
OECD की नई भविष्यवाणी क्यों बनी बड़ी खबर
दक्षिण कोरिया की अर्थव्यवस्था को लेकर अंतरराष्ट्रीय मंच से आई ताज़ा खबर ने एशियाई बाज़ारों, निवेशकों और नीति-निर्माताओं का ध्यान अपनी ओर खींचा है। आर्थिक सहयोग और विकास संगठन, यानी OECD, ने इस वर्ष के लिए कोरिया की विकास दर का अनुमान 1.7 प्रतिशत से बढ़ाकर 2.6 प्रतिशत कर दिया है। पहली नज़र में यह केवल एक सांख्यिकीय संशोधन लग सकता है, लेकिन असल मायने इससे कहीं बड़े हैं। कुछ ही महीने पहले यही संस्था वैश्विक अनिश्चितताओं, खासकर पश्चिम एशिया के तनाव और बाहरी मांग पर दबाव को देखते हुए कोरिया के लिए अपना अनुमान घटा चुकी थी। अब उसी संस्था का इतने बड़े अंतर से अनुमान बढ़ाना यह बताता है कि ज़मीन पर कुछ ठोस बदला है।
भारतीय पाठकों के लिए इसे ऐसे समझना आसान होगा जैसे किसी बड़ी रेटिंग एजेंसी ने अचानक यह मान लिया हो कि भारत की आईटी सेवाएं, मोबाइल निर्माण और घरेलू मांग मिलकर उम्मीद से कहीं अधिक मज़बूती दिखा रही हैं। विकास दर का अनुमान केवल अर्थशास्त्रियों की बहस का विषय नहीं होता; यह निवेश, मुद्रा, शेयर बाज़ार, कारोबारी विश्वास और वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं में किसी देश की स्थिति पर असर डालता है। कोरिया के मामले में OECD का संदेश साफ है: दुनिया की सुस्ती और भू-राजनीतिक जोखिमों के बावजूद कोरिया की तकनीकी-निर्माण क्षमता, विशेषकर सेमीकंडक्टर निर्यात, फिर से अर्थव्यवस्था की धुरी बन गई है।
यह इसलिए भी अहम है क्योंकि दक्षिण कोरिया एक ऐसा देश है जिसकी आर्थिक कहानी लंबे समय से निर्यात, तकनीक और औद्योगिक अनुशासन पर टिकी रही है। अगर जापान अपनी ऑटोमोबाइल इंजीनियरिंग और जर्मनी अपनी मशीनरी के लिए जाना जाता है, तो कोरिया आज मेमोरी चिप, डिस्प्ले, बैटरी और उन्नत इलेक्ट्रॉनिक्स की वैश्विक शृंखला का केंद्रीय खिलाड़ी है। OECD ने अपने ताज़ा आकलन में इसी वास्तविकता को दोबारा स्वीकार किया है। यानी यह केवल आर्थिक वृद्धि की खबर नहीं, बल्कि कोरिया की औद्योगिक प्रतिस्पर्धा की पुनर्पुष्टि भी है।
दिलचस्प बात यह है कि इस संशोधन का असर सिर्फ सियोल के आर्थिक गलियारों तक सीमित नहीं रहेगा। भारत, ताइवान, जापान, चीन और दक्षिण-पूर्व एशिया के कई देशों की औद्योगिक और व्यापारिक रणनीतियां कोरियाई मांग, निवेश और तकनीकी चक्र से जुड़ी हुई हैं। इसलिए कोरिया की मज़बूती को एशियाई औद्योगिक रिकवरी के संकेतक के रूप में भी देखा जा रहा है।
सेमीकंडक्टर: कोरिया की अर्थव्यवस्था का इंजन फिर गरम हुआ
OECD ने जिस कारक को सबसे स्पष्ट रूप से रेखांकित किया है, वह है सेमीकंडक्टर निर्यात। भारतीय संदर्भ में सेमीकंडक्टर को केवल कंप्यूटर चिप समझना पर्याप्त नहीं होगा। यही वे सूक्ष्म इलेक्ट्रॉनिक अवयव हैं जो स्मार्टफोन, लैपटॉप, डेटा सेंटर, ऑटोमोबाइल, रक्षा प्रणालियों, एआई सर्वर, टीवी, वॉशिंग मशीन और यहां तक कि आधुनिक अस्पताल उपकरणों तक में लगे होते हैं। जिस तरह भारत के लिए पेट्रोलियम आयात या आईटी सेवा निर्यात एक बड़ा संरचनात्मक तत्व हैं, उसी तरह कोरिया के लिए सेमीकंडक्टर केवल एक उद्योग नहीं, बल्कि पूरी अर्थव्यवस्था की नब्ज हैं।
जब वैश्विक तकनीकी मांग बढ़ती है, तो कोरिया के बड़े समूह—विशेषकर सैमसंग इलेक्ट्रॉनिक्स और एसके हाइनिक्स—न केवल अधिक निर्यात करते हैं, बल्कि वे नए संयंत्र, नई मशीनरी, उन्नत उत्पादन और अनुसंधान में निवेश भी बढ़ाते हैं। इससे विनिर्माण क्षेत्र में रोजगार, उप-ठेकेदारी, लॉजिस्टिक्स, बंदरगाह गतिविधि और पूंजी बाज़ार तक सकारात्मक संकेत जाते हैं। OECD का कहना कि सेमीकंडक्टर निर्यात विकास और निजी निवेश को आगे बढ़ाएगा, इसी व्यापक आर्थिक शृंखला की ओर इशारा करता है।
कोरियाई आर्थिक ढांचे को समझने के लिए एक सांस्कृतिक और औद्योगिक संदर्भ भी ज़रूरी है। कोरिया में बड़े कारोबारी समूहों को अक्सर “चैबोल” कहा जाता है। यह शब्द भारतीय पाठकों के लिए नया हो सकता है। इसे मोटे तौर पर ऐसे समझिए जैसे बहुत बड़े, बहु-क्षेत्रीय औद्योगिक समूह जिनकी उपस्थिति वित्त, निर्माण, इलेक्ट्रॉनिक्स, शिपिंग और तकनीक तक फैली होती है। हालांकि इनकी संरचना भारतीय पारिवारिक समूहों से अलग है, पर प्रभाव के लिहाज़ से इनकी तुलना टाटा, रिलायंस, अडाणी, महिंद्रा या लार्सन एंड टुब्रो जैसे बड़े प्रभावशाली कॉरपोरेट नेटवर्क से की जा सकती है। कोरिया में जब सेमीकंडक्टर चक्र सुधरता है, तो उसका असर केवल एक कंपनी की बैलेंस शीट पर नहीं, बल्कि पूरे औद्योगिक इकोसिस्टम पर पड़ता है।
आज दुनिया में कृत्रिम बुद्धिमत्ता, क्लाउड कंप्यूटिंग, हाई-परफॉर्मेंस सर्वर और उन्नत मोबाइल उपकरणों की मांग बढ़ रही है। मेमोरी चिप्स और हाई-बैंडविड्थ मेमोरी जैसे उत्पादों के लिए यह समय बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। कोरिया इस वैश्विक दौड़ में केंद्रीय स्थिति रखता है। यही वजह है कि OECD ने कोरिया को लेकर अपने नजरिये में तेज़ बदलाव दिखाया है। अगर तकनीकी मांग का यह रुझान कायम रहा, तो कोरिया की बढ़त केवल एक तिमाही की कहानी नहीं रह सकती, बल्कि अगले कुछ वर्षों की रणनीतिक बढ़त बन सकती है।
मार्च की निराशा से जून का पलटाव: क्या बदला?
कुछ महीने पहले तक तस्वीर अलग थी। वैश्विक तनाव, ऊर्जा कीमतों की आशंका, व्यापारिक अनिश्चितता और बाहरी मांग को लेकर संदेह ने कोरिया जैसी निर्यात-निर्भर अर्थव्यवस्थाओं पर दबाव डाला था। इसी पृष्ठभूमि में OECD ने मार्च में कोरिया की विकास दर का अनुमान घटाया था। अब वही संस्था 1.7 प्रतिशत से 2.6 प्रतिशत तक का बड़ा उछाल दिखा रही है। यह बदलाव किसी मनमाने आशावाद का परिणाम नहीं लगता, बल्कि वास्तविक आर्थिक संकेतकों में सुधार का संकेत है।
आमतौर पर अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं अपने अनुमानों में सावधान रहती हैं। वे बार-बार दिशा नहीं बदलतीं, खासकर तब जब वैश्विक परिदृश्य अभी भी पूरी तरह स्थिर न हो। इसलिए कोरिया के लिए इतना बड़ा संशोधन यह बताता है कि निर्यात, कॉरपोरेट निवेश और उद्योग-संबंधी आंकड़ों में सुधार ने संस्थागत सोच को प्रभावित किया है। यानी दुनिया के प्रमुख नीति-विश्लेषक अब मान रहे हैं कि कोरिया ने बाहरी जोखिमों के बावजूद अपनी ताकतवर औद्योगिक क्षमता से वापसी की है।
भारतीय पाठक इसे कोविड के बाद भारतीय अर्थव्यवस्था में दिखे उन चरणों से जोड़कर समझ सकते हैं, जब कभी-कभी वैश्विक एजेंसियां भारत के प्रति सतर्क रहीं, लेकिन घरेलू मांग, डिजिटलीकरण, जीएसटी संग्रह या विनिर्माण वृद्धि के आंकड़ों ने धीरे-धीरे आकलन बदल दिया। अंतर यही है कि कोरिया की अर्थव्यवस्था में निर्यात और तकनीकी उत्पादन का वजन कहीं अधिक है। इसलिए वहां बाहरी मांग का महत्व बहुत बड़ा है।
यह भी ध्यान देने योग्य है कि कोरिया की आर्थिक संरचना लचीली होने के साथ-साथ संवेदनशील भी है। संवेदनशील इसलिए क्योंकि वैश्विक मांग कमजोर होते ही असर दिखता है; लचीली इसलिए क्योंकि उच्च-तकनीकी उद्योगों में उसकी प्रतिस्पर्धा उसे तेज़ी से वापसी का मौका देती है। OECD का यह संशोधन इस द्वंद्व को उजागर करता है। कोरिया दुनिया से कटा हुआ देश नहीं है; बल्कि वह वैश्विक तकनीकी चक्र के बीचोंबीच खड़ा है। जब चक्र नीचे जाता है तो चोट भी जल्दी लगती है, लेकिन जब चक्र ऊपर लौटता है तो लाभ भी तेजी से मिलता है।
सिर्फ निर्यात नहीं, घरेलू खपत की भी बात क्यों महत्वपूर्ण है
OECD की रिपोर्ट की एक और अहम बात यह है कि उसने केवल निर्यात का उल्लेख नहीं किया, बल्कि यह भी कहा कि वित्तीय नीतियों के सहारे उपभोग यानी खपत में धीरे-धीरे सुधार जारी रह सकता है। आर्थिक पत्रकारिता में अक्सर विकास दर को केवल निर्यात, उद्योग और निवेश की भाषा में समझाया जाता है, लेकिन किसी भी अर्थव्यवस्था की सेहत का एक अहम पैमाना यह भी होता है कि आम लोग कितना खर्च कर रहे हैं, सेवाएं कितनी सक्रिय हैं और घरेलू मांग कितनी स्थिर है।
कोरिया के मामले में “धीरे-धीरे सुधार” वाली अभिव्यक्ति विशेष महत्व रखती है। इसका अर्थ यह नहीं कि उपभोग में अचानक विस्फोट होने वाला है। इसका मतलब है कि सरकार के वित्तीय समर्थन, आर्थिक माहौल में सुधार और रोज़गार-संबंधी स्थिरता के सहारे घरेलू मांग धीरे-धीरे बेहतर हो सकती है। यह स्वर अतिशयोक्तिपूर्ण नहीं, बल्कि संतुलित है। और कई बार यही संतुलित स्वर ज्यादा विश्वसनीय होता है।
भारतीय संदर्भ में देखें तो हमें अच्छी तरह पता है कि केवल निर्यात या केवल शेयर बाज़ार की तेजी से आम अर्थव्यवस्था की पूरी तस्वीर नहीं बनती। जब तक शहरी और ग्रामीण मांग, छोटे व्यवसायों की बिक्री, सेवा क्षेत्र की गतिविधि और उपभोक्ता भरोसा साथ न दें, तब तक विकास की कहानी अधूरी रहती है। कोरिया के लिए भी यही बात लागू होती है। अगर सेमीकंडक्टर अर्थव्यवस्था को आगे खींच रहे हैं, तो घरेलू खपत उस वृद्धि को स्थायित्व दे सकती है।
यहां एक सांस्कृतिक परत भी है। दक्षिण कोरिया का समाज तेज़ी से आधुनिक, शहरी और डिजिटल जीवनशैली वाला है, लेकिन वहां घरों पर कर्ज़ और जीवनयापन की लागत को लेकर चिंताएं भी रही हैं। इसलिए घरेलू खपत में सुधार का प्रश्न केवल आर्थिक नहीं, सामाजिक भी है। भारत में जैसे महंगाई, नौकरी और उपभोग का रिश्ता राजनीतिक और सामाजिक बहस का हिस्सा बन जाता है, वैसे ही कोरिया में भी उपभोग की सुस्ती केवल आंकड़ों की बात नहीं होती। OECD का सावधान आशावाद इसीलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि वह बताता है कि कोरिया की रिकवरी अब कुछ हद तक संतुलित होती दिख रही है।
शेयर बाज़ार, कॉरपोरेट मुनाफा और वैश्विक निवेशकों का भरोसा
विकास दर की कहानी को अगर बाज़ार की भाषा में पढ़ें, तो अर्थ निकलता है कि निवेशकों का भरोसा कोरियाई कंपनियों की कमाई पर बढ़ रहा है। इसी संदर्भ में वैश्विक निवेश बैंक गोल्डमैन सैक्स ने भी कोरियाई शेयर बाज़ार को लेकर उत्साहजनक संकेत दिए हैं। उसकी राय में ऊंची आय वृद्धि और मेमोरी उद्योग के कम आंके गए मूल्यांकन को देखते हुए कोरियाई बाज़ार में अब भी ऊपर जाने की गुंजाइश है।
यहां एक महत्वपूर्ण बिंदु समझना ज़रूरी है। OECD व्यापक अर्थव्यवस्था यानी मैक्रो तस्वीर देखता है—उत्पादन, निवेश, खपत, व्यापार, नीतियां। दूसरी ओर निवेश बैंक अक्सर कंपनी-स्तरीय प्रदर्शन, मुनाफे, सेक्टरल कमाई और बाज़ार मूल्यांकन को देखता है। जब दोनों अलग-अलग दिशाओं से आकर लगभग एक ही निष्कर्ष पर पहुंचें—कि कोरिया की स्थिति पहले से बेहतर दिख रही है—तो उस संकेत का महत्व बढ़ जाता है।
रिपोर्टों में यह भी सामने आया है कि सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र के मुनाफे में तेज़ वृद्धि हुई है और कोरिया इस प्रवृत्ति का प्रमुख उदाहरण बनकर उभरा है। इसका असर केवल तकनीकी कंपनियों तक सीमित नहीं रहता। बैंकिंग, औद्योगिक उपकरण, रसायन, परिवहन, शिपिंग और उपभोक्ता कारोबार तक में यह भरोसे की भावना पैदा कर सकता है। भारतीय निवेशकों के लिए यह कुछ वैसा ही है जैसे जब आईटी, बैंकिंग और कैपेक्स-चालित क्षेत्रों में एक साथ सकारात्मक संकेत मिलने लगें, तो व्यापक बाज़ार का दृष्टिकोण सुधरने लगता है।
हालांकि यह भी सच है कि बाज़ार हमेशा सीधी रेखा में ऊपर नहीं जाते। अंतरराष्ट्रीय निवेश बैंक खुद भी अल्पकालिक उतार-चढ़ाव की आशंका जताते हैं। इसलिए कोरिया की कहानी को “हर तरफ़ तेजी” वाले सरल नारे में बदलना सही नहीं होगा। बेहतर यह होगा कि इसे एक संरचनात्मक सुधार के रूप में देखा जाए, जिसमें कॉरपोरेट कमाई, उद्योग की मांग और अंतरराष्ट्रीय विश्वास एक ही दिशा में इशारा कर रहे हैं, लेकिन राह में झटके आ सकते हैं।
भारत के लिए सबक: चिप्स, सप्लाई चेन और औद्योगिक नीति
दक्षिण कोरिया की इस आर्थिक वापसी को भारत के लिए केवल विदेशी खबर की तरह पढ़ना पर्याप्त नहीं होगा। भारत इस समय सेमीकंडक्टर, इलेक्ट्रॉनिक्स निर्माण, सप्लाई चेन विविधीकरण और उच्च-प्रौद्योगिकी विनिर्माण में अपनी जगह बनाने की कोशिश कर रहा है। केंद्र सरकार की सेमीकंडक्टर नीति, उत्पादन आधारित प्रोत्साहन योजनाएं, मोबाइल निर्माण का विस्तार, और इलेक्ट्रॉनिक्स निर्यात बढ़ाने के प्रयास इसी बड़े ढांचे का हिस्सा हैं। ऐसे में कोरिया की कहानी हमारे लिए कई स्तरों पर शिक्षाप्रद है।
पहला सबक यह है कि वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं में जगह बनाना केवल कारखाने लगाने का मामला नहीं है; इसके लिए तकनीकी क्षमता, दीर्घकालिक निवेश, कौशल, अनुसंधान, विश्वसनीय लॉजिस्टिक्स और स्थिर नीतिगत वातावरण की भी आवश्यकता होती है। कोरिया ने दशकों में यह इकोसिस्टम बनाया है। भारत आज उस दिशा में शुरुआती और मध्यवर्ती चरणों के बीच खड़ा दिखाई देता है।
दूसरा सबक यह है कि किसी एक रणनीतिक उद्योग का प्रभाव पूरे आर्थिक परिदृश्य को बदल सकता है। जैसे भारत के लिए कभी आईटी सेवाओं ने वैश्विक पहचान बनाई, वैसे ही कोरिया के लिए सेमीकंडक्टर ने राष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा का चेहरा गढ़ा। अब भारत विनिर्माण और डिज़ाइन-आधारित इलेक्ट्रॉनिक्स में ऐसी ही छलांग लगाने की महत्वाकांक्षा रखता है। लेकिन इसके लिए केवल घोषणाएं नहीं, बल्कि निष्पादन की निरंतरता चाहिए।
तीसरा, कोरिया का अनुभव यह भी सिखाता है कि निर्यात-आधारित ताकत के साथ घरेलू मांग का आधार कमजोर नहीं होना चाहिए। भारत की सबसे बड़ी ताकत उसका विशाल घरेलू बाजार है। अगर भारत इस घरेलू मांग को तकनीकी विनिर्माण, डिज़ाइन, चिप पैकेजिंग, ऑटो इलेक्ट्रॉनिक्स और डेटा सेंटर विस्तार के साथ जोड़ सके, तो उसकी स्थिति कई मायनों में अनोखी हो सकती है।
चौथा, कोरिया की स्थिति भारत के लिए प्रतिस्पर्धा और साझेदारी—दोनों का अवसर लेकर आती है। भारतीय कंपनियां कोरियाई तकनीक, निवेश और आपूर्ति शृंखला विशेषज्ञता से लाभ ले सकती हैं। वहीं, कई क्षेत्रों में दोनों देश वैश्विक बाज़ारों में प्रतिद्वंद्वी भी बन सकते हैं। यही आधुनिक एशियाई अर्थव्यवस्था की वास्तविकता है: सहयोग और प्रतिस्पर्धा साथ-साथ चलते हैं।
कोरियाई समाज, तकनीक और राष्ट्रीय प्रतिष्ठा का रिश्ता
दक्षिण कोरिया को अक्सर भारत में K-pop, K-drama, ब्यूटी प्रोडक्ट्स और सियोल की पॉप-संस्कृति के माध्यम से देखा जाता है। लेकिन उस चमकदार सांस्कृतिक निर्यात के पीछे एक बेहद अनुशासित औद्योगिक समाज है, जिसने शिक्षा, तकनीक, विनिर्माण और वैश्विक ब्रांड निर्माण को राष्ट्रीय प्रतिष्ठा से जोड़ा है। यही कारण है कि जब सेमीकंडक्टर निर्यात बढ़ता है, तो वह केवल आर्थिक सफलता नहीं, बल्कि राष्ट्रीय क्षमता की पुष्टि की तरह भी देखा जाता है।
भारत में जैसे इसरो की सफलता, डिजिटल पेमेंट क्रांति या फार्मा निर्यात पर एक व्यापक राष्ट्रीय गर्व महसूस किया जाता है, वैसे ही कोरिया में सैमसंग, हाइनिक्स, हुंडई या एलजी जैसे नाम केवल कंपनियां नहीं, बल्कि देश की क्षमता के प्रतीक बन जाते हैं। इसीलिए OECD जैसे मंच से आई सकारात्मक खबर का मनोवैज्ञानिक महत्व भी होता है। यह घरेलू और वैश्विक दोनों श्रोताओं को बताती है कि कोरिया अभी भी तकनीकी दुनिया की अग्रिम पंक्ति में है।
कोरियाई संस्कृति में तीव्र प्रतिस्पर्धा, शैक्षणिक दबाव, कार्य-संस्कृति और उपलब्धि-केन्द्रित सामाजिक दृष्टिकोण पर अक्सर चर्चा होती है। इन सामाजिक वास्तविकताओं की आलोचनाएं भी हैं और प्रशंसा भी। लेकिन आर्थिक दृष्टि से देखें तो यही दबाव कई बार उच्च उत्पादकता और तकनीकी उत्कृष्टता में बदलता दिखाई देता है। बेशक, इसका सामाजिक मूल्य भी होता है, जिसे कोरिया लगातार संतुलित करने की कोशिश करता है। इसलिए आर्थिक सफलता की यह कहानी केवल उत्सव नहीं, बल्कि श्रम, नीति और सामाजिक अनुशासन की भी कहानी है।
उत्साह और सावधानी के बीच सही निष्कर्ष क्या है
इस पूरी तस्वीर को एक ही वाक्य में समेटें तो कहा जा सकता है कि OECD ने कोरिया की अर्थव्यवस्था को लेकर अपना भरोसा फिर से बढ़ाया है, और उस भरोसे की बुनियाद सेमीकंडक्टर निर्यात, निजी निवेश तथा धीरे-धीरे सुधरती घरेलू खपत पर टिकी है। लेकिन इस खबर को केवल उत्साह के शोर में बदल देना जल्दबाज़ी होगी। रिपोर्ट का स्वर संतुलित है। खपत को लेकर सावधानी है, बाज़ार को लेकर अस्थिरता की आशंका है, और वैश्विक जोखिम अभी समाप्त नहीं हुए हैं।
फिर भी यह मानने में हिचक नहीं होनी चाहिए कि कोरिया ने दुनिया को एक महत्वपूर्ण संदेश दिया है। एक ऐसी अर्थव्यवस्था, जिसे कुछ महीने पहले लेकर संदेह बढ़ा था, वही अब तकनीकी प्रतिस्पर्धा और निर्यात की ताकत से फिर आगे निकलती दिख रही है। अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं आंकड़ों के जरिए वही कह रही हैं, जिसे एशियाई औद्योगिक परिदृश्य लंबे समय से महसूस कर रहा था: कोरिया अभी भी वैश्विक तकनीकी आपूर्ति शृंखला का अपरिहार्य स्तंभ है।
भारत के लिए इस खबर में दोहरी सीख है। पहली, उच्च-प्रौद्योगिकी विनिर्माण केवल भविष्य की नीति नहीं, वर्तमान की अनिवार्यता है। दूसरी, वैश्विक प्रतिष्ठा उन्हीं देशों को मिलती है जो कठिन दौर में भी अपने प्रतिस्पर्धी क्षेत्रों को मजबूत बनाए रखते हैं। कोरिया ने फिलहाल यही कर दिखाया है। अब नज़र इस पर होगी कि क्या यह सुधार आने वाली तिमाहियों में टिकाऊ साबित होता है, और क्या घरेलू मांग भी इस औद्योगिक उछाल के साथ कदम मिला पाती है।
एशिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के बीच यह कहानी एक बार फिर याद दिलाती है कि 21वीं सदी की शक्ति केवल जनसंख्या या भूभाग से तय नहीं होगी, बल्कि इस बात से होगी कि कौन देश भविष्य की तकनीकों में कितनी गहराई, निरंतरता और विश्वसनीयता के साथ निवेश कर पाता है। इस कसौटी पर दक्षिण कोरिया ने फिलहाल दुनिया का ध्यान फिर अपनी ओर खींच लिया है।
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