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डिग्री से आगे बढ़ता दौर: दक्षिण कोरिया की चिप दिग्गज SK हाइनिक्स ने भर्ती में हटाई शैक्षणिक बाधा, AI युग के लिए बदले निय

डिग्री से आगे बढ़ता दौर: दक्षिण कोरिया की चिप दिग्गज SK हाइनिक्स ने भर्ती में हटाई शैक्षणिक बाधा, AI युग के लिए बदले निय

डिग्री नहीं, क्षमता होगी असली कसौटी

दक्षिण कोरिया की प्रमुख सेमीकंडक्टर कंपनी SK हाइनिक्स ने नई भर्ती नीति में एक ऐसा बदलाव किया है, जिसकी गूंज केवल सियोल या कोरिया के टेक गलियारों तक सीमित नहीं रहेगी। कंपनी ने अपने नए कर्मचारियों की भर्ती में लंबे समय से लागू शैक्षणिक पात्रता की शर्त, जैसे ‘चार वर्षीय स्नातक डिग्री अनिवार्य’ जैसी बाध्यता, हटाने का फैसला किया है। यह बदलाव 17 जून से शुरू हुई नई भर्ती प्रक्रिया से लागू माना जा रहा है, और कंपनी का इरादा इसे आगे चलकर सभी भर्ती प्रक्रियाओं में अपनाने का है। पहली नजर में यह महज भर्ती विज्ञापन की भाषा बदलने जैसा लग सकता है, लेकिन असल में यह संकेत कहीं बड़ा है: कृत्रिम बुद्धिमत्ता, उन्नत कंप्यूटिंग और तेज तकनीकी प्रतिस्पर्धा के दौर में कंपनियां अब यह मानने लगी हैं कि प्रतिभा को केवल डिग्री, संस्थान या पारंपरिक शैक्षणिक ढांचे से नहीं मापा जा सकता।

SK हाइनिक्स दुनिया की अग्रणी मेमोरी चिप कंपनियों में गिनी जाती है और AI सर्वर, डेटा सेंटर तथा उच्च प्रदर्शन कंप्यूटिंग के लिए आवश्यक चिप आपूर्ति शृंखला में उसकी भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है। ऐसे में कंपनी का यह कहना कि भविष्य की प्रतिभा को ‘फॉर्मल डिग्री’ से नहीं, बल्कि अनुभव, समस्या-समाधान क्षमता, तकनीकी योग्यता और संगठनात्मक अनुकूलन के आधार पर परखा जाएगा, वैश्विक उद्योग के लिए भी एक गंभीर संदेश है। भारत जैसे देश में, जहां आज भी लाखों छात्र और अभिभावक इस दुविधा से गुजरते हैं कि सफलता का रास्ता क्या केवल प्रतिष्ठित डिग्री से होकर ही जाता है, वहां यह खबर विशेष महत्व रखती है।

भारतीय संदर्भ में देखें तो यह फैसला उस लंबे सामाजिक-सांस्कृतिक दबाव को चुनौती देता दिखाई देता है, जिसमें ‘अच्छी नौकरी’ का मतलब अक्सर ‘अच्छी डिग्री’ से जोड़ा जाता रहा है। IIT, NIT, IIM या नामी निजी संस्थानों का आकर्षण अपनी जगह है, लेकिन जमीनी हकीकत यह भी है कि भारत में बड़ी संख्या में ऐसे युवा हैं जिनके पास असाधारण तकनीकी कौशल है, पर उनके पास प्रतिष्ठित संस्थान का नाम या पारंपरिक डिग्री नहीं है। कोरिया की यह पहल इस व्यापक बहस को नया बल देती है कि उद्योग जगत को अब डिग्री-केंद्रित सोच से कौशल-केंद्रित सोच की ओर बढ़ना ही होगा।

यह बदलाव क्यों महत्वपूर्ण है, और अभी क्यों?

SK हाइनिक्स ने इस निर्णय के पीछे जिस व्यापक पृष्ठभूमि का उल्लेख किया है, वह है AGI यानी ‘आर्टिफिशियल जनरल इंटेलिजेंस’ का युग। सामान्य पाठकों के लिए इसे सरल भाषा में समझें तो AGI का अर्थ ऐसी कृत्रिम बुद्धिमत्ता की परिकल्पना से है, जो केवल एक सीमित काम—जैसे अनुवाद, चित्र पहचान या टेक्स्ट जनरेशन—तक सीमित न होकर बहुआयामी समस्याओं को समझने और सुलझाने की क्षमता रखे। भले ही AGI अभी पूरी तरह वास्तविकता न बनी हो, लेकिन दुनिया भर की टेक कंपनियां यह मानकर चल रही हैं कि AI के अगले चरण में मानव संसाधन की मांग अलग तरह की होगी। ऐसे में कंपनियों को ऐसे लोग चाहिए जो केवल किताबों के ज्ञाता न हों, बल्कि जटिल समस्याओं को नए तरीके से समझ सकें, नई तकनीकों के साथ जल्दी तालमेल बैठा सकें और अलग-अलग क्षेत्रों के लोगों के साथ मिलकर काम कर सकें।

सेमीकंडक्टर उद्योग में यह बात और भी ज्यादा लागू होती है। चिप डिजाइन, विनिर्माण प्रक्रिया, परीक्षण, सॉफ्टवेयर-हार्डवेयर एकीकरण और AI अनुप्रयोगों की मांग इतनी तेजी से बदल रही है कि चार साल पहले पढ़ाया गया पाठ्यक्रम आज कई जगह अधूरा पड़ सकता है। इस क्षेत्र में केवल डिग्री होना पर्याप्त नहीं; लगातार सीखते रहने, उपकरणों को समझने, डिजाइन लॉजिक पर काम करने, टीम में सहयोग करने और वास्तविक परियोजनाओं को संभालने की क्षमता जरूरी है। SK हाइनिक्स का कहना यही है कि अगर तकनीक की दुनिया इतनी तेजी से बदल रही है, तो भर्ती के पैमाने भी पुराने नहीं रह सकते।

भारतीय आईटी उद्योग में भी कुछ वर्षों से ऐसी चर्चा चलती रही है। कई भारतीय कंपनियों ने कोडिंग बूटकैंप, ऑनलाइन प्रमाणपत्र, गिटहब प्रोफाइल, ओपन सोर्स योगदान और प्रोजेक्ट-आधारित अनुभव को महत्त्व देना शुरू किया है। स्टार्टअप क्षेत्र में तो यह बदलाव पहले से दिख रहा है, जहां संस्थापक अक्सर उम्मीदवार से पूछते हैं कि उसने क्या बनाया, न कि सिर्फ कहां पढ़ाई की। लेकिन भारी विनिर्माण, कोर इंजीनियरिंग और उच्च तकनीकी निर्माण जैसे क्षेत्रों में पारंपरिक डिग्री अभी भी बड़ी शर्त बनी हुई है। इस लिहाज से SK हाइनिक्स का कदम खास है, क्योंकि यह कोई छोटा स्टार्टअप नहीं, बल्कि वैश्विक आपूर्ति शृंखला में केंद्रीय भूमिका निभाने वाली तकनीकी महाशक्ति है।

भर्ती का दायरा बढ़ेगा, पर परीक्षा भी कठिन होगी

कंपनी ने इस भर्ती अभियान में अगली पीढ़ी के सेमीकंडक्टर डिजाइन सहित अहम पदों पर ‘तीन अंकों’ में नियुक्ति का संकेत दिया है। यानी यह कोई प्रतीकात्मक पहल नहीं, बल्कि पर्याप्त पैमाने पर की जा रही भर्ती है। आवेदन की अंतिम तिथि 23 जून बताई गई है। कंपनी का कहना है कि नियमित खुली भर्ती की बजाय इस तरह की ‘रोलिंग’ या ‘सतत’ भर्ती के लिए यह संख्या असामान्य रूप से बड़ी है। इसका अर्थ साफ है: SK हाइनिक्स AI चिप प्रतिस्पर्धा के अगले दौर के लिए तेजी से प्रतिभा जुटाना चाहती है।

लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठता है। यदि डिग्री की बाध्यता हटा दी जाएगी, तो उम्मीदवारों की क्षमता का आकलन कैसे होगा? यही इस नीति की असली परीक्षा है। डिग्री हटाना आसान है, मगर उसकी जगह कौन-सा निष्पक्ष और भरोसेमंद मूल्यांकन तंत्र आएगा, यह अधिक चुनौतीपूर्ण सवाल है। क्या कंपनी कौशल-परीक्षा लेगी? क्या वास्तविक परियोजनाओं का आकलन होगा? क्या उम्मीदवारों से पोर्टफोलियो, कोड, डिजाइन केस या समस्या-समाधान आधारित इंटरव्यू मांगे जाएंगे? क्या इंटर्नशिप या प्रशिक्षुता जैसे मॉडल मजबूत किए जाएंगे? यदि इन सवालों के ठोस उत्तर नहीं बने, तो डिग्री हटाने का लाभ सीमित रह सकता है।

भारत में भी यह स्थिति परिचित है। निजी क्षेत्र में अक्सर कहा जाता है कि ‘हम प्रतिभा देखते हैं’, लेकिन व्यावहारिक स्तर पर स्क्रीनिंग सॉफ्टवेयर, HR शॉर्टलिस्टिंग और पुराने जॉब डेस्क्रिप्शन फिर डिग्री और संस्थान को प्राथमिकता दे देते हैं। इसलिए SK हाइनिक्स की नीति का प्रभाव इसी बात से तय होगा कि कंपनी चयन प्रक्रिया को कितना पारदर्शी, संरचित और क्षमता-केंद्रित बना पाती है। यह परिवर्तन तभी सार्थक माना जाएगा जब बिना पारंपरिक डिग्री वाले, लेकिन वास्तविक कौशल रखने वाले उम्मीदवार सचमुच अवसर पा सकें।

एक और पहलू भी ध्यान देने योग्य है। सेमीकंडक्टर उद्योग अत्यधिक विशेषज्ञता वाला क्षेत्र है। यहां सूक्ष्म इंजीनियरिंग, भौतिकी, सामग्री विज्ञान, इलेक्ट्रॉनिक्स डिजाइन ऑटोमेशन और विनिर्माण अनुशासन की ठोस समझ चाहिए। इसलिए डिग्री की शर्त हटाने का अर्थ यह नहीं कि मानक घटा दिए गए हैं। बल्कि इसका आशय उलटा भी हो सकता है: अब कंपनी ऐसे लोगों की तलाश में है जो पारंपरिक फिल्टर से बाहर रह जाते थे, लेकिन जिनमें काम की समझ, सीखने की गति और नवाचार की क्षमता अधिक है। यानी प्रवेश का दरवाजा चौड़ा हुआ है, मंजिल आसान नहीं हुई।

कोरियाई कॉरपोरेट संस्कृति में यह बदलाव कितना बड़ा है?

दक्षिण कोरिया का समाज शिक्षा को अत्यंत गंभीरता से लेने के लिए जाना जाता है। वहां प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों में प्रवेश को जीवन की दिशा तय करने वाला मोड़ माना जाता है। भारतीय पाठकों के लिए तुलना करें तो यह कुछ-कुछ वैसे है जैसे भारत में बोर्ड परीक्षा, JEE, NEET या UPSC को सामाजिक प्रतिष्ठा और भविष्य की सुरक्षा से जोड़कर देखा जाता है। कोरिया में भी लंबे समय तक विश्वविद्यालय का नाम, डिग्री का स्तर और शैक्षणिक पृष्ठभूमि सामाजिक-आर्थिक अवसरों के महत्वपूर्ण सूचक माने जाते रहे हैं। इसलिए किसी बड़ी कंपनी द्वारा शैक्षणिक योग्यता की अनिवार्यता हटाना केवल कॉरपोरेट नीतिगत बदलाव नहीं, बल्कि व्यापक सामाजिक संकेत भी है।

कोरियाई औद्योगिक ढांचे में ‘चैबोल’ नामक बड़े कारोबारी समूहों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। SK समूह भी उन्हीं प्रमुख समूहों में शामिल है, जैसे सैमसंग, ह्युंडई या LG। इन समूहों की भर्ती नीतियां अक्सर युवा पीढ़ी की महत्वाकांक्षाओं और श्रम बाजार के रुझानों पर असर डालती हैं। इसलिए SK हाइनिक्स का यह कदम, भले तत्काल पूरे कोरियाई रोजगार बाजार को न बदल दे, फिर भी यह बहस को मुख्यधारा में जरूर ले आता है कि क्या शीर्ष उद्योग अब ‘नामी डिग्री’ के बजाय ‘सिद्ध कौशल’ को वरीयता देने के लिए तैयार हैं।

भारत में भी बड़े उद्योग समूहों—जैसे टाटा, रिलायंस, महिंद्रा, अदाणी, इन्फोसिस, टीसीएस, विप्रो या उन्नत विनिर्माण क्षेत्र की कंपनियों—की भर्ती नीति बाजार को संकेत देती है। अगर कोई विशाल कंपनी यह कहती है कि वह डिग्री के बजाय क्षमता को प्राथमिकता देगी, तो इसका प्रभाव केवल उस कंपनी तक सीमित नहीं रहता; प्रशिक्षण संस्थान, स्किल प्लेटफॉर्म, कॉलेज और नौकरी खोजने वाले उम्मीदवार सभी अपनी रणनीति बदलने लगते हैं। SK हाइनिक्स के साथ भी ऐसा ही हो सकता है।

यहां एक सांस्कृतिक पहलू और समझना जरूरी है। कोरियाई कॉरपोरेट जगत में अनुशासन, संगठनात्मक सामंजस्य और टीम समन्वय को बहुत महत्व दिया जाता है। इसलिए जब कंपनी यह कहती है कि वह अनुभव, कौशल और ‘कॉरपोरेट कल्चर फिट’ को देखेगी, तो उसका मतलब केवल तकनीकी दक्षता नहीं होता। उसमें यह भी शामिल है कि उम्मीदवार तेजी से बदलते माहौल में काम कर सकता है या नहीं, बहु-विभागीय टीमों में सहयोग कर सकता है या नहीं, और संगठन की गति के साथ खुद को ढाल सकता है या नहीं। भारतीय पाठकों के लिए इसे इस तरह समझा जा सकता है कि किसी अच्छे इंजीनियर या डेवलपर से आज केवल तकनीकी ज्ञान नहीं, बल्कि संवाद, अनुकूलन और सहयोग की भी अपेक्षा की जाती है।

‘तीन मसल्स’ की अवधारणा और AI युग का नया कर्मचारी

SK समूह के अध्यक्ष चे ताए-वोन ने हाल के समय में भविष्य की प्रतिभा के लिए तीन तरह की क्षमताओं—जिन्हें रूपक में ‘तीन मसल्स’ कहा गया—पर जोर दिया है। पहली है ‘सोच की मसल’, यानी सवाल पूछने, मूल समस्या तक पहुंचने और सतही उत्तरों से आगे जाने की क्षमता। दूसरी है ‘अनुकूलन की मसल’, यानी नई तकनीकों, नए कारोबारी माहौल और नई चुनौतियों के साथ तेजी से तालमेल बैठाने की शक्ति। तीसरी है ‘सहानुभूति की मसल’, यानी विविध पृष्ठभूमि के लोगों को समझना, सहयोग करना और साझा लक्ष्य के लिए लचीलेपन के साथ काम करना।

यह शब्दावली सुनने में आधुनिक प्रबंधन की भाषा लग सकती है, लेकिन इसके पीछे का संदेश बेहद व्यावहारिक है। AI के दौर में मशीनें रटकर सीखी जाने वाली कई प्रक्रियाओं को तेज और सस्ता बना रही हैं। ऐसे में मनुष्य की उपयोगिता वहीं बढ़ती है जहां जटिल निर्णय, संदर्भ की समझ, रचनात्मक समस्या-समाधान और मानवीय सहयोग की जरूरत होती है। कंपनियां इसलिए अब ऐसे उम्मीदवार ढूंढ रही हैं जो सिर्फ निर्देशों का पालन न करें, बल्कि यह भी समझें कि समस्या क्या है, समाधान किस दिशा में हो सकता है, और बदलती परिस्थितियों में क्या नया सीखा जाना चाहिए।

भारत के नौकरी बाजार में भी यह बदलाव साफ दिखाई दे रहा है। पहले जहां इंजीनियरिंग की डिग्री अपने आप में बड़ी योग्यता मानी जाती थी, वहीं अब नियोक्ता पूछते हैं—आपने क्या बनाया, किस समस्या को सुलझाया, किस तकनीक के साथ काम किया, किस टीम में भूमिका निभाई? इसी तरह पत्रकारिता, डिजाइन, प्रोडक्ट मैनेजमेंट, डेटा साइंस और इलेक्ट्रॉनिक्स में भी पोर्टफोलियो, प्रयोग, इंटर्नशिप और सीखने की लचीली क्षमता महत्व पा रही है। SK हाइनिक्स का कदम इस वैश्विक बदलाव को औद्योगिक पैमाने पर वैधता देता है।

हालांकि यह भी ध्यान रखना चाहिए कि ‘क्षमता’ शब्द जितना आकर्षक लगता है, उसका मूल्यांकन उतना ही जटिल होता है। डिग्री एक स्पष्ट, भले अपूर्ण, संकेतक देती है। लेकिन यदि कंपनियां उससे आगे जाना चाहती हैं, तो उन्हें इंटरव्यू प्रणाली, कौशल-परीक्षण, प्रोजेक्ट-आधारित मूल्यांकन और ऑन-द-जॉब प्रशिक्षण जैसी संरचनाओं को मजबूत करना होगा। दूसरे शब्दों में, AI युग का नया कर्मचारी खोजने के लिए AI युग की नई भर्ती प्रणाली भी चाहिए।

भारत के लिए क्या सीख, खासकर सेमीकंडक्टर मिशन के दौर में?

भारत इस समय सेमीकंडक्टर निर्माण और इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण को राष्ट्रीय प्राथमिकता के रूप में आगे बढ़ा रहा है। केंद्र सरकार का सेमीकंडक्टर मिशन, चिप फैब, डिजाइन इकोसिस्टम, ATMP सुविधाएं और इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण पर जोर इसी रणनीति का हिस्सा हैं। लेकिन किसी भी औद्योगिक नीति की सफलता अंततः लोगों पर निर्भर करती है—इंजीनियर, तकनीशियन, डिजाइनर, शोधकर्ता, सॉफ्टवेयर विशेषज्ञ, प्रक्रिया प्रबंधक और वे हजारों प्रशिक्षित कर्मचारी जो पूरी मूल्य श्रृंखला को चलाते हैं। ऐसे समय में SK हाइनिक्स का कदम भारत के लिए भी विचारणीय है।

हमारे यहां अक्सर ‘स्किल इंडिया’ और ‘डिग्री बनाम कौशल’ पर चर्चा होती है, पर भर्ती बाजार में डिग्री की पकड़ अभी भी बहुत मजबूत है। आईटी सेवाओं के बाहर, खासकर कोर इंजीनियरिंग, इलेक्ट्रॉनिक्स निर्माण, ऑटोमेशन और उच्च तकनीकी उत्पादन में बिना पारंपरिक डिग्री वाले लोगों के लिए बड़े अवसर सीमित रहते हैं। जबकि वास्तविकता यह है कि बहुत-से युवा डिप्लोमा, ऑनलाइन पाठ्यक्रम, उद्योग-प्रशिक्षण, अप्रेंटिसशिप या स्वयं-सीख के जरिए उल्लेखनीय दक्षता हासिल कर लेते हैं। यदि भारतीय उद्योग सचमुच वैश्विक प्रतिस्पर्धा चाहता है, तो उसे प्रतिभा की पहचान के नए रास्ते बनाने होंगे।

यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि इसका अर्थ विश्वविद्यालयों को कमतर आंकना नहीं है। उच्च शिक्षा, बुनियादी विज्ञान, अनुसंधान और संरचित प्रशिक्षण की अपनी अपरिहार्य भूमिका है। समस्या तब होती है जब डिग्री स्वयं लक्ष्य बन जाती है और सीखना पीछे छूट जाता है। भारत और दक्षिण कोरिया, दोनों समाजों में शिक्षा सामाजिक गतिशीलता का बड़ा माध्यम रही है। इसलिए डिग्री का महत्व खत्म नहीं होगा। लेकिन यदि उद्योग यह कहता है कि केवल डिग्री ही पर्याप्त नहीं, तो शैक्षणिक संस्थानों को भी अपने पाठ्यक्रम, उद्योग-संपर्क और व्यावहारिक प्रशिक्षण पर पुनर्विचार करना होगा।

भारतीय युवा पाठकों के लिए इस खबर में एक व्यावहारिक संदेश भी छिपा है। नौकरी का भविष्य केवल प्रमाणपत्रों का ढेर लगाने में नहीं, बल्कि ऐसे काम करने में है जिन्हें दिखाया जा सके—परियोजनाएं, प्रोटोटाइप, कोड, डिजाइन, शोध, इंटर्नशिप, प्रतिस्पर्धी समस्याओं का समाधान, टीम में काम का अनुभव। यानी रिज्यूमे का भविष्य संभवतः कम शब्दों और अधिक प्रमाण में है। कोरिया की यह खबर उसी दिशा का संकेत देती है।

अवसर बड़ा है, पर असली कसौटी अमल में होगी

SK हाइनिक्स की नई नीति को अभी अंतिम निष्कर्ष की तरह नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि एक प्रयोग की तरह समझना चाहिए जिसका असर दूरगामी हो सकता है। कंपनी ने जिस तरह संकेत दिया है कि आगे सभी भर्ती प्रक्रियाओं में शैक्षणिक सीमा हटाने का सिद्धांत अपनाया जाएगा, उससे यह स्पष्ट है कि यह कोई एक बार का प्रचारात्मक कदम नहीं, बल्कि दीर्घकालिक दिशा-परिवर्तन हो सकता है। लेकिन इसकी सफलता इस पर निर्भर करेगी कि क्या चयनित उम्मीदवार वास्तव में विविध पृष्ठभूमियों से आएंगे, क्या वे संगठन में अच्छा प्रदर्शन करेंगे, और क्या कंपनी मूल्यांकन की ऐसी प्रणाली विकसित कर पाएगी जिस पर उद्योग भरोसा कर सके।

वैश्विक AI चिप प्रतिस्पर्धा में आज पूंजी, मशीन और बुनियादी ढांचे के साथ-साथ मानव संसाधन सबसे निर्णायक तत्व बन चुका है। अमेरिका, ताइवान, दक्षिण कोरिया, चीन, जापान और अब भारत—सभी यह समझ रहे हैं कि प्रतिभा की दौड़, तकनीक की दौड़ से अलग नहीं है। SK हाइनिक्स का यह फैसला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह बताता है कि कंपनियां अब चिप बनाने से पहले प्रतिभा चुनने के तरीके बदल रही हैं। अगर भविष्य की तकनीक को बनाने वाले लोग पुराने ढांचों से नहीं चुने जा सकते, तो भर्ती के पुराने ढांचे भी बदलने ही होंगे।

भारतीय समाज के लिए यह खबर एक आईना भी है और एक संकेत भी। आईना इसलिए, क्योंकि हम अभी भी योग्यता को अक्सर डिग्री, अंक और संस्थान के नाम से जोड़ते हैं। संकेत इसलिए, क्योंकि दुनिया के सबसे प्रतिस्पर्धी तकनीकी क्षेत्रों में से एक अब यह मान रहा है कि असली पूंजी वह व्यक्ति है जो सीख सकता है, बदल सकता है, मिलकर काम कर सकता है और जटिल समस्या को पकड़कर उसका हल ढूंढ सकता है। यही वह दिशा है जिसमें आने वाले वर्षों में वैश्विक रोजगार बाजार आगे बढ़ सकता है।

आखिरकार सवाल केवल इतना नहीं कि SK हाइनिक्स ने भर्ती नियम बदले। बड़ा सवाल यह है कि क्या AI युग में उद्योग, शिक्षा और समाज मिलकर प्रतिभा की नई परिभाषा लिखने के लिए तैयार हैं। दक्षिण कोरिया की यह घटना बताती है कि कम-से-कम कुछ बड़ी कंपनियां उस दिशा में कदम बढ़ा चुकी हैं। अब नजर इस पर रहेगी कि क्या यह बदलाव कागज से निकलकर फैक्टरियों, डिजाइन लैब्स, रिसर्च टीमों और वैश्विक नवाचार की दौड़ में ठोस परिणाम देता है। अगर ऐसा हुआ, तो यह भर्ती नीति का मामूली संशोधन नहीं, बल्कि 21वीं सदी के तकनीकी श्रम बाजार का एक नया अध्याय साबित हो सकता है।

Source: Original Korean article - Trendy News Korea

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