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सियोल पर्यावरण फिल्म महोत्सव की ओपनिंग फिल्म ने उठाया बड़ा सवाल: क्या एआई हमारे भविष्य का सहारा बनेगा या पृथ्वी पर नया ब

तकनीक, सिनेमा और पर्यावरण के संगम पर खड़ा एक असुविधाजनक सवालदक्षिण कोरिया की सांस्कृतिक दुनिया से इस सप्ताह जो खबर सबसे गंभीर बहस को जन्म देती दिखाई दे रही है, वह किसी नए के-पॉप समूह, बॉक्स ऑफिस रिकॉर्ड या स्टार कास्ट वाले ड्रामा की नहीं, बल्कि एक डॉक्यूमेंट्री फिल्म की है। सियोल अंतरराष्ट्रीय पर्यावरण फिल्म महोत्सव के 23वें संस्करण का उद्घाटन जिस फिल्म से हुआ, उसका शीर्षक ही अपने भीतर बेचैनी और उम्मीद, दोनों को साथ लेकर चलता है—‘एआई: मैं कैसे प्रलय-आशावादी बना’। कनाडाई मूल के युवा निर्देशक डैनियल रोहर, जिनका जन्म 1993 में हुआ, इस फिल्म के जरिए एक ऐसा प्रश्न उठाते हैं जो अब केवल वैज्ञानिकों, नीति-निर्माताओं या टेक कंपनियों तक सीमित नहीं रहा: कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानी एआई मानव सभ्यता और पृथ्वी—दोनों के लिए आखिर क्या लेकर आ रही है?यह फिल्म इसलिए महत्त्वपूर्ण नहीं है कि इसमें एआई पर चर्चा की गई है। आज दुनिया भर में एआई पर लेख, बहस, सम्मेलन और निवेश की बाढ़ आई हुई है। असली बात यह है कि एक पर्यावरण फिल्म महोत्सव ने इसे अपनी ओपनिंग फिल्म बनाया। इसका अर्थ साफ है: कोरिया के सांस्कृतिक मंच अब पर्यावरण को केवल जंगल, समुद्र, प्रदूषण या जलवायु संकट के पारंपरिक फ्रेम में नहीं देख रहे, बल्कि डेटा सेंटर, कंप्यूटिंग, ऊर्जा खपत, डिजिटल बुनियादी ढांचे और तकनीकी लालसा को भी उसी बहस का हिस्सा मान रहे हैं। दूसरे शब्दों में, पर्यावरण अब प्रकृति बनाम उद्योग की पुरानी बहस नहीं रह गया; इसमें एल्गोरिद्म, सर्वर, बिजली, खनन और मानव आकांक्षा—सब शामिल हैं।भारतीय पाठकों के लिए यह संकेत विशेष रूप से दिलचस्प है। हमारे यहां भी एआई को लेकर चर्चा अक्सर दो हिस्सों में बंटी दिखाई देती है—एक तरफ रोजगार, उत्पादकता, शिक्षा, प्रशासन और स्टार्टअप की भाषा; दूसरी तरफ डर कि मशीनें इंसानी काम, निजता और रचनात्मकता पर कब्जा कर लेंगी। लेकिन सियोल से आई यह सांस्कृतिक घटना हमें याद दिलाती है कि तीसरा आयाम भी उतना ही जरूरी है: इस तकनीक की पर्यावरणीय कीमत क्या है? अगर हम चैटबॉट, एआई वीडियो, स्मार्ट निगरानी और स्वचालित सेवाओं से सुविधा ले रहे हैं, तो उसकी बिजली कौन दे रहा है, उसका कार्बन फुटप्रिंट कितना है, और उसका दीर्घकालिक सामाजिक असर किस रूप में सामने आएगा?यही वजह है कि यह फिल्म केवल कोरिया की खबर नहीं रह जाती। यह भारत सहित उन सभी समाजों के लिए प्रासंगिक बन जाती है जो डिजिटल भविष्य की ओर तेज़ी से बढ़ रहे हैं, लेकिन उसके पारिस्थितिक और मानवीय परिणामों पर अभी पर्याप्त सार्वजनिक संवाद नहीं कर पाए हैं।एक पिता बनने की चिंता से शुरू हुई वैश्विक बहसइस डॉक्यूमेंट्री की सबसे उल्लेखनीय बात उसका आरंभ-बिंदु है। यह किसी उद्योग रिपोर्ट, सरकारी नीति या टेक कंपनी की प्रस्तुति से शुरू नहीं होती। इसका जन्म एक निजी चिंता से होता है। डैनियल रोहर, जिन्होंने परिवार बसाने और भविष्य की योजना बनाने के दौरान यह सोचना शुरू किया कि एआई की तेज़ रफ्तार दुनिया आने वाली पीढ़ियों के लिए कैसी पृथ्वी और कैसा सामाजिक ढांचा छोड़ेगी, अपने सवाल को निजी डायरी तक सीमित नहीं रखते। वे इसे दुनिया भर के एआई विशेषज्ञों, विचारकों और तकनीक से जुड़े लोगों के साथ बातचीत में बदल देते हैं।यहीं फिल्म की संवेदनात्मक शक्ति छिपी है। तकनीकी बहसों को आमतौर पर जटिल शब्दावली घेर लेती है—मशीन लर्निंग, मॉडल स्केलिंग, डेटा इंफ्रास्ट्रक्चर, ऊर्जा अनुकूलन, एल्गोरिद्मिक शासन जैसे शब्द आम दर्शक को चर्चा से बाहर कर देते हैं। लेकिन जब सवाल यह बन जाए कि “क्या मैं इस दुनिया में बच्चे लाने को लेकर आश्वस्त हूं?” तो तकनीक अचानक हमारे घरेलू जीवन का हिस्सा बन जाती है। यह वही पुल है जो इस फिल्म को महज़ बौद्धिक चर्चा से आगे ले जाता है।भारतीय समाज में यह प्रश्न और भी गहराई से गूंजता है। यहां परिवार की अवधारणा केवल निजी नहीं, सामाजिक भी है। बच्चे का जन्म, उसके भविष्य की चिंता, शिक्षा, नौकरी, सुरक्षित समाज, स्वच्छ हवा, पीने का पानी—ये सब हमारे पारिवारिक संवाद के अभिन्न हिस्से हैं। अगर कोई युवा दंपती दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु, चेन्नई या लखनऊ में यह सोचता है कि आने वाले बीस वर्षों में नौकरियां कैसी होंगी, स्कूलों में तकनीक क्या भूमिका निभाएगी, निगरानी कितनी बढ़ेगी, और जलवायु संकट से रोजमर्रा का जीवन कितना प्रभावित होगा, तो वह मूलतः वही सवाल पूछ रहा है जिसे रोहर ने अपनी फिल्म का आधार बनाया।यानी इस फिल्म की ताकत इस बात में है कि वह एआई को किसी दूर बैठे वैज्ञानिक प्रयोग की तरह नहीं, बल्कि रसोई, बैठक, पालने और स्कूल बैग तक ले आती है। यह दृष्टि भारतीय पत्रकारिता और सिनेमा के लिए भी उपयोगी संकेत देती है कि तकनीक पर बात तब अधिक असरदार होती है जब वह मनुष्य के अनुभव, रिश्तों और आशंकाओं से जुड़ती है।पर्यावरण फिल्म महोत्सव में एआई क्यों? यही आज की सबसे बड़ी कहानी हैऊपरी तौर पर देखें तो एआई पर बनी डॉक्यूमेंट्री का पर्यावरण फिल्म महोत्सव का उद्घाटन करना कुछ दर्शकों को चौंका सकता है। पर्यावरण पर बनी फिल्मों से दर्शक अक्सर पिघलती बर्फ, सूखती नदियां, जंगलों की कटाई, प्रदूषित समुद्र या वन्यजीवों के संकट जैसी छवियों की अपेक्षा करते हैं। ऐसे में एक तकनीकी विषय वाली फिल्म का सामने आना इस बात का संकेत है कि पर्यावरणीय विमर्श के दायरे बदल चुके हैं।महोत्सव से जुड़े कोरियाई विद्वानों और आयोजकों ने जो बात रेखांकित की, उसका सार यह है कि एआई और पर्यावरण अब अलग-अलग विषय नहीं रहे। यह कथन केवल बौद्धिक फैशन नहीं, बल्कि ठोस वास्तविकता है। एआई प्रणालियों को प्रशिक्षण देने और चलाने के लिए विशाल डेटा केंद्रों, अत्यधिक ऊर्जा, जल संसाधनों और हार्डवेयर निर्माण की आवश्यकता होती है। चिप निर्माण से लेकर सर्वर रखरखाव तक, पूरी डिजिटल श्रृंखला का एक पारिस्थितिक मूल्य है। दूसरी ओर, यही एआई जलवायु मॉडलिंग, ऊर्जा दक्षता, ट्रैफिक प्रबंधन, आपदा पूर्वानुमान और कृषि अनुकूलन में मदद भी कर सकती है। यही दोमुंहापन इस विषय को जटिल और जरूरी बनाता है।भारत में भी यह समझ तेजी से विकसित होने की जरूरत है। हम डिजिटल इंडिया, स्मार्ट सिटी, एआई स्टार्टअप, ऑनलाइन शिक्षा, फिनटेक और ई-गवर्नेंस की बात करते हैं—और करनी भी चाहिए—लेकिन इस पूरी व्यवस्था की ऊर्जा खपत, इलेक्ट्रॉनिक कचरे, सर्वर अवसंरचना और संसाधन-उपयोग पर उतनी सार्वजनिक चर्चा नहीं होती। जिस तरह दिल्ली में एक नई सड़क या मेट्रो लाइन पर पर्यावरणीय असर का सवाल उठता है, उसी तरह आने वाले समय में बड़े डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर के पर्यावरणीय मूल्यांकन की सार्वजनिक मांग भी बढ़ेगी।यहीं यह कोरियाई सांस्कृतिक घटना एक संकेतक बन जाती है। जब एक फिल्म महोत्सव तकनीकी विषय को पर्यावरणीय बहस के केंद्र में रखता है, तो वह समाज से कह रहा होता है कि ‘प्रकृति’ और ‘प्रौद्योगिकी’ को अलग-अलग खानों में रखकर अब सोच पाना संभव नहीं। जैसे भारत में कोई गंभीर फिल्म महोत्सव यदि कृषि संकट पर फिल्म दिखाते हुए साथ में भूजल, बीज-नीति, कॉरपोरेट नियंत्रण और जलवायु परिवर्तन को एक ही फ्रेम में रखे, तो हम समझते हैं कि मुद्दा बहुस्तरीय है; उसी तरह कोरिया में एआई को पर्यावरण के साथ जोड़कर देखना एक परिपक्व सांस्कृतिक हस्तक्षेप है।कोरियाई मनोरंजन उद्योग में एआई अब विषय भी है और औजार भीइस डॉक्यूमेंट्री को लेकर कोरिया में दिलचस्पी केवल इसलिए नहीं बढ़ी कि यह एक बौद्धिक फिल्म है, बल्कि इसलिए भी कि एआई पहले से वहां के मनोरंजन उद्योग के भीतर प्रवेश कर चुकी है। कोरियाई फिल्म, संगीत और दृश्य संस्कृति लंबे समय से तकनीकी प्रयोगों के लिए पहचानी जाती रही है। अब यह प्रयोग केवल बेहतर दृश्य प्रभाव या तेज़ संपादन तक सीमित नहीं, बल्कि कहानी, चरित्र और निर्माण की प्रक्रियाओं तक पहुंच चुका है।सांस्कृतिक रिपोर्टों में यह भी सामने आया है कि एक अन्य फिल्म में मृत व्यक्ति की मानवरूपी पुनर्रचना जैसी अवधारणा को कथा के केंद्र में रखा गया है। इस तरह की कहानियां तकनीकी सुविधा की नहीं, शोक, स्मृति और नैतिक सीमा की कहानियां हैं। क्या कोई मशीन किसी खोए हुए प्रियजन की जगह ले सकती है? क्या डिजिटल पुनर्निर्माण सांत्वना है या भावनात्मक धोखा? यह प्रश्न केवल कोरिया के लिए नहीं, उस वैश्विक समाज के लिए भी महत्वपूर्ण है जहां किसी व्यक्ति की तस्वीर, आवाज़ और व्यवहारिक पैटर्न अब डेटा में बदले जा सकते हैं।इसी तरह संगीत जगत में ऐसे उदाहरण भी सामने आए हैं जहां पूरा म्यूजिक वीडियो एआई की मदद से तैयार किया गया। यह सुनने में रोमांचक लग सकता है, और कई कलाकारों के लिए कम बजट में कल्पनाशील दृश्य बनाने का नया रास्ता भी हो सकता है। लेकिन इसके साथ ही सवाल उठते हैं: क्या इससे रचनात्मक श्रम के पारंपरिक स्वरूप बदलेंगे? क्या दृश्य-निर्माण से जुड़े पेशेवरों की भूमिका घटेगी या नए कौशल की मांग बढ़ेगी? और क्या एआई-आधारित सृजन मौलिकता, श्रेय और कॉपीराइट की पुरानी परिभाषाओं को चुनौती देगा?भारतीय संदर्भ में यह बहस बहुत जल्दी हमारे सामने भी बड़े रूप में आने वाली है। बॉलीवुड, क्षेत्रीय सिनेमा, ओटीटी, विज्ञापन और संगीत उद्योग पहले ही डिजिटल रूपांतरण से गुजर रहे हैं। कल्पना कीजिए, जब किसी निर्माता के पास यह विकल्प हो कि सीमित बजट में एआई से विशाल सेट, भीड़, बैकग्राउंड, चेहरों की उम्र या आवाज़ में बदलाव कराया जा सकता है, तो उद्योग की अर्थव्यवस्था बदलना तय है। लेकिन उसके साथ श्रम, नैतिकता और गुणवत्ता पर बहस भी अपरिहार्य होगी।इसलिए सियोल की यह डॉक्यूमेंट्री व्यापक सांस्कृतिक संदर्भ में देखी जानी चाहिए। यह केवल एआई पर बनी फिल्म नहीं, बल्कि ऐसे समय की सांकेतिक रचना है जब तकनीक मनोरंजन जगत में एक साथ तीन रूपों में मौजूद है—कहानी का विषय, निर्माण का उपकरण और सामाजिक चिंता का केंद्र।‘प्रलय-आशावाद’ का अर्थ क्या है, और यह शब्द हमें क्यों चौंकाता हैफिल्म के शीर्षक में मौजूद विचार—‘प्रलय-आशावादी’—विशेष ध्यान खींचता है। यह शब्द विरोधाभासी लगता है। प्रलय यानी विनाश, संकट, टूटन; और आशावाद यानी संभावना, विश्वास, पुनर्निर्माण। दोनों को एक साथ रख देने से एक मानसिक अवस्था बनती है जिसमें व्यक्ति खतरे को देखता है, उससे आंख नहीं चुराता, लेकिन उम्मीद का दावा भी पूरी तरह नहीं छोड़ता। आज की एआई बहस शायद इसी मन:स्थिति की मांग करती है।तकनीक को लेकर सार्वजनिक चर्चा अक्सर दो अतियों में फंस जाती है। पहली अति है अंध-उत्साह—एआई सब समस्याएं हल कर देगी, दक्षता बढ़ेगी, विज्ञान तेज़ होगा, जीवन आसान होगा। दूसरी अति है भय—एआई नौकरियां खा जाएगी, इंसान को अप्रासंगिक बना देगी, निगरानी राज्य को मजबूत करेगी और रचनात्मकता को मशीन में बदल देगी। लेकिन वास्तविकता शायद इन दोनों के बीच है, और फिल्म का शीर्षक इसी बीच की असुविधाजनक जमीन पर खड़ा दिखाई देता है।भारतीय समाज में भी हमने कई तकनीकी परिवर्तनों को इसी तरह अनुभव किया है। मोबाइल फोन के प्रसार से लेकर सोशल मीडिया, डिजिटल भुगतान और ऑनलाइन शिक्षा तक—हर नई तकनीक ने सुविधा भी दी, असमानता भी बढ़ाई; लोकतंत्रीकरण भी किया, नियंत्रण के नए रूप भी पैदा किए। एआई का मामला इससे अलग नहीं होगा, बल्कि संभव है कि अधिक गहरा हो क्योंकि यह निर्णय, भाषा, छवि, श्रम और ज्ञान—सब पर असर डालेगी।यही कारण है कि ‘प्रलय-आशावाद’ को सनसनीखेज शीर्षक भर मानकर खारिज नहीं किया जाना चाहिए। यह उस मनुष्य की संवेदना है जो जानता है कि भविष्य आसान नहीं, लेकिन निराशा में बैठ रहना भी विकल्प नहीं। जलवायु संकट के समय में भी दुनिया ने यही अनुभव किया है। हम जानते हैं कि स्थिति गंभीर है, फिर भी नवीकरणीय ऊर्जा, संरक्षण, नीति और सामुदायिक पहल की बात करते हैं। एआई को लेकर भी संभवतः यही संयमित दृष्टि सबसे उपयोगी होगी—न अंधभक्ति, न अंधभय।भारतीय पाठकों के लिए इसका अर्थ: परिवार, रोजगार, शिक्षा और ऊर्जा की नई बहसअगर इस कोरियाई फिल्म को भारतीय नज़र से पढ़ें, तो इसके कई स्तर खुलते हैं। पहला स्तर परिवार का है। भारत में तकनीक की चर्चा अक्सर युवाओं और स्टार्टअप्स के दायरे में समेट दी जाती है, जबकि असल असर परिवारों पर पड़ता है। माता-पिता पूछेंगे कि बच्चों को कैसी शिक्षा दी जाए—कोडिंग, आलोचनात्मक सोच, कला, भाषा, या इन सबका मिश्रण? शिक्षक पूछेंगे कि एआई-सहायता प्राप्त शिक्षा सीखने को बेहतर बनाएगी या नकल और निर्भरता बढ़ाएगी? नौकरीपेशा वर्ग पूछेगा कि कौन से पेशे टिकाऊ रहेंगे और कौन से बदल जाएंगे?दूसरा स्तर रोजगार का है। भारत जैसे देश में, जहां युवा आबादी बड़ी है और रोजगार पहले से संवेदनशील प्रश्न बना हुआ है, एआई पर बहस केवल नवाचार की कहानी नहीं हो सकती। यह देखना होगा कि कौन से काम स्वचालित होंगे, कौन से नए कौशल पैदा होंगे, और संक्रमण काल में किन सामाजिक सुरक्षा उपायों की जरूरत पड़ेगी। कोरिया की फिल्म भले व्यक्तिगत भविष्य से शुरू होती हो, लेकिन उसका केंद्रीय तनाव सामूहिक अर्थव्यवस्था तक फैलता है। भारत में यह तनाव और भी बड़ा हो सकता है।तीसरा स्तर भाषा और संस्कृति का है। एआई आधारित प्रणालियां जिस भाषा में प्रशिक्षित होती हैं, वही शक्ति-संतुलन को प्रभावित करती है। अगर भविष्य की ज्ञान-व्यवस्था अंग्रेजी-प्रधान एल्गोरिद्म के इर्द-गिर्द बनी, तो हिंदी सहित भारतीय भाषाओं की उपस्थिति, प्रतिनिधित्व और गुणवत्ता पर प्रश्न उठेंगे। इस लिहाज से यह जरूरी है कि हम एआई को केवल विदेशी तकनीक के रूप में न देखें, बल्कि भारतीय भाषाई वास्तविकताओं के अनुरूप इसके विकास पर भी जोर दें।चौथा स्तर ऊर्जा और पर्यावरण का है। भारत पहले ही गर्मी की लहरों, जल संकट, प्रदूषण और असमान बुनियादी ढांचे से जूझ रहा है। ऐसे में यदि एआई-आधारित डिजिटल विस्तार तेजी से बढ़ता है, तो उसकी बिजली, कूलिंग और हार्डवेयर मांग भी बढ़ेगी। क्या हमारे शहर और ऊर्जा प्रणालियां इसके लिए तैयार हैं? क्या हर डिजिटल सुविधा का कोई छिपा हुआ पर्यावरणीय मूल्य है? कोरिया में फिल्म महोत्सव ने यही सवाल सांस्कृतिक भाषा में उठाया है; भारत में भी इसे जल्द ही नीति और जनचर्चा का हिस्सा बनना होगा।कोरियाई सांस्कृतिक परिदृश्य से मिल रही एक बड़ी सीखदक्षिण कोरिया लंबे समय से इस बात का उदाहरण रहा है कि लोकप्रिय संस्कृति केवल मनोरंजन नहीं, राष्ट्रीय संवाद का माध्यम भी बन सकती है। के-ड्रामा, के-पॉप और कोरियाई सिनेमा ने बार-बार सामाजिक तनावों—वर्ग, परिवार, शिक्षा, अकेलापन, तकनीक, आधुनिकता—को मुख्यधारा में जगह दी है। इसी परंपरा में यह भी महत्वपूर्ण है कि एक पर्यावरण फिल्म महोत्सव तकनीकी चिंता को सार्वजनिक संस्कृति का मुद्दा बनाए।भारतीय संदर्भ में यह एक उपयोगी सबक है। हमारे यहां भी फिल्म समारोह, वृत्तचित्र मंच और सांस्कृतिक आयोजन अक्सर व्यापक सामाजिक प्रश्नों को उठाते हैं, लेकिन तकनीक को अब भी या तो ‘भविष्यवादी चमत्कार’ के रूप में पेश किया जाता है या ‘विशेषज्ञों के विषय’ के रूप में। कोरिया का यह उदाहरण दिखाता है कि तकनीकी प्रश्न को मानवीय और सांस्कृतिक भाषा में बदलना संभव है। अगर किसी फिल्म का आधार एक निर्देशक की यह चिंता हो कि आने वाली पीढ़ी के लिए कैसी दुनिया छोड़ी जा रही है, तो दर्शक स्वाभाविक रूप से चर्चा में शामिल होते हैं।यही पत्रकारिता की भी जिम्मेदारी है। हमें एआई पर रिपोर्टिंग करते समय केवल निवेश, ऐप, कंपनी मूल्यांकन और उत्पाद लॉन्च पर नहीं रुकना चाहिए। हमें यह भी देखना होगा कि यह तकनीक रिश्तों, मानसिक स्वास्थ्य, श्रम, स्मृति, रचनात्मकता और पर्यावरण को कैसे प्रभावित कर रही है। सियोल की यह घटना बताती है कि संस्कृति का मंच कभी-कभी उन सवालों को अधिक ईमानदारी से उठा देता है जिनसे राजनीति और बाजार दोनों असहज रहते हैं।आखिरकार, यह फिल्म हमें किस दिशा में सोचने को मजबूर करती हैइस डॉक्यूमेंट्री का सबसे बड़ा योगदान शायद किसी अंतिम निष्कर्ष में नहीं, बल्कि प्रश्न पूछने की उसकी पद्धति में है। यह न तो एआई को शैतान घोषित करती दिखाई देती है, न उद्धारक। यह मानती है कि तकनीक का असर बहुस्तरीय है और इंसानी समाज को उसके साथ नैतिक, पारिस्थितिक और पारिवारिक स्तर पर एक साथ जूझना होगा। यही परिपक्वता इसे खास बनाती है।जब कोई युवा निर्देशक अपने निजी जीवन की असुरक्षा को वैश्विक विशेषज्ञों से संवाद में बदल देता है, तो वह दरअसल हमारे समय की एक बड़ी सच्चाई सामने लाता है: भविष्य अब इतना जटिल हो चुका है कि उसे समझना अकेले किसी एक पेशे, एक सरकार या एक कंपनी के बूते की बात नहीं। हमें कलाकारों, वैज्ञानिकों, शिक्षकों, अभिभावकों, पर्यावरणविदों और नागरिकों—सभी की भागीदारी चाहिए।भारतीय समाज के लिए इस कहानी का सार यही है कि एआई की बहस को जल्दबाजी में ‘समर्थन’ और ‘विरोध’ की दो पटरियों में नहीं बांटना चाहिए। यह बहस जीवन की गुणवत्ता, सामाजिक न्याय, भाषाई विविधता, रोजगार, ऊर्जा उपयोग और पृथ्वी के भविष्य से जुड़ी है। अगर कोरिया का सांस्कृतिक मंच इसे इतनी गंभीरता से ले रहा है, तो भारत में भी यह समय है कि हम एआई को केवल सुविधा और निवेश की भाषा में नहीं, बल्कि जिम्मेदारी और दूरदृष्टि की भाषा में समझें।सियोल की ओपनिंग फिल्म इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि वह एक असुविधाजनक लेकिन जरूरी बात कहती है: भविष्य पर बातचीत अब टाली नहीं जा सकती। और यह बातचीत सिर्फ लैब, बोर्डरूम या सरकारी फाइलों में नहीं, बल्कि घरों, कक्षाओं, सिनेमाघरों और सार्वजनिक संस्कृति के मंचों पर भी होनी चाहिए। शायद यही इस फिल्म का सबसे बड़ा संदेश है—अगर हम आने वाली दुनिया को लेकर सचमुच गंभीर हैं, तो हमें तकनीक के चमत्कार से पहले उसके मानवीय और पर्यावरणीय अर्थों को समझना होगा।

Source: Original Korean article - Trendy News Korea

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