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सिर्फ पांच जीवित गवाह बचे: दक्षिण कोरिया के लिए यह शोक-सूचना नहीं, इतिहास, कल्याण और शिक्षा की अंतिम चेतावनी है

सिर्फ पांच जीवित गवाह बचे: दक्षिण कोरिया के लिए यह शोक-सूचना नहीं, इतिहास, कल्याण और शिक्षा की अंतिम चेतावनी है

घटती संख्या, बढ़ता सवाल: पांच जीवित पीड़िताओं का अर्थ क्या है

दक्षिण कोरिया से आई हालिया खबर सामान्य मृत्यु समाचार की तरह पढ़ी जा सकती थी, लेकिन उसका अर्थ कहीं अधिक गहरा है. जापानी सेना की तथाकथित ‘कंफर्ट वुमन’ व्यवस्था की एक और पीड़िता के निधन के बाद अब सरकार में पंजीकृत जीवित पीड़िताओं की संख्या घटकर केवल पांच रह गई है. यह आंकड़ा महज जनगणना का तथ्य नहीं, बल्कि समय के दरवाजे पर दस्तक देती एक ऐतिहासिक चेतावनी है. किसी भी समाज के लिए वह क्षण बेहद निर्णायक होता है, जब इतिहास के प्रत्यक्ष साक्षी लगभग समाप्त हो जाते हैं और आने वाली पीढ़ियों को सच तक पहुंचने के लिए दस्तावेजों, अभिलेखों और संस्थागत स्मृति पर निर्भर होना पड़ता है.

भारतीय पाठकों के लिए इस खबर का महत्व समझना कठिन नहीं होना चाहिए. हमारे यहां भी विभाजन, 1984, गुजरात 2002, भोपाल गैस त्रासदी, आपातकाल, दंगों और जातीय हिंसा जैसी घटनाओं के संदर्भ में बार-बार यह सवाल उठता रहा है कि जब प्रत्यक्षदर्शी नहीं रहेंगे, तब सच की रक्षा कौन करेगा. दक्षिण कोरिया का यह क्षण उसी तरह का है. वहां ‘वियानबु’ यानी जापानी सैन्य यौन दासता की पीड़ित महिलाओं का मुद्दा केवल अतीत का घाव नहीं, बल्कि राष्ट्रीय नैतिकता, महिला अधिकार, राज्य की जिम्मेदारी और स्मृति-राजनीति का केंद्र है.

यहां यह भी समझना जरूरी है कि ‘कंफर्ट वुमन’ शब्द स्वयं एक ऐतिहासिक रूप से विवादित और भ्रामक अभिव्यक्ति है. यह ऐसा शब्द था जिसका इस्तेमाल जापानी साम्राज्यवादी तंत्र ने युद्धकालीन यौन शोषण को नरम भाषा में ढंकने के लिए किया. वास्तविकता में अनेक महिलाएं और किशोरियां धोखे, दबाव, अपहरण, गरीबी या औपनिवेशिक दमन के बीच यौन दासता में धकेली गईं. दक्षिण कोरिया में यह मुद्दा इसलिए और संवेदनशील है क्योंकि कोरिया 1910 से 1945 तक जापानी उपनिवेश रहा. इस औपनिवेशिक पृष्ठभूमि में महिलाओं पर हुआ यह अपराध व्यक्तिगत नहीं, राष्ट्रीय स्मृति का हिस्सा बन गया.

अब जब केवल पांच जीवित पीड़िताएं बची हैं, तो प्रश्न यह नहीं रह जाता कि इतिहास को याद रखना चाहिए या नहीं. प्रश्न यह है कि उस इतिहास को किस रूप में बचाया जाएगा, किस भाषा में समझाया जाएगा, किन संस्थाओं में सुरक्षित रखा जाएगा और उन अंतिम जीवित पीड़िताओं को सम्मानपूर्ण जीवन कैसे दिया जाएगा. यही इस खबर का सबसे बड़ा अर्थ है.

गवाही के युग से अभिलेखों के युग में प्रवेश

दक्षिण कोरिया में इस मुद्दे के सार्वजनिक विमर्श का एक बड़ा मोड़ 1991 में आया था, जब दिवंगत किम हाक-सून ने सार्वजनिक रूप से अपनी पीड़ा साझा की. यह केवल व्यक्तिगत साहस का क्षण नहीं था; इसी ने राज्य, समाज, मीडिया और अंतरराष्ट्रीय समुदाय को मजबूर किया कि वे दशकों से दबे हुए एक सच की ओर देखें. उनके बाद अनेक पीड़िताओं ने अदालतों, प्रेस कॉन्फ्रेंस, किताबों, वीडियो रिकॉर्डिंग और जनसभाओं के जरिए अपनी बातें रखीं. इन गवाहियों ने इतिहास को पाठ्यपुस्तक के सूखे अध्याय से निकालकर जीवित नैतिक प्रश्न बना दिया.

अब वही समाज एक निर्णायक संक्रमण से गुजर रहा है. पहले इतिहास ‘पीड़िता बोल रही है’ के रूप में मौजूद था. अब इतिहास को ‘दस्तावेज बोलें’ के रूप में संरक्षित करना होगा. यह परिवर्तन साधारण प्रशासनिक बदलाव नहीं है. मौखिक गवाही में आवाज, विराम, आंसू, स्मृति की हिचक और दर्द की मानवीय उपस्थिति होती है. अभिलेख में तथ्यों की निरंतरता, संदर्भ की स्पष्टता और संस्थागत विश्वसनीयता की चुनौती होती है. प्रत्यक्ष गवाही घटने के साथ यह जिम्मेदारी कई गुना बढ़ जाती है कि पहले से उपलब्ध सामग्री को बिखरने, गलत व्याख्या या राजनीतिक दुरुपयोग से बचाया जाए.

भारतीय परिप्रेक्ष्य में देखें तो यह कुछ वैसा ही है जैसे स्वतंत्रता आंदोलन, विभाजन या 1975 के आपातकाल पर अब हमारी निर्भरता तेजी से व्यक्तिगत स्मृतियों से हटकर दस्तावेजों, फोटोग्राफ, सरकारी फाइलों, पत्रकारिता अभिलेखों और मौखिक इतिहास परियोजनाओं पर बढ़ रही है. यदि इन्हें समय रहते सुव्यवस्थित न किया जाए तो बाद की पीढ़ियां आधे-अधूरे, तोड़े-मरोड़े या वैचारिक रूप से छांटे गए तथ्यों के आधार पर इतिहास समझेंगी.

दक्षिण कोरिया के सामने इसलिए असली चुनौती सिर्फ सामग्री इकट्ठा करना नहीं, बल्कि उसे संदर्भ सहित सुरक्षित रखना है. किस गवाही का रिकॉर्ड कब लिया गया, किन परिस्थितियों में लिया गया, उसका मूल स्वरूप क्या है, उसके अनुवाद कितने प्रमाणिक हैं, उसका संबंध अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार कानून और युद्धकालीन यौन हिंसा की वैश्विक समझ से कैसे जुड़ता है—ये सब प्रश्न अब केंद्रीय हो गए हैं. इतिहास केवल तथ्यों का ढेर नहीं होता; इतिहास वह संरचना है जिसमें तथ्य, संदर्भ, नैतिक अर्थ और सार्वजनिक पहुंच एक साथ काम करते हैं.

यह केवल इतिहास नहीं, बुजुर्ग देखभाल और गरिमा का भी प्रश्न है

इस खबर का दूसरा महत्वपूर्ण पक्ष अक्सर भावनात्मक बहसों में दब जाता है. शेष बची पीड़िताएं अत्यंत वृद्ध हैं. ऐसे में उनके लिए सम्मानपूर्ण जीवन सुनिश्चित करना सिर्फ स्मारक राजनीति का मुद्दा नहीं, बल्कि कल्याणकारी राज्य की बुनियादी परीक्षा है. स्वास्थ्य सेवाएं, नियमित चिकित्सा, मानसिक सहारा, ट्रॉमा-संवेदनशील देखभाल, निजी इच्छा का सम्मान, सुरक्षित आवास, शोक और अंतिम संस्कार से जुड़े प्रावधान—ये सब प्रशासनिक शब्द लग सकते हैं, पर इन्हीं के भीतर सभ्यता की असली कसौटी छिपी होती है.

भारत में भी हम यह सवाल बार-बार देखते हैं कि ऐतिहासिक अन्याय या सामूहिक हिंसा के पीड़ितों के साथ राज्य समय बीतने के बाद कैसा व्यवहार करता है. शुरू में मुआवजे, जांच आयोग और राजनीतिक बयान सुर्खियां बनते हैं; फिर धीरे-धीरे पीड़ित लोग कल्याणकारी व्यवस्था की अनदेखी के शिकार हो जाते हैं. दक्षिण कोरिया के मामले में यह जोखिम और भी बड़ा है, क्योंकि संख्या कम होने पर सरकारों में यह भ्रम पैदा हो सकता है कि मामला अब ‘समाप्ति’ की ओर है. वास्तव में ठीक उलटा सच है—जैसे-जैसे पीड़िताएं कम होती जाती हैं, प्रत्येक व्यक्ति के लिए अधिक सघन, अधिक व्यक्तिगत और अधिक संवेदनशील सहयोग की जरूरत बढ़ती जाती है.

ट्रॉमा-संवेदनशील देखभाल का अर्थ यहां विशेष रूप से समझना चाहिए. युद्धकालीन यौन हिंसा की शिकार महिलाएं अक्सर उम्र के अंतिम दौर में भी पुराने अनुभवों के असर से जूझती हैं. अस्पताल, सरकारी दफ्तर या सार्वजनिक कार्यक्रम उनके लिए असहज हो सकते हैं. इसलिए चिकित्सा व्यवस्था को सामान्य वृद्ध सेवा की तरह नहीं, बल्कि विशेष संवेदनशीलता के साथ काम करना चाहिए. यह भी जरूरी है कि प्रशासन पीड़िता को केवल ‘राष्ट्रीय प्रतीक’ न बना दे, बल्कि एक व्यक्ति के रूप में उसकी निजता, इच्छा और आराम का सम्मान करे.

यहां भारत के पाठकों के लिए एक परिचित तुलना की जा सकती है. जैसे हम स्वतंत्रता सेनानियों, युद्ध विधवाओं या जातीय हिंसा के बचे हुए गवाहों के लिए केवल सम्मान समारोह से संतुष्ट नहीं हो सकते, वैसे ही दक्षिण कोरिया को भी प्रतीकात्मक श्रद्धांजलि से आगे बढ़ना होगा. यदि जीवित पीड़िता का स्वास्थ्य बिखरा हो, अकेलापन बढ़ रहा हो या संस्थागत मदद असंगठित हो, तो स्मृति की पूरी राजनीति खोखली हो जाती है.

शिक्षा का अगला चरण: शोक से आगे, तथ्य-जांच और नागरिक समझ तक

जैसे-जैसे प्रत्यक्ष गवाह कम होंगे, स्कूलों और विश्वविद्यालयों में इस विषय को पढ़ाने का तरीका भी बदलना पड़ेगा. अब तक दक्षिण कोरिया में छात्र कभी-कभी पीड़िताओं के व्याख्यान सुनते थे, प्रदर्शनियां देखते थे, बुधवार के नियमित विरोध प्रदर्शनों के बारे में पढ़ते थे और इस तरह इतिहास से भावनात्मक रिश्ता बनाते थे. लेकिन आगे चलकर यह मॉडल सीमित होगा. तब शिक्षा को और अधिक शोधपरक, स्रोत-आधारित और मीडिया साक्षरता से जुड़ा बनाना पड़ेगा.

भारत में हम पहले से देख रहे हैं कि सोशल मीडिया के दौर में इतिहास अक्सर क्लिप, पोस्ट, मीम और वैचारिक नारे में बदल जाता है. दक्षिण कोरिया में भी जापानी सैन्य यौन दासता के मुद्दे पर गलत सूचनाएं, संदर्भहीन दावे और राजनीतिक एजेंडों से प्रेरित विकृतियां डिजिटल माध्यमों में फैल सकती हैं. प्रत्यक्ष गवाही कम होने का मतलब है कि झूठ को चुनौती देना कठिन हो सकता है, यदि समाज ने दस्तावेज पढ़ने और जांचने की क्षमता विकसित नहीं की.

इसलिए शिक्षा को केवल ‘यह घटना हुई थी’ तक सीमित नहीं रहना चाहिए. छात्रों को यह भी सिखाना होगा कि प्राथमिक स्रोत क्या होते हैं, सरकारी अभिलेख और निजी गवाही में क्या अंतर है, तस्वीरें और वीडियो किस तरह सत्यापन मांगते हैं, अनुवाद में अर्थ कैसे बदल सकता है, और किसी भी दावे के पीछे स्रोत की विश्वसनीयता कैसे परखी जाती है. यह इतिहास शिक्षा के साथ-साथ मीडिया साक्षरता और लोकतांत्रिक नागरिकता का प्रशिक्षण भी है.

एक और संतुलन जरूरी है. पीड़िताओं की कहानी को केवल दुख और दया की दृष्टि से प्रस्तुत करना पर्याप्त नहीं. यह विषय महिला अधिकार, युद्धकालीन यौन हिंसा, औपनिवेशिक दमन, राज्य की जवाबदेही, क्षमा और प्रतिपूर्ति के अंतरराष्ट्रीय मानकों, और लोकतांत्रिक समाज में स्मृति की भूमिका जैसे व्यापक सवालों से भी जुड़ता है. यदि शिक्षा इस मुद्दे को केवल ‘राष्ट्रीय अपमान’ या ‘दर्दनाक स्मृति’ के फ्रेम में रखेगी तो उसका दायरा सीमित रह जाएगा. यदि इसे मानवाधिकार और नागरिक विवेक की कसौटी के रूप में पढ़ाया जाएगा, तो नई पीढ़ी इससे आज के समाज के लिए भी सबक निकालेगी.

भारतीय अनुभव भी यही बताता है. जब इतिहास को केवल परीक्षा के तथ्य की तरह पढ़ाया जाता है तो छात्र उसे भूल जाते हैं; जब उसे समकालीन नैतिक प्रश्न से जोड़ा जाता है, तब वह समाज की चेतना का हिस्सा बनता है. दक्षिण कोरिया के लिए भी यह क्षण शिक्षा के परिष्कार का है, न कि संकुचन का.

नागरिक समाज, स्मारक और ‘याद’ करने के बदलते तरीके

दक्षिण कोरिया में इस मुद्दे को जीवित रखने में नागरिक समाज की भूमिका असाधारण रही है. नियमित विरोध प्रदर्शन, स्मारक मूर्तियां, प्रदर्शनी, स्थानीय अभियान, शोध प्रकाशन और अंतरराष्ट्रीय एकजुटता—इन सबने इस विषय को केवल सरकारी फाइलों में दबने नहीं दिया. विशेष रूप से सियोल में जापानी दूतावास के सामने होने वाले ‘बुधवार प्रदर्शन’ ने इसे वैश्विक न्याय के प्रश्न में बदल दिया. अनेक युवाओं ने इन्हीं अभियानों के जरिए पहली बार इस इतिहास को जाना.

लेकिन अब जब प्रत्यक्ष पीड़िताएं बहुत कम रह गई हैं, तो स्मरण की पद्धति भी बदलनी होगी. केवल औपचारिक समारोह, फूल चढ़ाना या हर वर्ष वही भाषण दोहराना पर्याप्त नहीं रहेगा. नई पीढ़ी तक पहुंचने के लिए डिजिटल संग्रहालय, इंटरएक्टिव अभिलेख, मल्टीमीडिया शिक्षा, स्थानीय भाषाओं में सामग्री, अंतरराष्ट्रीय संदर्भ सहित प्रदर्शनियां और समुदाय-आधारित संवाद कार्यक्रम अधिक प्रभावी होंगे. स्मृति को जीवित रखने का अर्थ केवल रस्म निभाना नहीं, बल्कि उसे नई सामाजिक भाषा देना है.

यह सवाल भारत में भी प्रासंगिक है. हमारे यहां भी अनेक स्मारक और वर्षगांठ समारोह अक्सर प्रतीकात्मकता तक सीमित हो जाते हैं. जब तक वे नागरिक समाज, विद्यालयों, स्थानीय इतिहास और डिजिटल पहुंच से नहीं जुड़ते, वे जीवित स्मृति नहीं बन पाते. दक्षिण कोरिया के लिए भी यही चुनौती है कि स्मृति केवल पुरानी पीढ़ी की भावनात्मक जिम्मेदारी न रहे, बल्कि युवाओं के लिए समझने योग्य सार्वजनिक ज्ञान बने.

यहां एक और सूक्ष्म बिंदु है. स्मरण की राजनीति में कभी-कभी पीड़ित व्यक्ति ‘मानव’ से ‘प्रतीक’ बन जाता है. प्रतीक शक्तिशाली होते हैं, पर वे जटिल जीवन को सरल कथा में बदल सकते हैं. इसलिए जरूरी है कि स्मारक और सार्वजनिक अभियानों में पीड़िताओं की निजी आवाज, विविध अनुभव, क्षेत्रीय पृष्ठभूमि और जीवन की पूर्णता भी सामने आए. वे केवल पीड़ा की प्रतिमा नहीं थीं; वे बेटियां, बहनें, श्रमिक, नागरिक, स्मृति की संरक्षिका और न्याय की मांग करने वाली महिलाएं भी थीं.

राज्य की अगली परीक्षा: बिखरे अभिलेख, एकीकृत नीति और संस्थागत जिम्मेदारी

इस पूरी बहस का सबसे व्यावहारिक और शायद सबसे जरूरी हिस्सा संस्थागत तैयारी है. यदि संबंधित सामग्री सरकार, स्थानीय निकायों, संग्रहालयों, महिला संगठनों, शोध संस्थानों और निजी अभिलेखागार में बिखरी हुई है, तो समय बीतने के साथ उसकी पहुंच और विश्वसनीयता दोनों प्रभावित हो सकती हैं. दक्षिण कोरिया को अब एक समन्वित राष्ट्रीय ढांचे की जरूरत है, जिसमें मानकीकृत मेटाडेटा, दीर्घकालिक डिजिटल संरक्षण, मूल दस्तावेजों की सुरक्षा, शोधकर्ताओं के लिए नियंत्रित पहुंच, विद्यालयों हेतु प्रमाणित सामग्री और बहुभाषी संदर्भ-व्याख्या शामिल हों.

यह ऐसा काम नहीं जिसे केवल संस्कृति मंत्रालय, महिला मंत्रालय या शिक्षा विभाग अकेले संभाल लें. इसके लिए अंतर-विभागीय व्यवस्था चाहिए. स्वास्थ्य विभाग को जीवित पीड़िताओं की देखभाल देखनी होगी, अभिलेख संस्थानों को रिकॉर्ड का संरक्षण करना होगा, शिक्षा तंत्र को पाठ्य सामग्री और प्रशिक्षण विकसित करना होगा, स्थानीय निकायों को स्मरण और सामुदायिक कार्यक्रमों का दायित्व लेना होगा, और डिजिटल मंचों को गलत सूचना से निपटने के लिए सुसंगत रणनीति बनानी होगी.

भारतीय प्रशासनिक अनुभव से देखें तो ऐसे मामलों में सबसे बड़ी समस्या विभागीय विखंडन होती है. एक मंत्रालय स्मारक बनाता है, दूसरा पाठ्यक्रम बदलता है, तीसरा रिकॉर्ड सुरक्षित रखता है, चौथा पीड़ितों के लिए सहायता योजना चलाता है—लेकिन इन सबके बीच कोई साझा तंत्र नहीं होता. परिणाम यह कि न नीति पूरी बनती है, न स्मृति स्थिर रहती है. दक्षिण कोरिया के लिए यह वही क्षण है जब उसे इतिहास-नीति, कल्याण-नीति और शिक्षा-नीति को एक संयुक्त ढांचे में देखना होगा.

विशेषज्ञ लंबे समय से यह भी कहते रहे हैं कि जैसे-जैसे प्रत्यक्ष गवाह कम होते हैं, वैसे-वैसे दस्तावेजों के साथ व्याख्यात्मक सामग्री और अधिक जरूरी हो जाती है. केवल स्कैन की हुई फाइलें ऑनलाइन डाल देना काफी नहीं. साथ में यह भी बताना होगा कि स्रोत क्या है, उसकी सीमा क्या है, उसका उपयोग कैसे किया जाए और कौन-सी बातें अभी भी शोध का विषय हैं. यही अंतर जिम्मेदार अभिलेखीकरण और सतही डिजिटल अपलोड में होता है.

कूटनीति से आगे की बात: असली चुनौती घरेलू व्यवस्था दुरुस्त करने की है

इस मुद्दे को अक्सर जापान-दक्षिण कोरिया संबंधों के दायरे में ही देखा जाता है. निस्संदेह, माफी, कानूनी जिम्मेदारी, प्रतिपूर्ति और ऐतिहासिक स्वीकार्यता पर द्विपक्षीय संबंधों में तनाव बना रहा है. लेकिन केवल विदेश नीति के चश्मे से इस खबर को देखना अधूरा होगा. अभी जो सबसे तात्कालिक और ठोस सवाल खड़े हैं, वे दक्षिण कोरिया की घरेलू प्रशासनिक क्षमता से जुड़े हैं—शेष पीड़िताओं को कैसे संभाला जाएगा, रिकॉर्ड को कैसे एकीकृत किया जाएगा, शिक्षा को कैसे अद्यतन किया जाएगा, और गलत सूचना से कैसे मुकाबला होगा.

भारत में भी हम जानते हैं कि अंतरराष्ट्रीय बयानबाजी या ऊंचे राजनीतिक भाषण से जमीन पर न्याय नहीं आता. न्याय तब आता है जब संस्थाएं काम करती हैं, दस्तावेज सुरक्षित रहते हैं, पीड़ित व्यक्ति को वास्तविक सुविधा मिलती है और समाज में स्मृति का जिम्मेदार संचरण होता है. दक्षिण कोरिया के सामने यही बुनियादी कसौटी है. यदि केवल बयान दिए गए और भीतर की व्यवस्था कमजोर रही, तो इतिहास का सम्मान अधूरा रह जाएगा.

यह भी ध्यान देने योग्य है कि जैसे-जैसे समय बीतता है, सार्वजनिक स्मृति का स्वर बदलता है. शोक पहले आता है, फिर प्रतीक, फिर पाठ्यपुस्तक, फिर कभी-कभी थकान. किसी भी समाज की नैतिक परिपक्वता इसी में है कि वह इस थकान को पहचानकर भी इतिहास को सजीव और जिम्मेदार रूप से संभाले. पांच जीवित पीड़िताओं का अर्थ यही है कि दक्षिण कोरिया ‘अंतिम गवाही’ के दौर में है. अब देर से की गई तैयारी, तैयारी नहीं बल्कि चूक कहलाएगी.

भारत के लिए सबक: इतिहास केवल याद करने की चीज नहीं, संस्थागत जिम्मेदारी भी है

दक्षिण कोरिया की यह खबर भारत के लिए भी आईना है. हम अक्सर इतिहास पर भावुक बहस करते हैं, स्मारक बनाते हैं, वर्षगांठ मनाते हैं, लेकिन क्या हम अपने कठिन अतीत के अभिलेखों को व्यवस्थित रूप से सहेजते हैं? क्या हम बचे हुए गवाहों की रिकॉर्डिंग समय रहते करते हैं? क्या हम स्कूलों में दर्दनाक इतिहास को इस तरह पढ़ाते हैं कि बच्चे तथ्य, संवेदना और सत्यापन—तीनों सीखें? क्या हम पीड़ितों को केवल नैतिक प्रतीक बनाकर छोड़ देते हैं, या उनके जीवन की व्यावहारिक गरिमा का भी ध्यान रखते हैं?

दक्षिण कोरिया में जीवित पीड़िताओं की संख्या पांच रह जाना हमें यह समझाता है कि इतिहास के साथ समय-सीमा जुड़ी होती है. न्याय की भाषा जितनी नैतिक होती है, उतनी ही प्रशासनिक भी. यदि रिकॉर्ड बिखरे रह गए, यदि शिक्षा पुरानी पद्धति में अटकी रही, यदि बुजुर्ग पीड़िताओं की देखभाल ढीली रही, यदि समाज ने डिजिटल झूठ का मुकाबला नहीं किया, तो बाद में शोक तो बचेगा, पर सत्य कमजोर पड़ जाएगा.

अंततः यह खबर एक वृद्ध महिला के निधन की सूचना भर नहीं है. यह उस समाज के सामने खड़ा प्रश्नपत्र है जो दशकों से कहता आया है कि वह इतिहास को भूलेगा नहीं. अब उसे साबित करना होगा कि ‘न भूलना’ केवल नारा नहीं, नीति भी है; केवल स्मारक नहीं, सेवा भी है; केवल अतीत नहीं, वर्तमान की जिम्मेदारी भी है. और शायद यही बात भारत जैसे देशों के लिए भी उतनी ही महत्वपूर्ण है, जहां इतिहास की लड़ाइयां अक्सर स्मृति और राजनीति के बीच उलझ जाती हैं, जबकि असली काम अभिलेख, शिक्षा, देखभाल और संस्थागत ईमानदारी का होता है.

दक्षिण कोरिया के लिए समय तेजी से कम हो रहा है. पांच जीवित पीड़िताएं यह याद दिलाने के लिए काफी हैं कि कुछ ऐतिहासिक प्रश्नों पर समाज को निर्णय तुरंत लेने पड़ते हैं. बाद में लिखा गया शोकलेख कभी उस तैयारी की भरपाई नहीं कर सकता, जो समय रहते की जानी चाहिए थी.

Source: Original Korean article - Trendy News Korea

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