
सियोल का संकेत, लेकिन कहानी पूरे महानगरीय समाज की
दक्षिण कोरिया की राजधानी सियोल में किराये के आवास बाजार से एक बड़ा संकेत मिला है। हाल की रिपोर्टों के अनुसार, शहर में ‘जोंसे’ यानी बड़े सुरक्षा जमा पर आधारित लीज व्यवस्था वाले उपलब्ध घरों की संख्या करीब 33 प्रतिशत घट गई है। इसी के साथ सियोल के आसपास ग्योंगगी प्रांत के छह इलाकों में घरों की कीमतों में वृद्धि राष्ट्रीय स्तर पर सबसे ऊंचे समूह में दर्ज की गई है। पहली नजर में यह केवल रियल एस्टेट का एक तकनीकी आंकड़ा लग सकता है, लेकिन असल में यह शहरी जीवन, परिवारों की आर्थिक योजना, बच्चों की पढ़ाई, दफ्तर आने-जाने की दूरी और मध्यमवर्गीय सुरक्षा-बोध तक को प्रभावित करने वाला बदलाव है।
भारतीय पाठकों के लिए यहां एक जरूरी बात समझना आवश्यक है। कोरिया का ‘जोंसे’ मॉडल भारत के सामान्य किराये जैसा नहीं है। भारत में आमतौर पर किरायेदार हर महीने किराया देता है और साथ में दो-तीन महीने का सिक्योरिटी डिपॉजिट जमा करता है। लेकिन कोरिया के जोंसे सिस्टम में किरायेदार मकान मालिक को बहुत बड़ी एकमुश्त राशि सुरक्षा जमा के रूप में देता है और बदले में तय अवधि तक बिना मासिक किराये या बहुत कम किराये पर रह सकता है। यह राशि इतनी बड़ी होती है कि भारतीय संदर्भ में इसे कई बार किसी छोटे शहर के फ्लैट की डाउन पेमेंट या उससे भी अधिक के बराबर समझा जा सकता है। अनुबंध की अवधि खत्म होने पर मकान मालिक को यह जमा राशि लौटानी होती है।
अब जब सियोल में ऐसे जोंसे घरों की उपलब्धता तेजी से घट रही है, तो इसका असर केवल इतना नहीं है कि ‘घर महंगे हो गए’। अधिक महत्वपूर्ण यह है कि विकल्प कम हो गए हैं। विकल्पों की कमी का मतलब है कि किरायेदारों के पास मोलभाव की गुंजाइश घट जाती है, निर्णय लेने का समय कम हो जाता है और परिवारों को अपनी पसंद के इलाके, बच्चों के स्कूल, दफ्तर की दूरी और बजट के बीच कठिन समझौते करने पड़ते हैं। यही वजह है कि यह खबर केवल कोरिया की नहीं, बल्कि दिल्ली-एनसीआर, मुंबई महानगर क्षेत्र, बेंगलुरु, पुणे और हैदराबाद जैसे भारतीय शहरी इलाकों के लिए भी गहरे अर्थ रखती है।
जब किसी बड़े शहर के केंद्र में रहने की लागत और विकल्प दोनों एक साथ बदलते हैं, तो लोग केवल मकान नहीं बदलते, वे अपनी पूरी जीवन-योजना बदलते हैं। सियोल में अभी यही होता दिख रहा है।
जोंसे क्या है, और इसकी कमी से इतनी बेचैनी क्यों?
कोरिया के आवास बाजार को समझने के लिए जोंसे की भूमिका को ठीक से समझना होगा। जोंसे दशकों से वहां के शहरी मध्यमवर्ग के लिए एक महत्वपूर्ण व्यवस्था रही है। इसमें किरायेदार एक बड़ी राशि मकान मालिक को जमा करता है। मकान मालिक इस राशि का इस्तेमाल निवेश, ऋण समायोजन या अन्य वित्तीय जरूरतों के लिए करता है। बदले में किरायेदार को हर महीने भारी किराया नहीं देना पड़ता। ऐसे में यह मॉडल उन परिवारों के लिए उपयोगी रहा है जो मासिक नकदी प्रवाह पर दबाव कम रखना चाहते हैं, लेकिन शुरुआती पूंजी जुटा सकते हैं।
भारतीय शहरी जीवन से तुलना करें तो इसे किराये और पूंजी निवेश के बीच की एक मिश्रित व्यवस्था की तरह समझा जा सकता है। भारत में बहुत-से परिवार घर खरीदने और किराये पर रहने के बीच उलझे रहते हैं। कोरिया में जोंसे ने लंबे समय तक इस दुविधा का एक तीसरा रास्ता दिया—आप घर के मालिक नहीं बनते, लेकिन केवल मासिक किरायेदार भी नहीं रहते। यही कारण है कि जब जोंसे बाजार सिकुड़ता है, तो उसका प्रभाव भावनात्मक और आर्थिक दोनों स्तरों पर दिखाई देता है।
जोंसे घरों की कमी से किरायेदारों की चिंता इसलिए बढ़ती है क्योंकि यह सीधे-सीधे उनकी योजनाबद्धता पर चोट करती है। अगर किसी परिवार ने बच्चों के स्कूल, पति-पत्नी की नौकरी, बुजुर्गों की अस्पताल पहुंच और रोजमर्रा की सुविधा को ध्यान में रखकर किसी इलाके में रहने का फैसला किया हो, तो वहां उपलब्ध जोंसे विकल्प कम होते ही उन्हें दो कठिन रास्तों में से चुनना पड़ता है—या तो उसी इलाके में छोटा, कम सुविधायुक्त या अधिक महंगा घर स्वीकार करें, या फिर शहर के बाहर या कम पसंदीदा इलाके की ओर जाएं।
यहां एक और फर्क समझना जरूरी है। अगर केवल कीमत बढ़ती, तो कुछ परिवार समय लेकर इंतजार कर सकते थे। लेकिन जब उपलब्ध घर ही कम हो जाते हैं, तब बाजार एक तरह का मनोवैज्ञानिक दबाव बनाता है। लोग इसलिए जल्दी फैसला नहीं लेते कि कीमत कल और बढ़ जाएगी; वे इसलिए जल्दी फैसला लेते हैं क्योंकि उन्हें डर होता है कि कल तक चुनने लायक घर ही नहीं बचेगा। यही वह बिंदु है जो इस संकट को साधारण ‘महंगाई’ वाली खबर से अलग बनाता है।
भारत में भी महानगरों के अच्छे स्कूलों वाले इलाकों, मेट्रो-स्टेशन के पास की सोसाइटियों, आईटी कॉरिडोर के आसपास या अस्पतालों एवं वाणिज्यिक केंद्रों से जुड़े क्षेत्रों में कुछ ऐसा ही व्यवहार देखा जाता है। फर्क इतना है कि कोरिया में जोंसे व्यवस्था इस तनाव को और अधिक स्पष्ट रूप से सामने लाती है।
सियोल में जोंसे घर इतने तेजी से क्यों घटे?
इस कमी के पीछे कई परतें हैं और इन्हें केवल मांग-आपूर्ति के सामान्य सूत्र से नहीं समझा जा सकता। पहली बड़ी वजह अनुबंधों के नवीनीकरण का संचयी असर है। जब मौजूदा किरायेदार अपने पुराने घरों में अधिक समय तक बने रहते हैं, तो बाजार में नए उपलब्ध घरों की संख्या कम हो जाती है। यानी घर शहर में मौजूद हैं, लेकिन नए परिवारों के लिए खुल नहीं रहे। यह ‘दिखाई न देने वाली कमी’ है, जो कागज पर आपूर्ति को अचानक कम कर देती है।
दूसरी वजह मकान मालिकों की रणनीति में बदलाव है। कोरिया में पिछले कुछ वर्षों में ब्याज दरों, वित्तीय अनिश्चितता और जोंसे जमा राशि लौटाने के जोखिम पर लगातार चर्चा हुई है। जब मकान मालिक को यह चिंता हो कि अनुबंध खत्म होने पर उसे बड़ी जमा राशि वापस करनी होगी, तो वह कई बार जोंसे की जगह मासिक किराया या ‘अर्ध-जोंसे’ जैसे मॉडल चुनता है, जिसमें सुरक्षा जमा भी होता है और मासिक किराया भी। इसका अर्थ यह हुआ कि कुल आवास स्टॉक तो वही रह सकता है, लेकिन जोंसे के रूप में उपलब्ध स्टॉक घट जाता है।
तीसरा कारण नई आपूर्ति का समय है। किसी भी महानगर में जब नए अपार्टमेंट या आवासीय परियोजनाएं एक साथ बाजार में आती हैं, तो किराये के विकल्प बढ़ते हैं। लेकिन अगर कुछ समय के लिए नई आपूर्ति कम हो, तो दबाव पुराने इलाकों और पुराने आवासीय स्टॉक पर बढ़ता है। सियोल की भौगोलिक और प्रशासनिक वास्तविकताएं ऐसी हैं कि वहां बहुत बड़े पैमाने पर नई आवासीय आपूर्ति जल्दी बढ़ाना आसान नहीं है। घनी आबादी, भूमि की सीमित उपलब्धता और अत्यधिक प्रतिस्पर्धी लोकेशन इस समस्या को और जटिल बनाती हैं।
चौथा पहलू बाजार की अनिश्चितता है। जब भविष्य की दिशा साफ न हो—कीमतें और बढ़ेंगी या ठहरेंगी, ब्याज दरें नरम होंगी या नहीं, खरीदार लौटेंगे या नहीं—तब मकान मालिक अधिक सावधान हो जाते हैं। वे तुरंत बेचने के बजाय संपत्ति अपने पास रखते हैं, लेकिन किस रूप में किराये पर देंगे, इस बारे में ज्यादा सतर्क रहते हैं। यह सतर्कता जोंसे बाजार में उपलब्धता घटाने वाली एक महत्वपूर्ण ताकत बन सकती है।
भारतीय संदर्भ में कहें तो इसे ऐसे समझा जा सकता है जैसे किसी शहर में अच्छे इलाकों में किराये के फ्लैट तो मौजूद हों, लेकिन या तो मालिक पुराने किरायेदारों को बनाए रखें, या फिर पारंपरिक किराये की जगह सर्विस्ड अपार्टमेंट, कॉरपोरेट लीज या अधिक लाभदायक मॉडल चुनने लगें। तब आम परिवार के लिए उपलब्ध विकल्प अचानक सीमित लगने लगते हैं। सियोल में भी कुछ वैसा ही हो रहा है, हालांकि वहां की संरचना और अनुबंध प्रणाली अलग है।
सियोल से ग्योंगगी की ओर मांग का खिसकना: जैसे दिल्ली से नोएडा-गुरुग्राम की चाल
इस खबर का दूसरा महत्वपूर्ण हिस्सा यह है कि सियोल के आसपास ग्योंगगी प्रांत के छह इलाकों में घरों की कीमतों की बढ़त राष्ट्रीय स्तर पर सबसे ऊपर दर्ज हुई। इसका सीधा अर्थ यह नहीं कि हर उपनगरीय इलाका अचानक ‘हॉट’ हो गया है। असल कहानी यह है कि सियोल के भीतर विकल्प कम होते ही मांग उन इलाकों की ओर खिसक रही है जो शहर का विकल्प बन सकते हैं—यानी वहां से आने-जाने की सुविधा हो, स्कूल अच्छे हों, बड़े बाजार हों, अस्पताल, पार्क, मेट्रो या रेल संपर्क उपलब्ध हो और परिवारों को जीवन-गुणवत्ता में बहुत बड़ा समझौता न करना पड़े।
भारतीय पाठकों के लिए इसका सबसे नजदीकी उदाहरण दिल्ली-एनसीआर हो सकता है। जब दिल्ली के भीतर किराये या खरीद की लागत बहुत अधिक हो जाती है, तो परिवार नोएडा, ग्रेटर नोएडा, गुरुग्राम, फरीदाबाद या गाजियाबाद का रुख करते हैं। लेकिन एनसीआर का हर इलाका समान रूप से लाभ नहीं उठाता। वही जगहें अधिक आकर्षित करती हैं जहां मेट्रो, एक्सप्रेसवे, अच्छे स्कूल, कॉरपोरेट दफ्तर, अस्पताल और शॉपिंग इंफ्रास्ट्रक्चर पहले से मौजूद हों। कोरिया में सियोल और ग्योंगगी का समीकरण कुछ हद तक इसी प्रकार समझा जा सकता है।
जब जोंसे घर सियोल में कम होते हैं, तब पहले किराये की मांग बाहर जाती है। इसके बाद कुछ परिवार किराये और खरीद के बीच तुलना करते हैं। यदि उन्हें लगता है कि अच्छी लोकेशन वाले उपनगरीय इलाके में जोंसे जमा और घर खरीदने की कुल लागत के बीच अंतर बहुत अधिक नहीं है, तो वे खरीद की ओर भी झुक सकते हैं। यही वह बिंदु है जहां किराये का तनाव, बिक्री बाजार की कीमतों में तेजी का कारण बनता है। इसलिए ग्योंगगी के कुछ इलाकों में कीमतों की तेज बढ़त को सियोल के जोंसे संकट से अलग करके नहीं देखा जा सकता।
लेकिन यह भी ध्यान रखने की जरूरत है कि ऐसी मांग पूरे क्षेत्र में समान रूप से नहीं फैलती। जिन इलाकों को लोग ‘सियोल का व्यवहारिक विकल्प’ मानते हैं, वही पहले लाभ उठाते हैं। बाकी क्षेत्र अपेक्षाकृत पीछे रह सकते हैं। इसका मतलब है कि महानगरीय क्षेत्र के भीतर असमानता और अधिक तेज हो सकती है। कुछ जगहों पर कीमतें और मांग तेजी से बढ़ती हैं, जबकि कुछ अन्य हिस्सों में अपेक्षाकृत ठहराव बना रहता है।
यह पैटर्न भारत में भी स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। मुंबई के संदर्भ में ठाणे, नवी मुंबई या मीरा रोड; बेंगलुरु में व्हाइटफील्ड, सरजापुर या उत्तर बेंगलुरु; हैदराबाद में गाचीबौली से जुड़े परिक्षेत्र—हर जगह शहर के केंद्र से बाहर जाने का निर्णय केवल सस्ता घर पाने का नहीं, बल्कि ‘कम नुकसान वाला विकल्प’ चुनने का निर्णय होता है। कोरिया में भी फिलहाल यही मानसिकता काम कर रही है।
किरायेदार, नवविवाहित दंपती, एकल परिवार और बुजुर्ग—सबकी मुश्किल अलग
जोंसे घरों की कमी का प्रभाव एक जैसा नहीं होता। हर परिवार, आयु-वर्ग और जीवन-चरण पर इसका असर अलग तरीके से पड़ता है। सबसे पहले, युवा नौकरीपेशा और नवविवाहित दंपती के सामने यह सवाल खड़ा होता है कि क्या वे कम विकल्पों वाले जोंसे बाजार में बने रहें, मासिक किराये की ओर जाएं, या फिर खरीद पर विचार करें। यदि जोंसे जमा लगातार बढ़ता है और अच्छी लोकेशन के घरों की संख्या घटती है, तो कुछ दंपती सोच सकते हैं कि इतने बड़े जमा के बजाय होम लोन लेकर खरीदारी कर लेना बेहतर होगा। लेकिन यह फैसला आसान नहीं है। ब्याज दर, नौकरी की स्थिरता, भविष्य की आय, बच्चों की योजना—सभी कारक इस निर्णय को प्रभावित करते हैं।
भारत में भी युवा पेशेवर कई बार यही दुविधा झेलते हैं—क्या ऊंचा किराया देते रहें, या ईएमआई शुरू करें? फर्क बस इतना है कि कोरिया में जोंसे के कारण शुरुआती जमा की भूमिका ज्यादा बड़ी होती है। इसलिए वहां का निर्णय-तंत्र अलग दिखता है, लेकिन मानसिक दबाव काफी परिचित है।
दूसरी श्रेणी में वे परिवार आते हैं जिनके छोटे बच्चे हैं। इनके लिए घर का सवाल केवल छत का नहीं, बल्कि स्कूल, डे-केयर, ट्यूशन, सुरक्षित पैदल रास्ता, खेल का मैदान और कामकाजी माता-पिता के लिए समय बचाने का भी है। ऐसे परिवार अक्सर उसी परिसर या पड़ोस को प्राथमिकता देते हैं जहां शिक्षा और दैनिक जीवन की सुविधाएं एक साथ मिल जाएं। जब बाजार में विकल्प कम हो जाते हैं, तो वे या तो अधिक भुगतान करते हैं या फिर अपने बच्चों की दिनचर्या और परिवार की सुविधा पर समझौता करते हैं।
तीसरी श्रेणी एकल परिवारों और अकेले रहने वाले युवाओं की है। कोरिया की तरह भारत के महानगरों में भी एकल आवास की मांग बढ़ी है। इस वर्ग को लोकेशन, सार्वजनिक परिवहन और कॉम्पैक्ट लेकिन कार्यक्षम घर चाहिए। जैसे ही स्टेशन, मेट्रो या कारोबारी जिलों के पास छोटे घरों की उपलब्धता घटती है, इस वर्ग पर प्रभाव बहुत तेज पड़ता है क्योंकि इनके बजट की सीमा अपेक्षाकृत सख्त होती है।
चौथी श्रेणी बुजुर्गों या सेवानिवृत्त परिवारों की है। इनके लिए बड़ी जमा राशि का स्थानांतरण स्वयं एक चुनौती हो सकता है। दूसरी ओर मासिक किराये की व्यवस्था नकदी प्रवाह पर लगातार दबाव डाल सकती है। ऐसे परिवार स्थिरता को प्राथमिकता देते हैं। इसलिए जोंसे बाजार का संकुचन इनके लिए केवल आर्थिक नहीं, बल्कि मनोवैज्ञानिक असुरक्षा का कारण भी बन सकता है।
यानी यह संकट किसी एक वर्ग की समस्या नहीं है। यह जीवन-चक्र के हर चरण को अलग-अलग तरीके से प्रभावित कर रहा है—और इसी वजह से इसकी सामाजिक गंभीरता बढ़ जाती है।
क्यों बढ़ रहा है ‘अच्छे स्कूल और रोजमर्रा की सुविधा वाले कॉम्प्लेक्स’ का आकर्षण?
जब बाजार अस्थिर होता है, तो खरीदार और किरायेदार दोनों अधिक रक्षात्मक हो जाते हैं। वे प्रयोग करने के बजाय ऐसी जगह चुनना चाहते हैं जहां गलती की संभावना कम हो। कोरिया से जो संकेत मिल रहे हैं, वे बताते हैं कि शिक्षा और जीवन-उपयोगी इंफ्रास्ट्रक्चर से लैस आवासीय परिसरों की मांग बढ़ रही है। यह प्रवृत्ति बिल्कुल स्वाभाविक है।
यहां ‘शिक्षा इंफ्रास्ट्रक्चर’ का अर्थ केवल प्रतिष्ठित स्कूल से नहीं है। इसमें किंडरगार्टन, प्राथमिक विद्यालय, ट्यूशन हब, पुस्तकालय, बच्चों की गतिविधियां, सुरक्षित पैदल मार्ग और अभिभावकों के लिए समय की बचत शामिल है। इसी तरह ‘जीवन-उपयोगी इंफ्रास्ट्रक्चर’ का मतलब है—मेट्रो या बस कनेक्टिविटी, किराना और सुपरमार्केट, अस्पताल, क्लिनिक, पार्क, सांस्कृतिक केंद्र और सप्ताहांत की बुनियादी सुविधाएं।
भारतीय महानगरों में भी यही व्यवहार दिखता है। लोग अक्सर कहते हैं कि वे केवल फ्लैट नहीं खरीदते, वे स्कूल-हॉस्पिटल-मेट्रो का पैकेज खरीदते हैं। जब किराये का बाजार तंग होता है, तब यह सोच और मजबूत हो जाती है। परिवार जानते हैं कि अगर आज उन्हें किसी अच्छे, संतुलित और सुविधाजनक इलाके में जगह मिल जाए, तो भविष्य में पुनः स्थानांतरण की स्थिति आने पर भी वहां मांग बनी रह सकती है। यानी लोकेशन केवल प्रतिष्ठा का नहीं, जोखिम प्रबंधन का प्रश्न बन जाती है।
कोरिया में अपार्टमेंट कॉम्प्लेक्स संस्कृति काफी विकसित है, जहां परिसरों के भीतर और आसपास सामुदायिक सुविधाएं अधिक संगठित रूप में मौजूद होती हैं। भारतीय पाठकों के लिए इसे बड़े गेटेड सोसाइटी मॉडल से समझा जा सकता है, हालांकि कोरिया में घनत्व, सार्वजनिक परिवहन और स्कूलिंग पैटर्न अलग हो सकते हैं। फिर भी मूल बात समान है—अनिश्चित बाजार में लोग उस आवासीय विकल्प को तरजीह देते हैं जो रोजमर्रा के जीवन को कम से कम बाधित करे।
यह जरूरी नहीं कि ऐसे हर इलाके में तुरंत कीमतें आसमान छू लें। कई बार ऋण शर्तें, आय, जमा क्षमता और बाजार भावना वास्तविक लेनदेन को सीमित भी करती हैं। लेकिन इतना साफ है कि विकल्पों की कमी वाले माहौल में सबसे पहले और सबसे अंत तक जिन परिसरों की तुलना की जाती है, वे वही होते हैं जिनके पास मजबूत सामाजिक और भौतिक इंफ्रास्ट्रक्चर हो।
नीति-निर्माताओं और आम परिवारों के लिए आगे का सबक
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या यह केवल एक मौसमी उतार-चढ़ाव है या कोरिया के किराये के बाजार में गहरे संरचनात्मक बदलाव का संकेत? यदि जोंसे घरों की कमी थोड़े समय की है, तो नई आपूर्ति, अनुबंध चक्र और बाजार संतुलन के साथ इसमें कुछ नरमी आ सकती है। लेकिन यदि मकान मालिकों का झुकाव स्थायी रूप से मासिक किराये या मिश्रित अनुबंधों की ओर बढ़ रहा है, तो यह संकेत है कि कोरिया का पारंपरिक किराया मॉडल बदल रहा है। ऐसी स्थिति में केवल अल्पकालिक राहत नहीं, बल्कि व्यापक किरायेदारी नीति, वित्तीय सुरक्षा और सार्वजनिक आवास रणनीति की जरूरत होगी।
नीति-निर्माताओं के लिए पहली प्राथमिकता यह समझना होना चाहिए कि उपलब्धता में गिरावट किन इलाकों और किन प्रकार के घरों में सबसे अधिक है। दूसरी प्राथमिकता यह कि किस आय-वर्ग पर इसका दबाव सबसे ज्यादा पड़ रहा है। तीसरी यह कि क्या उपनगरीय क्षेत्रों में बुनियादी ढांचा मांग को संभालने के लिए पर्याप्त है। केवल घर बनाना पर्याप्त नहीं होता; स्कूल, अस्पताल, परिवहन और कार्यस्थल से कनेक्टिविटी के बिना उपनगर राहत नहीं, बल्कि नई समस्या बन सकते हैं।
आम परिवारों के लिए भी यह समय भावनात्मक निर्णय लेने का नहीं, बल्कि लागत का समग्र हिसाब लगाने का है। केवल जोंसे जमा या केवल मासिक किराये की तुलना पर्याप्त नहीं है। कुल आवासीय लागत में यात्रा समय, बच्चों की शिक्षा, देखभाल, ईंधन, जीवन-गुणवत्ता, भविष्य के अनुबंध का जोखिम और संभावित पुनर्स्थापन की लागत भी जोड़नी होगी। बहुत-से मामलों में जो विकल्प शुरुआती तौर पर सस्ता लगता है, वह लंबे समय में अधिक थकाऊ और महंगा साबित हो सकता है।
भारतीय पाठकों के लिए इस कोरियाई परिघटना का सबसे बड़ा सबक यही है कि महानगरों का आवास संकट केवल कीमतों की कहानी नहीं है। यह उपलब्धता, लोकेशन, सामाजिक बुनियादी ढांचे, वित्तीय साधनों और पारिवारिक जीवन-चक्र की संयुक्त कहानी है। सियोल में जोंसे घरों की 33 प्रतिशत कमी हमें यह दिखाती है कि आवास बाजार में असली तनाव कई बार कीमतों के उछाल से पहले विकल्पों के सिकुड़ने के रूप में दिखाई देता है। जब पसंद के घर कम पड़ने लगते हैं, तभी शहर अपने निवासियों से नए समझौते मांगना शुरू कर देता है।
और शायद यही इस पूरी घटना का सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष है—महानगरों में रहने का संघर्ष अब केवल ‘कितना खर्च कर सकते हैं’ का नहीं, बल्कि ‘किस तरह का जीवन बचा सकते हैं’ का प्रश्न बनता जा रहा है। सियोल की यह कहानी इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसमें भविष्य के शहरी एशिया की झलक दिखाई देती है—और उस भविष्य में भारत के बड़े शहर भी अपने-अपने संस्करण के साथ खड़े हैं।
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