तेजी से उम्रदराज़ होता समाज और देखभाल व्यवस्था पर दबाव
दक्षिण कोरिया आज दुनिया के सबसे तेज़ी से बूढ़े होते समाजों में शामिल है, और इसी के साथ देश एक गंभीर बुजुर्ग देखभाल संकट का सामना कर रहा है। कम जन्मदर, लंबी आयु और परिवार संरचना में बदलाव ने पारंपरिक देखभाल मॉडल को कमजोर कर दिया है। पहले जहां बुजुर्गों की देखभाल परिवार, विशेषकर बेटों और बहुओं की जिम्मेदारी मानी जाती थी, वहीं अब शहरीकरण, छोटे परिवार और अकेले रहने की बढ़ती प्रवृत्ति ने इस सामाजिक व्यवस्था की नींव हिला दी है। नतीजा यह है कि बड़ी संख्या में बुजुर्ग या तो अकेले रह रहे हैं, या ऐसी संस्थागत सेवाओं पर निर्भर हैं जो पहले से ही क्षमता और संसाधनों की कमी से जूझ रही हैं।
सरकारी आंकड़े और सामाजिक अध्ययनों से संकेत मिलता है कि दक्षिण कोरिया में 65 वर्ष से अधिक आयु के नागरिकों की संख्या लगातार बढ़ रही है। इसके साथ ही डिमेंशिया, गतिशीलता संबंधी समस्याएं, पुरानी बीमारियां और मानसिक स्वास्थ्य संकट भी बढ़े हैं। ग्रामीण इलाकों में स्थिति और चिंताजनक है, जहां युवा पीढ़ी रोजगार के लिए शहरों की ओर पलायन कर चुकी है। वहां पीछे छूटे बुजुर्गों के पास न पर्याप्त स्वास्थ्य सेवाएं हैं, न नियमित सामाजिक संपर्क। कई मामलों में ‘एकाकी मृत्यु’ जैसी घटनाएं भी राष्ट्रीय चिंता का विषय बनी हैं, जो इस संकट की मानवीय कीमत को उजागर करती हैं।
कम वेतन, श्रम संकट और बढ़ती सामाजिक असमानता
बुजुर्ग देखभाल संकट का एक बड़ा कारण देखभाल क्षेत्र में श्रमिकों की कमी है। नर्सिंग होम, डे-केयर सेंटर और घरेलू देखभाल सेवाओं में काम करने वाले कर्मचारियों पर काम का दबाव बहुत अधिक है, जबकि वेतन अपेक्षाकृत कम है। इस कारण प्रशिक्षित कर्मियों को बनाए रखना कठिन हो रहा है। देखभाल कार्य अक्सर शारीरिक रूप से कठिन और भावनात्मक रूप से थकाने वाला होता है, लेकिन सामाजिक प्रतिष्ठा और आर्थिक सुरक्षा दोनों सीमित हैं। कई संस्थानों में कर्मचारियों की कमी के चलते एक कार्यकर्ता को कई बुजुर्गों की जिम्मेदारी उठानी पड़ती है, जिससे सेवा की गुणवत्ता प्रभावित होती है।
आर्थिक असमानता ने भी इस संकट को गहरा किया है। दक्षिण कोरिया में बुजुर्ग गरीबी दर विकसित देशों में सबसे ऊंची मानी जाती है। सीमित पेंशन, बढ़ती जीवन-यापन लागत और चिकित्सा खर्च ने बड़ी संख्या में वरिष्ठ नागरिकों को असुरक्षित बना दिया है। जो परिवार निजी देखभाल सेवाओं का खर्च उठा सकते हैं, उन्हें अपेक्षाकृत बेहतर विकल्प मिल जाते हैं, लेकिन निम्न आय वर्ग के बुजुर्ग सार्वजनिक तंत्र की सीमित सुविधाओं पर निर्भर रहते हैं। इस असमानता का असर सिर्फ स्वास्थ्य पर नहीं, बल्कि गरिमा, स्वतंत्रता और जीवन की गुणवत्ता पर भी पड़ता है।
सरकारी प्रयास, लेकिन आगे लंबी राह
सियोल सरकार ने दीर्घकालिक देखभाल बीमा, सामुदायिक देखभाल कार्यक्रमों और डिमेंशिया सहायता केंद्रों जैसे कई उपाय शुरू किए हैं। स्थानीय प्रशासन भी अकेले रहने वाले बुजुर्गों की निगरानी, भोजन सहायता और आपातकालीन प्रतिक्रिया तंत्र को मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं। फिर भी विशेषज्ञों का मानना है कि मौजूदा कदम संकट की गति के मुकाबले अपर्याप्त हैं। जरूरत सिर्फ अधिक संस्थानों की नहीं, बल्कि एक व्यापक नीति ढांचे की है जिसमें घरेलू देखभाल, सामुदायिक भागीदारी, तकनीक आधारित निगरानी, देखभाल कर्मियों का बेहतर प्रशिक्षण और सम्मानजनक वेतन शामिल हों।
दक्षिण कोरिया का बुजुर्ग देखभाल संकट केवल एक कल्याणकारी चुनौती नहीं, बल्कि सामाजिक अनुबंध की परीक्षा है। यदि राज्य, परिवार और समाज मिलकर नई देखभाल व्यवस्था नहीं गढ़ते, तो आने वाले वर्षों में यह संकट और गहरा सकता है। एशिया के कई देशों की तरह कोरिया भी इस प्रश्न से जूझ रहा है कि लंबी उम्र को सम्मानजनक जीवन में कैसे बदला जाए। फिलहाल, यही इस बहस का केंद्रीय मुद्दा है।
0 टिप्पणियाँ