का विषय भी है। जैसे भारत में पहाड़ी पर्यटन स्थलों पर ‘सेल्फी पॉइंट’ दुर्घटनाओं ने नई चिंताएं पैदा की हैं, वैसे ही समुद्रतटों पर ‘सुबह-सुबह शांति है, इसलिए खतरा कम है’ जैसी धारणाएं भी भ्रामक हो सकती हैं। वास्तव में कई बार कम भीड़ वाले समय में खतरा अधिक होता है, क्योंकि आसपास तत्काल मदद देने वाले लोग कम होते हैं।

दूसरा सबक यह है कि चेतावनी संकेत, रस्सी-घेरा, गश्ती बल और प्रशिक्षित लाइफगार्ड की उपस्थिति को औपचारिकता नहीं माना जाना चाहिए। भारत में बहुत से लोग लाल झंडे के बावजूद पानी में उतर जाते हैं। कुछ इसे अनावश्यक डराना समझते हैं। पर समुद्र का गणित प्रशासनिक आदेश से नहीं बदलता। गंगनेउंग की घटना यह बताती है कि व्यवस्था मौजूद होने के बावजूद सब कुछ नियंत्रित नहीं हो पाता; ऐसे में यदि नागरिक स्वयं चेतावनियों की अनदेखी करें, तो जोखिम और बढ़ जाता है।

यह सिर्फ दुर्घटना नहीं, सार्वजनिक सुरक्षा की कहानी भी है

पत्रकारिता की दृष्टि से इस घटना का महत्व केवल इतना नहीं कि एक महिला की मृत्यु हुई। महत्व इस बात का भी है कि इसने सार्वजनिक सुरक्षा व्यवस्था की गति और उसकी सीमा, दोनों को एक ही फ्रेम में रख दिया। जब समाज किसी दुर्घटना को पढ़ता है, तो अक्सर परिणाम पर नजर टिक जाती है—मृत्यु हुई या नहीं। लेकिन नीति और प्रशासन की दृष्टि से समान रूप से महत्वपूर्ण प्रश्न यह होता है कि प्रतिक्रिया-श्रृंखला कैसे चली। यहां सूचना मिली, बल रवाना हुआ, गश्ती दल ने पानी में प्रवेश किया, दोनों को निकाला गया, सीपीआर दिया गया, एम्बुलेंस ने अस्पताल पहुंचाया। यानी संस्थागत प्रतिक्रिया मौजूद थी और सक्रिय थी।

फिर भी मृत्यु क्यों हुई? यही वह कठिन प्रश्न है जिसका उत्तर कई बार किसी एक अधिकारी, एक विभाग या एक निर्णय में नहीं मिलता। प्राकृतिक परिस्थितियां, पीड़ित की शारीरिक अवस्था, पानी में बिताया गया समय, आघात की तीव्रता—ये सभी कारण मिलकर परिणाम तय करते हैं। ऐसे में किसी भी समाज के लिए परिपक्व प्रतिक्रिया यह होनी चाहिए कि वह एक तरफ तंत्र की कमियों की जांच करे, और दूसरी तरफ यह भी स्वीकार करे कि हर आपदा में ‘शून्य हानि’ हमेशा संभव नहीं होती। लोकतांत्रिक समाज में जिम्मेदारी तय करना आवश्यक है, पर यथार्थ को समझे बिना केवल भावनात्मक निष्कर्ष निकालना समाधान नहीं देता।

भारत में भी हमने देखा है कि बाढ़, आग, रेल दुर्घटना, भीड़-प्रबंधन या धार्मिक आयोजनों में हादसे के बाद जनाक्रोश का पहला केंद्र प्रशासन होता है। यह स्वाभाविक भी है, क्योंकि राज्य से जवाबदेही अपेक्षित है। लेकिन गंगनेउंग की यह घटना याद दिलाती है कि कई बार जवाबदेही का मतलब केवल दोषी ढूंढना नहीं, बल्कि जोखिम-श्रृंखला को समझना और अगली बार उसे कम करना भी है। क्या वहां अतिरिक्त चेतावनी की जरूरत थी? क्या उस समय समुद्र अधिक उग्र था? क्या स्थानीय स्तर पर प्रवेश-निरोधक उपाय पर्याप्त थे? क्या पर्यटकों के लिए बहुभाषी सुरक्षा निर्देश मौजूद थे? ऐसे सवाल अधिक उपयोगी हैं।

यह भी ध्यान देने योग्य है कि कोरिया जैसा समाज, जो तेज प्रतिक्रिया, सार्वजनिक अनुशासन और तकनीकी समन्वय के लिए जाना जाता है, वहां भी समुद्रतटीय हादसे पूरी तरह समाप्त नहीं हुए हैं। इसका अर्थ है कि आधुनिकता से जोखिम खत्म नहीं होते; वे केवल बेहतर तरीके से प्रबंधित किए जा सकते हैं। भारत जैसे विशाल और विविध भूगोल वाले देश के लिए यह सीख और भी महत्वपूर्ण है।

समुद्र, राज्य और नागरिक: इस घटना से क्या समझना चाहिए

यंगजिन समुद्रतट की यह घटना एक साथ कई स्तरों पर पढ़ी जानी चाहिए। पहला, यह मानवीय त्रासदी है—एक परिवार ने अपनी सदस्य खो दी। दूसरा, यह आपात प्रतिक्रिया की कहानी है—बचाव दल ने समय गंवाए बिना काम किया। तीसरा, यह प्रकृति की अनिश्चितता का स्मरण है—समुद्र का खतरा अक्सर उसकी सुंदरता के भीतर छिपा होता है। और चौथा, यह नागरिक चेतना की परीक्षा है—क्या हम सार्वजनिक स्थानों को केवल आनंद की जगह मानते हैं, या वहां अंतर्निहित जोखिमों को भी समझते हैं?

भारतीय पाठकों के लिए यहां एक सांस्कृतिक तुलना भी उपयोगी है। जैसे हमारे यहां गंगा, यमुना, नर्मदा, गोदावरी या समुद्रतट धार्मिक, भावनात्मक और पर्यटन—तीनों अर्थों में महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं, वैसे ही कोरिया में भी समुद्रतट केवल प्राकृतिक स्थल नहीं, बल्कि अवकाश और सामाजिक जीवन का हिस्सा हैं। ऐसे स्थानों पर लोग सुरक्षा-नियमों को कभी-कभी पृष्ठभूमि का शोर मानने लगते हैं। पर दुर्घटनाएं याद दिलाती हैं कि प्रकृति के सामने मनुष्य का आत्मविश्वास बहुत जल्दी टूट सकता है।

इस घटना को किसी सनसनीखेज नजरिए से नहीं, बल्कि गंभीर सामाजिक दस्तावेज की तरह पढ़ा जाना चाहिए। यहां राज्य ने अपनी भूमिका निभाई, पर उसकी सीमा भी दिखाई दी। यहां बचावकर्मी सक्रिय थे, पर समुद्र का समय उनसे तेज निकला। यहां दो लोगों को एक साथ निकाला गया, पर जीवन दोनों के लिए एक जैसा नहीं ठहरा। यही वह जटिलता है जिसे अच्छी पत्रकारिता दर्ज करती है।

दक्षिण कोरिया के गंगनेउंग से आई यह खबर अंततः भारत के लिए भी उतनी ही प्रासंगिक है जितनी कोरिया के लिए। जब भी हम समुद्रतट पर जाएं, सुबह की शांति, सुंदर लहरें या छुट्टी का उत्साह हमें यह न भूलने दें कि समुद्र का व्यवहार एक झटके में बदल सकता है। प्रशासन को बेहतर चेतावनी, बेहतर प्रशिक्षण और बेहतर निगरानी की जरूरत है; लेकिन नागरिकों को भी यह समझना होगा कि सावधानी कोई वैकल्पिक सलाह नहीं, जीवनरक्षक अनुशासन है। गंगनेउंग की उस सुबह ने यही सबसे कठोर सबक दिया है: बचाव तंत्र जरूरी है, पर उससे पहले जोखिम को पहचानना और उससे बचना कहीं अधिक जरूरी है।

Source: Original Korean article - Trendy News Korea

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