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सियोल में दुनिया के युवाओं का जमावड़ा: शांति, मीडिया और कला के जरिए वैश्विक नागरिकता का नया पाठ

सियोल में दुनिया के युवाओं का जमावड़ा: शांति, मीडिया और कला के जरिए वैश्विक नागरिकता का नया पाठ

सियोल से उठती एक नई वैश्विक बहस

दक्षिण कोरिया की राजधानी सियोल इन दिनों सिर्फ K-pop, के-ड्रामा, ब्यूटी ब्रांड्स या तकनीकी नवाचार के कारण चर्चा में नहीं है। इस बार चर्चा का केंद्र एक ऐसा अंतरराष्ट्रीय युवा कार्यक्रम है, जो दुनिया भर के युवाओं को यह सोचने पर मजबूर कर रहा है कि 21वीं सदी में ‘अच्छा नागरिक’ होने का अर्थ आखिर क्या है। कोरिया के शिक्षा मंत्रालय और यूनेस्को एशिया-प्रशांत अंतरराष्ट्रीय समझ शिक्षा संस्थान ने 8 से 12 तारीख तक सियोल में ‘2026 विश्व नागरिक शिक्षा युवा नेतृत्व प्रशिक्षण’ शुरू किया है। इसमें 117 देशों से आए 2,181 आवेदनों में से चुने गए 30 देशों के 40 युवा नेता भाग ले रहे हैं।

पहली नजर में यह एक और अंतरराष्ट्रीय प्रशिक्षण कार्यक्रम लग सकता है, जैसा दुनिया के कई शहरों में समय-समय पर होता रहता है। लेकिन इसकी वास्तविक अहमियत इससे कहीं अधिक है। यह कार्यक्रम इस बात का संकेत है कि आज की युवा पीढ़ी जलवायु संकट, युद्ध, सामाजिक ध्रुवीकरण, डिजिटल नफरत, नस्लीय भेदभाव, प्रवास, लैंगिक न्याय और सांस्कृतिक सह-अस्तित्व जैसे सवालों को सिर्फ ‘वैश्विक मुद्दे’ कहकर नहीं छोड़ना चाहती; वह इन पर हस्तक्षेप करना चाहती है। यही कारण है कि 117 देशों से इतने बड़े पैमाने पर आवेदन आए। इस संख्या को सिर्फ प्रतिस्पर्धा का पैमाना मानना पर्याप्त नहीं होगा; यह दुनिया भर के युवाओं की बेचैनी, आकांक्षा और जिम्मेदारी की भावना का संकेत भी है।

भारतीय पाठकों के लिए इसे समझना कठिन नहीं होना चाहिए। जैसे भारत में नई शिक्षा नीति, कौशल विकास, युवा संसद, मॉडल यूनाइटेड नेशंस, सामाजिक उद्यमिता और कैंपस-आधारित संवाद कार्यक्रमों के जरिए युवा नेतृत्व की नई परिभाषा गढ़ने की कोशिश हो रही है, वैसे ही कोरिया यह दिखा रहा है कि शिक्षा अब केवल परीक्षा, डिग्री और नौकरी तक सीमित नहीं रह सकती। उसे समाज, लोकतंत्र, बहुलता और वैश्विक जिम्मेदारी से भी जुड़ना होगा। सियोल का यह कार्यक्रम इसी बदलते शिक्षा-बोध का उदाहरण है।

महत्वपूर्ण बात यह भी है कि कोरिया इस आयोजन में सिर्फ मेजबान नहीं है, बल्कि वह एक विचार भी प्रस्तुत कर रहा है—कि विश्व नागरिकता की शिक्षा किताबों के अध्यायों से नहीं, बल्कि संवाद, रचनात्मक अभिव्यक्ति और साझा अनुभवों से बनती है। यह बात भारत जैसे विशाल, विविध और बहुभाषी समाज के लिए भी बेहद प्रासंगिक है, जहां स्थानीय पहचान और वैश्विक आकांक्षा साथ-साथ चलती हैं।

117 देशों की दिलचस्पी का अर्थ क्या है?

किसी भी अंतरराष्ट्रीय कार्यक्रम की सफलता केवल मंच पर बैठे प्रतिभागियों से नहीं, बल्कि उन लोगों से भी मापी जाती है जो उसमें शामिल होना चाहते थे। इस प्रशिक्षण में 117 देशों से 2,181 आवेदन आए और अंततः केवल 40 युवाओं का चयन हुआ। यह आंकड़ा दो बातों को एक साथ स्पष्ट करता है। पहली, विश्व नागरिक शिक्षा अब केवल अकादमिक शब्दावली नहीं रही; यह युवाओं के बीच एक वास्तविक और आकर्षक एजेंडा बन चुकी है। दूसरी, कोरिया ने अपने लिए ऐसा मंच तैयार कर लिया है जहां दुनिया के युवा आकर सीखना, बहस करना और नेटवर्क बनाना चाहते हैं।

भारत में भी हम अक्सर देखते हैं कि प्रतिष्ठित फैलोशिप, सिविल सेवा प्रशिक्षण, छात्रवृत्ति या अंतरराष्ट्रीय विनिमय कार्यक्रमों में वास्तविक महत्व ‘कितने चुने गए’ से ज्यादा ‘कितने आवेदन आए’ का होता है। आवेदन किसी कार्यक्रम की विश्वसनीयता का सामाजिक प्रमाण होते हैं। सियोल के इस प्रशिक्षण को भी इसी दृष्टि से देखा जाना चाहिए। यदि 117 देशों के युवा इसमें रुचि दिखा रहे हैं, तो इसका मतलब है कि विश्व नागरिकता, शांति और सामाजिक परिवर्तन जैसे विषयों पर नया वैश्विक संवाद आकार ले रहा है।

यह भी ध्यान देने योग्य है कि चुने गए प्रतिभागी 30 देशों से हैं। यानी यह कार्यक्रम प्रतीकात्मक प्रतिनिधित्व तक सीमित नहीं है, बल्कि विविध क्षेत्रों, भाषाओं और सामाजिक अनुभवों को एक कमरे में लाने की कोशिश करता है। आज के समय में यह बहुत महत्वपूर्ण है, क्योंकि दुनिया के संकट एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। जलवायु परिवर्तन का प्रभाव केवल द्वीपीय देशों पर नहीं रुकता, युद्ध केवल सीमाओं के भीतर नहीं रहता, और डिजिटल घृणा केवल एक भाषा तक सीमित नहीं रहती। ऐसे में यदि 30 देशों के युवा एक ही कार्यक्रम में सामाजिक संघर्ष, शांति और बदलाव पर काम करते हैं, तो यह वैश्विक राजनीति के नीचे बन रही नई सामाजिक कूटनीति की झलक है।

भारतीय संदर्भ में देखें तो यह वैसा ही है जैसे देश के अलग-अलग राज्यों—कश्मीर, मणिपुर, केरल, महाराष्ट्र, बिहार, तमिलनाडु और उत्तर प्रदेश—से आए छात्र किसी एक मंच पर बैठकर यह समझने की कोशिश करें कि विविधता के बीच संवाद कैसे बनाया जाए। जब भारत के भीतर ऐसा संवाद महत्वपूर्ण है, तब दुनिया के स्तर पर उसकी आवश्यकता और बढ़ जाती है। सियोल का यह कार्यक्रम उसी आवश्यकता का उत्तर देने का प्रयास है।

विश्व नागरिक शिक्षा आखिर है क्या?

‘विश्व नागरिक शिक्षा’ या ग्लोबल सिटिजनशिप एजुकेशन सुनने में एक बड़ा और थोड़ा अमूर्त शब्द लग सकता है। आम पाठक के मन में यह सवाल स्वाभाविक है कि क्या इसका अर्थ अपनी राष्ट्रीय पहचान को पीछे छोड़ देना है? क्या यह कोई आदर्शवादी, पुस्तकीय अवधारणा है? कोरियाई कार्यक्रम के संदर्भ में इसका उत्तर स्पष्ट है—नहीं। विश्व नागरिक शिक्षा का अर्थ अपने देश, समाज और संस्कृति से दूर जाना नहीं, बल्कि यह समझना है कि हमारी स्थानीय जिंदगी आज वैश्विक संरचनाओं से कैसे जुड़ी हुई है।

उदाहरण के लिए, भारत में दिल्ली की हवा, महाराष्ट्र का सूखा, असम की बाढ़, तेलंगाना के आईटी सेक्टर में एआई का प्रभाव, पश्चिम बंगाल या केरल के प्रवासी नेटवर्क, और सोशल मीडिया पर फैलने वाली फर्जी खबरें—ये सब स्थानीय मुद्दे हैं, लेकिन इनके पीछे वैश्विक तंत्र भी काम कर रहे होते हैं। विश्व नागरिक शिक्षा युवाओं को यही सिखाती है कि वे अपने समाज की समस्याओं को दुनिया के व्यापक संदर्भ में समझें, दूसरे समाजों के अनुभवों से सीखें और समाधान को केवल नैतिक भाषण नहीं, बल्कि व्यावहारिक कार्रवाई की तरह देखें।

यूनेस्को लंबे समय से इस विचार को बढ़ावा देता रहा है कि शिक्षा का लक्ष्य केवल साक्षरता और रोजगार नहीं, बल्कि शांति, मानवाधिकार, टिकाऊ विकास, सहिष्णुता और संवाद भी होना चाहिए। सियोल में आयोजित यह प्रशिक्षण उसी सोच का विस्तार है। यहां युवा नेताओं को केवल यह नहीं बताया जा रहा कि शांति अच्छी चीज है; उन्हें यह भी सिखाया जा रहा है कि समाज में विभाजन, भय, पूर्वाग्रह और सूचना-युद्ध के बीच शांति की भाषा कैसे बनाई जाती है।

भारतीय समाज में इसकी प्रासंगिकता विशेष रूप से इसलिए है क्योंकि यहां विविधता कोई वैचारिक नारा नहीं, बल्कि रोजमर्रा की वास्तविकता है। भाषा, जाति, धर्म, क्षेत्र, वर्ग, लिंग और पीढ़ी के आधार पर भिन्नताओं के बीच सह-अस्तित्व भारतीय जीवन का आधार है। ऐसे समाज में विश्व नागरिक शिक्षा एक विदेशी विचार नहीं, बल्कि हमारी अपनी बहुलतावादी परंपरा का आधुनिक रूप भी मानी जा सकती है। ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ का आदर्श यदि कभी व्यवहारिक शिक्षा में रूपांतरित होता है, तो वह कुछ इसी तरह के कार्यक्रमों के जरिए होता है।

मीडिया और कला को बदलाव का औजार क्यों बनाया गया?

इस प्रशिक्षण की सबसे उल्लेखनीय विशेषता यह है कि इसे पारंपरिक व्याख्यान-आधारित मॉडल की तरह नहीं, बल्कि मीडिया और कला के माध्यम से शांति और सामाजिक बदलाव की दिशा में डिजाइन किया गया है। यही वह बिंदु है जो इसे साधारण से अलग बनाता है। आखिर आज की दुनिया में जनमत किससे बनता है? केवल कक्षाओं, सेमिनारों और सरकारी भाषणों से नहीं। कहानियों, वीडियो, संगीत, छवियों, लघु फिल्मों, सोशल मीडिया पोस्ट, सार्वजनिक प्रदर्शन, दृश्य प्रतीकों और सांस्कृतिक अभिव्यक्तियों से भी बनता है।

कोरिया इस भाषा को भली-भांति समझता है। एक ऐसा देश जिसकी सॉफ्ट पावर K-pop, K-drama, सिनेमा, फैशन और डिजिटल संस्कृति के जरिए विश्व स्तर पर फैल चुकी है, वह यह भी जानता है कि संस्कृति सिर्फ मनोरंजन नहीं, प्रभाव का माध्यम है। इस कार्यक्रम में मीडिया और कला को शामिल करना दरअसल उसी समझ का विस्तार है—कि यदि युवाओं को समाज बदलना है, तो उन्हें अभिव्यक्ति की समकालीन भाषाएं भी आनी चाहिए।

भारतीय पाठकों के लिए यह बात भी जानी-पहचानी है। हमारे यहां भी सामाजिक जागरूकता के कई बड़े आंदोलन गीत, पोस्टर, कविता, स्ट्रीट थिएटर, डॉक्यूमेंट्री, इंस्टाग्राम अभियानों और स्वतंत्र सिनेमा के जरिए आगे बढ़े हैं। ‘नुक्कड़ नाटक’ से लेकर कैंपस फिल्म क्लब तक, और लोक कला से लेकर रैप संगीत तक—भारत में भी रचनात्मक माध्यम लंबे समय से सामाजिक हस्तक्षेप के औजार रहे हैं। ऐसे में सियोल का यह प्रशिक्षण हमें याद दिलाता है कि युवा नेतृत्व की नई परिभाषा में संचार-कौशल और सांस्कृतिक कल्पनाशीलता दोनों शामिल हैं।

यह पहल इस मायने में भी महत्वपूर्ण है कि आज सूचना का संकट केवल ‘सूचना की कमी’ नहीं, बल्कि ‘सूचना की अराजकता’ है। फर्जी खबर, घृणा-भाषा, ट्रोल राजनीति, एल्गोरिदमिक ध्रुवीकरण और दृश्य-आधारित प्रचार ने समाजों को अधिक विभाजित किया है। ऐसे समय में यदि युवा नेता मीडिया साक्षरता, जिम्मेदार अभिव्यक्ति और संवेदनशील सांस्कृतिक संचार सीखते हैं, तो यह लोकतांत्रिक समाजों के लिए दीर्घकालिक निवेश है। कोरिया का यह कार्यक्रम इसी दिशा में एक प्रयोग की तरह देखा जा सकता है।

रोल-प्ले के जरिए नेतृत्व: किताब से बाहर की शिक्षा

इस प्रशिक्षण में प्रतिभागियों को सामाजिक संघर्ष और उसके संभावित समाधान से जुड़े रोल-प्ले यानी भूमिका-अभिनय आधारित अभ्यासों में शामिल किया जा रहा है। पहली नजर में यह एक प्रशिक्षण तकनीक भर लग सकती है, लेकिन शिक्षा की दृष्टि से इसका महत्व बहुत गहरा है। रोल-प्ले व्यक्ति को केवल ‘सुनने’ या ‘बोलने’ तक सीमित नहीं रखता, बल्कि उसे किसी दूसरे की स्थिति में खड़े होकर सोचने, प्रतिक्रिया देने, असहमति झेलने और समाधान खोजने के लिए बाध्य करता है।

आज दुनिया जिन संकटों से जूझ रही है, उनमें शायद ही कोई समस्या ऐसी हो जिसका एक आसान, सीधा और सर्वमान्य समाधान हो। चाहे वह शरणार्थियों का प्रश्न हो, नस्लीय तनाव हो, धार्मिक अविश्वास हो, लैंगिक समानता हो या डिजिटल सेंसरशिप—हर जगह अलग-अलग पक्ष, स्मृतियां, आघात और हित काम कर रहे होते हैं। ऐसे में नेतृत्व का अर्थ केवल ऊंचे आदर्श बोल देना नहीं, बल्कि टकराव की वास्तविकता को समझना और उससे निपटने की क्षमता विकसित करना है। रोल-प्ले इसी कौशल को विकसित करता है।

भारतीय शिक्षा व्यवस्था में भी लंबे समय से यह बहस रही है कि क्या हम छात्रों को केवल रटने और परीक्षा देने के लिए तैयार करते हैं, या उन्हें वास्तविक जीवन की जटिलताओं से जूझने के लिए भी सक्षम बनाते हैं। मॉडल संसद, मूट कोर्ट, युवा संवाद, छात्र बहस, सामुदायिक इंटर्नशिप और थिएटर-आधारित शिक्षण जैसे प्रयोग इसी वजह से महत्वपूर्ण माने जाते हैं। सियोल का यह कार्यक्रम वैश्विक स्तर पर यही बात दोहरा रहा है कि भविष्य का नेतृत्व सहानुभूति, सुनने की क्षमता, तर्क, संचार और सामूहिक समस्या-समाधान पर टिका होगा।

यहां एक और सांस्कृतिक पहलू समझना जरूरी है। पूर्वी एशियाई समाजों, खासकर कोरिया में, शिक्षा को अक्सर अनुशासन, गंभीरता और उच्च प्रतिस्पर्धा से जोड़ा जाता है। ऐसे परिदृश्य में यदि एक सरकारी-संबद्ध कार्यक्रम भूमिका-अभिनय, कला और सहभागी पद्धतियों को अपनाता है, तो यह इस बात का संकेत है कि शिक्षा की पारंपरिक परिभाषा बदल रही है। अब उद्देश्य सिर्फ ‘जानना’ नहीं, बल्कि ‘करना’, ‘महसूस करना’ और ‘सह-निर्माण’ भी है।

सियोल केवल मेजबान नहीं, एक संदेश भी है

किसी भी अंतरराष्ट्रीय आयोजन का शहर केवल भौगोलिक पृष्ठभूमि नहीं होता; वह राजनीतिक और सांस्कृतिक संदेश भी बन जाता है। इस लिहाज से सियोल का चयन बहुत अर्थपूर्ण है। यह शहर पिछले दो दशकों में दुनिया की कल्पना में तेजी से उभरा है—एक तकनीकी महानगर, एक सांस्कृतिक केंद्र, एक फैशन राजधानी, और एशियाई आधुनिकता का एक जीवंत प्रतीक। लेकिन अब उसके सामने एक नया अवसर है: क्या वह वैश्विक सार्वजनिक मूल्यों के विमर्श का भी केंद्र बन सकता है?

इस प्रशिक्षण के जरिए कोरिया मानो कह रहा है कि उसकी वैश्विक उपस्थिति केवल मनोरंजन उद्योग या निर्यात-उन्मुख अर्थव्यवस्था तक सीमित नहीं है। वह शिक्षा, शांति, संवाद और सामाजिक नवाचार के क्षेत्र में भी पहल करना चाहता है। यह बदलाव सूक्ष्म है, लेकिन महत्वपूर्ण है। दुनिया कोरिया को अब केवल K-pop उपभोक्ता बाजार के रूप में नहीं, बल्कि एक ऐसे मंच के रूप में भी देखने लगे, जहां साझा वैश्विक मूल्यों पर गंभीर विचार-विमर्श हो सकता है—यह कोरिया की सॉफ्ट पावर का अगला चरण हो सकता है।

भारतीय संदर्भ में इसकी तुलना हम कुछ हद तक उस तरह से कर सकते हैं, जैसे भारत अंतरराष्ट्रीय योग दिवस, जी20, डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर, स्टार्टअप इकोसिस्टम या छात्र-विनिमय मंचों के जरिए अपनी छवि को केवल एक बड़े बाजार से आगे बढ़ाकर एक वैचारिक और संस्थागत साझेदार के रूप में पेश करना चाहता है। सियोल का यह आयोजन भी कुछ वैसा ही है—एक शहर और एक देश, जो अपनी सांस्कृतिक लोकप्रियता को सार्वजनिक संवाद की क्षमता में बदलना चाहता है।

यह भी महत्वपूर्ण है कि यह कार्यक्रम यूनेस्को से संबद्ध एशिया-प्रशांत अंतरराष्ट्रीय समझ शिक्षा संस्थान में हो रहा है। इससे आयोजन को केवल सरकारी औपचारिकता से ऊपर उठकर संस्थागत वैधता और अंतरराष्ट्रीय शैक्षिक गहराई मिलती है। यानी यहां प्रतीक और संरचना दोनों मौजूद हैं: एक वैश्विक शहर, एक अंतरराष्ट्रीय संस्थान, और एक ऐसा विषय जो सीमाओं से परे है।

भारत के लिए क्या सबक हैं?

भारतीय पाठकों के लिए इस पूरे घटनाक्रम का सबसे दिलचस्प हिस्सा शायद यही है कि इससे हमें अपने यहां की शिक्षा और युवा नीति को नए सिरे से देखने का मौका मिलता है। भारत दुनिया की सबसे युवा आबादियों में से एक है। हमारे विश्वविद्यालय, स्कूली तंत्र, सिविल सोसायटी नेटवर्क, डिजिटल प्लेटफॉर्म और रचनात्मक उद्योग मिलकर यदि युवाओं को विश्व नागरिकता, मीडिया साक्षरता, शांति अध्ययन और सामाजिक नेतृत्व की दिशा में व्यवस्थित प्रशिक्षण दें, तो उसका असर केवल रोजगार तक सीमित नहीं रहेगा; वह लोकतांत्रिक संस्कृति को भी मजबूत करेगा।

आज भारत के युवा वैश्विक दुनिया में रह रहे हैं। वे कोरियाई पॉप संस्कृति भी देखते हैं, अमेरिकी तकनीकी प्लेटफॉर्म भी इस्तेमाल करते हैं, पश्चिम एशिया के संघर्षों पर प्रतिक्रिया भी देते हैं, जलवायु परिवर्तन पर भी चिंतित होते हैं और घरेलू सामाजिक मुद्दों पर भी आवाज उठाते हैं। लेकिन अक्सर शिक्षा व्यवस्था इन बिखरे हुए अनुभवों को किसी सुविचारित ढांचे में नहीं बदल पाती। सियोल का यह कार्यक्रम बताता है कि ऐसा ढांचा बनाया जा सकता है—जहां युवा केवल उपभोक्ता न रहें, बल्कि संवादकर्ता, मध्यस्थ, निर्माता और परिवर्तनकारी नागरिक बनें।

भारत में राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 बहु-विषयकता, आलोचनात्मक सोच और अनुभवात्मक शिक्षा की बात करती है। यदि इस दृष्टि को गंभीरता से लागू करना है, तो विश्व नागरिकता, अंतर-सांस्कृतिक संवाद, डिजिटल नैतिकता, कला-आधारित सार्वजनिक संचार और संघर्ष-समाधान को भी पाठ्यचर्या और सह-पाठ्यचर्या का हिस्सा बनाना होगा। यह केवल अंतरराष्ट्रीय छवि का प्रश्न नहीं, बल्कि घरेलू सामाजिक सामंजस्य का भी प्रश्न है।

एक और सबक यह है कि युवा कार्यक्रमों को ‘इवेंट’ नहीं, ‘इकोसिस्टम’ बनाना होगा। सियोल का प्रशिक्षण पांच दिनों का है, लेकिन इसका प्रभाव प्रतिभागियों के नेटवर्क, साझा परियोजनाओं, भविष्य के सहयोग और स्थानीय स्तर पर लौटकर किए जाने वाले कामों में दिखाई देगा। भारत में भी यदि विश्वविद्यालयों, राज्य संस्थानों, सांस्कृतिक संगठनों और अंतरराष्ट्रीय निकायों के बीच बेहतर साझेदारी बने, तो ऐसे कार्यक्रम बड़े बदलाव के बीज बन सकते हैं।

कोरिया की बदलती वैश्विक छवि और आगे का रास्ता

पिछले एक दशक में कोरिया की वैश्विक छवि तेज़ी से बदली है। कभी वह मुख्यतः तकनीक, ऑटोमोबाइल और उत्तर कोरिया से जुड़ी भू-राजनीतिक खबरों के संदर्भ में देखा जाता था। फिर K-pop, ऑस्कर जीतने वाली फिल्मों, स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म पर लोकप्रिय ड्रामों और ब्यूटी इंडस्ट्री ने उसे सांस्कृतिक महाशक्ति की तरह स्थापित किया। अब यदि सियोल जैसे कार्यक्रम लगातार बढ़ते हैं, तो कोरिया की छवि में एक और परत जुड़ सकती है—एक ऐसे देश की, जो वैश्विक युवाओं के लिए शिक्षा, संवाद और सार्वजनिक मूल्यों का मंच तैयार करता है।

यह बदलाव अपने आप नहीं आएगा। इसके लिए निरंतरता, संस्थागत निवेश, विविध देशों की भागीदारी, कार्यक्रमों की गुणवत्ता और परिणामों की विश्वसनीयता जरूरी होगी। लेकिन मौजूदा प्रशिक्षण इस दिशा में एक संकेतक जरूर है। जब 117 देशों के युवा किसी कार्यक्रम के लिए आवेदन करते हैं, जब 30 देशों के प्रतिभागी सियोल में बैठकर कला, मीडिया और भूमिका-अभिनय के जरिए शांति और सामाजिक बदलाव की भाषा सीखते हैं, तब यह केवल एक कार्यशाला नहीं रह जाती; यह अंतरराष्ट्रीय संबंधों के एक नए व्याकरण का हिस्सा बन जाती है।

भारतीय नजरिए से देखें तो यह कहानी इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह हमें याद दिलाती है कि एशिया के भीतर नए तरह के शैक्षिक और सांस्कृतिक नेतृत्व उभर रहे हैं। लंबे समय तक वैश्विक विमर्श का केंद्र यूरोप और अमेरिका माने जाते रहे, लेकिन अब सियोल, सिंगापुर, टोक्यो, दिल्ली, जकार्ता और बैंकॉक जैसे शहर भी अपने-अपने तरीके से नए विचारों के मंच बन रहे हैं। यह एशिया की बदलती बौद्धिक भूगोल का हिस्सा है।

अंततः सियोल का यह प्रशिक्षण एक सरल लेकिन गहरी बात कहता है: दुनिया को ऐसे युवाओं की जरूरत है जो सीमाओं से परे सोच सकें, लेकिन अपनी जमीन से कटे नहीं; जो शांति की भाषा बोल सकें, लेकिन संघर्ष की वास्तविकता से आंख न मूंदें; जो कला और मीडिया को केवल करियर नहीं, सामाजिक जिम्मेदारी का माध्यम भी मानें। आज जब दुनिया में विभाजन की आवाजें तेज हैं, तब सियोल से उठी यह पहल उम्मीद की एक अलग धुन सुनाती है। और शायद यही इसकी सबसे बड़ी खबर है।

Source: Original Korean article - Trendy News Korea

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