
दिव्यांगजन दिवस पर सियोल का असहज सच
20 अप्रैल 2026 को दक्षिण कोरिया की राजधानी सियोल में दिव्यांगजन दिवस का दृश्य उत्सव से अधिक प्रतिरोध, असहमति और नीति-संघर्ष का दृश्य बन गया। एक ही शहर, एक ही दिन और लगभग एक ही समय पर तीन अलग-अलग धरनों और रैलियों ने यह दिखा दिया कि कोरिया में दिव्यांग अधिकारों की बहस अब सिर्फ एक भावनात्मक नारे या सरकारी घोषणा से आगे निकल चुकी है। सवाल अब यह नहीं रह गया कि दिव्यांग नागरिकों के अधिकार होने चाहिए या नहीं; सवाल यह है कि वे अधिकार किस रूप में, किस व्यवस्था के भीतर, किस प्राथमिकता के साथ और किसकी आवाज़ को केंद्र में रखकर सुनिश्चित किए जाएं।
सियोल के ये दृश्य भारतीय पाठकों के लिए भी बहुत परिचित लग सकते हैं। हमारे यहां भी जब हम दिव्यांगता के मुद्दे पर चर्चा करते हैं, तो अक्सर बहस दो छोरों के बीच फंस जाती है—देखभाल बनाम स्वायत्तता, संस्थागत व्यवस्था बनाम समुदाय-आधारित जीवन, परिवार की भूमिका बनाम राज्य की जिम्मेदारी। कोरिया में 20 अप्रैल का दिन इसी टकराव को सड़क पर ले आया। नेशनल असेंबली स्टेशन के पास एक समूह दिव्यांग संस्थानों में कथित उत्पीड़न के मामलों पर राष्ट्रीय स्तर की संसदीय जांच की मांग कर रहा था। वहीं एक अन्य संगठन संस्थानों में रह रहे दिव्यांग लोगों के ‘रहने के अधिकार’ और ‘चयन के अधिकार’ की रक्षा की बात कर रहा था। इसके बाद 207 संगठनों का एक बड़ा मोर्चा ग्वांगह्वामुन में जुटा, जिसने भेदभाव खत्म करने, गतिशीलता, शिक्षा, श्रम और गरिमापूर्ण जीवन के व्यापक अधिकारों को केंद्र में रखा।
दक्षिण कोरिया में दिव्यांगजन दिवस का अर्थ केवल सहानुभूति या परोपकार नहीं है। वहां यह दिन नागरिकता, समान भागीदारी और राज्य की जवाबदेही का प्रश्न बन चुका है। यही वजह है कि इस दिन सड़कें सजावट से कम और मांगों की भाषा से ज्यादा भरी दिखाई दीं। यह दृश्य इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि कोरियाई समाज लंबे समय से तेज आर्थिक विकास, आधुनिक शहरी ढांचे और तकनीकी प्रगति का उदाहरण माना जाता है, लेकिन दिव्यांग नागरिकों के जीवन की बुनियादी शर्तों पर अब भी गहरे मतभेद मौजूद हैं। भारत में जैसे स्मार्ट सिटी, मेट्रो, डिजिटल सेवाएं और कल्याणकारी योजनाओं की चमक के बीच पहुंच, सम्मान और समानता के प्रश्न दब जाते हैं, वैसे ही कोरिया में भी विकास की चमक के पीछे अधिकारों की अधूरी कहानी सामने आ रही है।
यह कहानी सिर्फ कोरिया की नहीं है। यह आधुनिक लोकतंत्रों की साझा दुविधा है—क्या राज्य दिव्यांग व्यक्तियों को केवल देखभाल की वस्तु समझेगा, या पूर्ण अधिकार-संपन्न नागरिक मानेगा? और अगर नागरिक मानेगा, तो क्या उसके पास इतना साहस है कि परिवार, संस्था, बाजार और प्रशासन—सबकी भूमिका की दोबारा समीक्षा करे? सियोल की सड़कों पर उठी आवाज़ों ने इन्हीं प्रश्नों को तीखे ढंग से सामने रखा।
पहली पुकार: संस्थानों में उत्पीड़न पर राष्ट्रीय जांच की मांग
दोपहर के आसपास नेशनल असेंबली स्टेशन के पास राष्ट्रीय दिव्यांग अभिभावक एकता संगठन ने जिस शैली में प्रदर्शन किया, उसने पूरे दिन की नैतिक दिशा तय कर दी। उन्होंने ‘ओचेतुजी’ का सहारा लिया। भारतीय पाठकों के लिए यह शब्द अपरिचित हो सकता है। कोरियाई बौद्ध और प्रतिरोध परंपराओं से जुड़ी यह एक गहरी प्रतीकात्मक क्रिया है, जिसमें व्यक्ति शरीर के पांच अंग—दो हाथ, दो घुटने और माथा—धरती से लगाकर बार-बार दंडवत की मुद्रा में आगे बढ़ता है। इसे हम भारतीय संदर्भ में दंडवत यात्रा, साष्टांग प्रणाम या तपस्वी सार्वजनिक विनती के मिश्रित रूप की तरह समझ सकते हैं, लेकिन यहां इसका राजनीतिक अर्थ बहुत तीखा है: सबसे विनम्र देहभाषा के जरिए सबसे कठोर सवाल पूछना।
इस प्रदर्शन का केंद्र था दिव्यांग संस्थानों के भीतर कथित उत्पीड़न और हिंसा के मामलों पर राष्ट्रीय स्तर की संसदीय जांच। यह केवल किसी एक घटना की जांच की मांग नहीं थी। इसका निहितार्थ कहीं बड़ा था—क्या जो संस्थाएं सुरक्षा, आश्रय और देखभाल के नाम पर चलाई जाती हैं, वे वास्तव में सुरक्षित हैं? क्या निगरानी तंत्र काम कर रहा है? क्या परिवारों और समाज को पर्याप्त जानकारी मिलती है? क्या शिकायत और राहत की प्रक्रिया पीड़ित के पक्ष में है? और सबसे अहम, क्या समस्या कुछ ‘खराब’ कर्मचारियों की है या पूरी संस्थागत संरचना में ऐसी खामियां हैं जो हिंसा, उपेक्षा और चुप्पी को जन्म देती हैं?
दिव्यांग संस्थानों की सबसे बड़ी चुनौती उनकी बंद प्रकृति होती है। बाहर से देखने पर वे सेवा, सुरक्षा और व्यवस्था का आश्वासन देते हैं, लेकिन अंदर की वास्तविकता हमेशा पारदर्शी नहीं होती। कोरिया में उठी यह मांग इसी बंद ढांचे के खिलाफ है। जब निवासी बाहरी दुनिया से सीमित संपर्क में हों, जब परिवार रोज़मर्रा की स्थिति पर निगरानी न रख सके, जब संस्था पर निर्भरता अत्यधिक हो और शिकायत का रास्ता भी उसी संरचना के भीतर से होकर गुजरता हो, तब हिंसा या उत्पीड़न का जोखिम केवल व्यक्तिगत नहीं, संरचनात्मक बन जाता है। भारत में भी मानसिक स्वास्थ्य संस्थानों, आश्रय गृहों, बाल संरक्षण गृहों और वृद्धाश्रमों को लेकर समय-समय पर ऐसे प्रश्न उठते रहे हैं। इसलिए कोरिया की यह बहस हमें दूर की घटना नहीं लगती; यह हमें अपने तंत्र की कमजोरियों की भी याद दिलाती है।
संसदीय जांच की मांग यह बताती है कि पीड़ित परिवारों और समर्थक समूहों का भरोसा केवल प्रशासनिक जांचों या विभागीय कार्रवाई पर नहीं रहा। वे चाहते हैं कि संसद, यानी राष्ट्रीय प्रतिनिधि संस्थान, इस सवाल को व्यापक नीति की विफलता के रूप में देखे। इससे बहस एक मामले से बढ़कर मॉडल तक पहुंच जाती है। अगर जांच केवल एक घटना तक सीमित रहेगी तो परिणाम कुछ निलंबन, कुछ अभियोग और कुछ आश्वासन तक सीमित रह सकते हैं। लेकिन अगर जांच संस्थान में प्रवेश की प्रक्रिया, कर्मचारियों की संख्या, प्रशिक्षण, निगरानी, शिकायत निवारण, स्वतंत्र निरीक्षण और पीड़ित की कानूनी सहायता तक पहुंचे, तभी यह बदलावकारी होगी। सियोल में माता-पिता के समूह का संदेश यही था कि अब टुकड़ों में जवाब नहीं चलेगा।
दूसरी आवाज़: ‘डिइंस्टीट्यूशनलाइजेशन’ के बीच रहने के अधिकार का सवाल
उसी दिन, कुछ ही समय बाद, कोरिया के दिव्यांग कल्याण संस्थान संघ ने संसद के सामने एक बिल्कुल अलग स्वर में अपनी बात रखी। उन्होंने दिव्यांग व्यक्तियों को संस्थानों से बाहर समुदाय में बसाने की नीतियों, यानी ‘डिइंस्टीट्यूशनलाइजेशन’ या ‘संस्थान-मुक्त जीवन’ को लेकर चिंता जताई और कहा कि संस्थानों में रह रहे लोगों के अधिकारों को भी केंद्र में रखा जाना चाहिए। यह बहस भारतीय समाज के लिए बहुत दिलचस्प और जरूरी है, क्योंकि यहां भी जब किसी पुरानी व्यवस्था के विकल्प की बात होती है, तो अक्सर वही लोग बीच में छूट जाते हैं जो इस व्यवस्था के भीतर पहले से रह रहे हैं।
डिइंस्टीट्यूशनलाइजेशन का विचार मूलतः इस सिद्धांत से आता है कि दिव्यांग व्यक्ति को समाज से अलग-थलग बंद संस्थानों में नहीं, बल्कि समुदाय के बीच, स्वतंत्र या समर्थित जीवन के साथ रहना चाहिए। यह विचार मानवाधिकार-आधारित दृष्टि से बहुत मजबूत है। इसमें व्यक्ति की स्वतंत्रता, निजी निर्णय, सामाजिक भागीदारी, शिक्षा, रोजगार और सम्मान की भावना शामिल है। लेकिन व्यवहार में समस्या तब पैदा होती है जब राज्य संस्था बंद करने या उसमें रहने वालों की संख्या घटाने को तो लक्ष्य बना ले, पर समुदाय-आधारित सेवाएं, प्रशिक्षित सहायक, परिवार को राहत, सुलभ आवास, स्थानीय स्वास्थ्य सुविधा और सामाजिक स्वीकृति का ढांचा समय पर खड़ा न करे। तब नीति का उच्च आदर्श जमीन पर संकट में बदल सकता है।
कोरियाई संस्थान संघ का तर्क यही था कि अगर संस्था से बाहर ले जाना ही प्रगति का पर्याय मान लिया जाए, तो उन लोगों की तत्काल सुरक्षा और स्थिरता का क्या होगा जो अभी वहीं रह रहे हैं? हर निवासी की परिस्थिति अलग होती है। किसी की चिकित्सा जरूरतें जटिल हो सकती हैं, किसी परिवार के पास चौबीसों घंटे देखभाल की क्षमता नहीं हो सकती, किसी व्यक्ति के लिए अचानक वातावरण बदलना आघातकारी हो सकता है, और कई बार स्थानीय समुदाय या प्रशासन तैयार ही नहीं होता। ऐसे में ‘चयन का अधिकार’ महत्वपूर्ण हो जाता है। अगर किसी नीति के नाम पर वास्तविक विकल्प दिए बिना स्थानांतरण किया जाता है, तो वह स्वतंत्रता नहीं, एक नई तरह की मजबूरी भी बन सकती है।
यहां एक सूक्ष्म फर्क समझना जरूरी है। संस्थानों के भीतर अधिकारों की बात करना, संस्थानों के वर्तमान रूप को स्थायी और आदर्श मान लेना नहीं है। कोरिया में उठी यह आवाज़ इस बात पर जोर देती दिखी कि जब तक संस्थाएं मौजूद हैं, तब तक उनके भीतर रहने वाले नागरिकों की गरिमा, निजी जीवन, सुरक्षा, सामाजिक संपर्क और निर्णय क्षमता को अधिकार के रूप में मान्यता मिलनी चाहिए। दूसरे शब्दों में, बहस का एक पक्ष कह रहा था कि संस्था में हिंसा और अलगाव की संरचना को बदलिए; दूसरा पक्ष कह रहा था कि परिवर्तन के नाम पर मौजूदा निवासियों की स्थिरता और सुरक्षा से खिलवाड़ मत कीजिए। दोनों ही राज्य से जवाबदेही मांग रहे थे, सिर्फ प्रवेश बिंदु अलग थे।
भारतीय संदर्भ में सोचें तो यह बहस हमें मानसिक स्वास्थ्य पुनर्वास गृहों, विशेष विद्यालयों, देखभाल गृहों और दीर्घकालिक सहायता केंद्रों के बारे में भी सोचने को मजबूर करती है। क्या हमारा लक्ष्य केवल संस्थान कम करना है, या ऐसी सामाजिक संरचना बनाना है जिसमें व्यक्ति सचमुच चुन सके? अगर एक परिवार आर्थिक, भावनात्मक और शारीरिक रूप से थक चुका है, तो क्या उसके लिए समुदाय-आधारित सहायता उपलब्ध है? अगर नहीं, तो संस्था का विरोध नैतिक रूप से सही होते हुए भी व्यवहार में अधूरा रह सकता है। सियोल की सड़क पर उठी यह चिंता इसी वास्तविकता की ओर इशारा करती है।
तीसरा मोर्चा: 207 संगठनों ने अधिकारों की बड़ी तस्वीर सामने रखी
दोपहर बाद ग्वांगह्वामुन के पास 207 संगठनों के संयुक्त मोर्चे ने एक व्यापक रैली की। इस मोर्चे में दिव्यांग अधिकार संगठनों, अभिभावक समूहों, मानवाधिकार समूहों और अन्य सामाजिक संगठनों की भागीदारी ने यह स्पष्ट कर दिया कि बहस किसी एक संस्थान, एक कानून या एक घटना तक सीमित नहीं है। यहां मुद्दा था—गतिशीलता का अधिकार, शिक्षा का अधिकार, श्रम का अधिकार, आवास और समुदाय में रहने का अधिकार, और सबसे बढ़कर भेदभाव-मुक्त जीवन का अधिकार।
कोरिया में पिछले कुछ वर्षों में दिव्यांग अधिकार आंदोलनों ने खास तौर पर सार्वजनिक परिवहन और शहरी पहुंच को लेकर बड़ा प्रभाव डाला है। कई भारतीय पाठक कोरिया को हाई-टेक, कुशल और बेहद आधुनिक देश के रूप में जानते हैं, लेकिन वहां भी मेट्रो, स्टेशन, बस सेवा, फुटपाथ, सार्वजनिक भवन और आपदा प्रतिक्रिया तंत्र में ऐसी बाधाएं रही हैं जिनका बोझ दिव्यांग नागरिकों पर असमान रूप से पड़ता है। यह ठीक वैसा ही है जैसे भारत में नई मेट्रो लाइनें बनने के बावजूद किसी स्टेशन पर लिफ्ट न चलना, फुटपाथ पर अतिक्रमण होना, बस में रैंप का अभाव, या सरकारी कार्यालय तक पहुंच ही न होना—कागज पर अधिकार और जमीन पर अनुभव में दूरी बनी रहती है।
207 संगठनों की संयुक्त उपस्थिति का राजनीतिक महत्व बहुत बड़ा है। इससे यह संकेत मिलता है कि कोरिया में दिव्यांगता का प्रश्न अब केवल कल्याणकारी योजनाओं का सीमित विषय नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक ढांचे की गुणवत्ता की कसौटी बन चुका है। किसे शहर उपलब्ध है? किसे शिक्षा वास्तव में सुलभ है? किसे नौकरी में अवसर मिलता है? किसे अपने घर, पड़ोस और सार्वजनिक जीवन में सम्मान के साथ जगह मिलती है? ये सब सवाल दिव्यांग अधिकारों से जुड़े हैं, लेकिन अंततः ये पूरे समाज की नैतिक दिशा तय करते हैं।
ग्वांगह्वामुन का चुनाव भी प्रतीकात्मक है। यह सियोल का वह केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र है जहां राज्य, नागरिक समाज और लोकतांत्रिक प्रदर्शन की परंपरा एक-दूसरे से मिलती है। भारतीय पाठकों के लिए इसे दिल्ली के जंतर-मंतर, राजपथ-कर्तव्य पथ, इंडिया गेट क्षेत्र या संसद मार्ग से जुड़ी सार्वजनिक राजनीति के एक सम्मिलित प्रतीक की तरह समझा जा सकता है। ऐसे स्थान पर दिव्यांग-विरोधी भेदभाव समाप्त करने की मांग का उठना बताता है कि यह मुद्दा हाशिये का नहीं, लोकतंत्र के केंद्र का है।
इस मोर्चे ने एक महत्वपूर्ण बात और रेखांकित की—भले ही संगठनों के बीच रणनीति और प्राथमिकता पर मतभेद हों, लेकिन यह साझा समझ मौजूद है कि मौजूदा प्रणाली पर्याप्त नहीं है। कोई इसे उत्पीड़न-रोधी ढांचे की विफलता कह रहा है, कोई निवास अधिकार की अपर्याप्तता, और कोई भेदभाव खत्म करने की धीमी रफ्तार। पर सब एक अर्थ में कह रहे हैं कि राज्य अभी वहां नहीं पहुंचा जहां उसे होना चाहिए था।
एक ही अधिकार की मांग, फिर टकराव क्यों दिखता है?
सियोल के इस पूरे घटनाक्रम का सबसे महत्वपूर्ण और जटिल सवाल यही है कि जब सभी पक्ष ‘अधिकार’ की भाषा बोल रहे हैं, तो उनके रास्ते आपस में टकराते हुए क्यों दिखाई देते हैं? इसका उत्तर नीति, अनुभव और सामाजिक संरचना—तीनों में छिपा है। अधिकार कोई एकरंगी शब्द नहीं है। किसी के लिए अधिकार का अर्थ संस्था के भीतर हिंसा से सुरक्षा है; किसी के लिए अपनी पसंद का निवास और दैनिक जीवन का नियंत्रण; किसी के लिए सड़क, स्कूल, विश्वविद्यालय, ऑफिस और परिवहन तक निर्बाध पहुंच; और किसी के लिए यह सब एक साथ।
समस्या तब पैदा होती है जब राज्य जटिल वास्तविकताओं को सरल नारों में समेटना चाहता है। उदाहरण के लिए, अगर सरकार कहे कि वह ‘संस्थान-मुक्त समाज’ बनाना चाहती है, तो यह सुनने में प्रगतिशील लगता है। लेकिन यदि वह यह नहीं बताती कि समुदाय-आधारित सहायता कौन देगा, व्यक्तिगत सहायकों के लिए बजट कहां से आएगा, सुलभ आवास कैसे बनेगा, परिवारों को विश्राम और सहायता कैसे मिलेगी, और गंभीर जरूरत वाले लोगों के लिए निरंतर देखभाल कैसे सुनिश्चित होगी—तो नारा वास्तविक जीवन से कट सकता है। दूसरी ओर, अगर कोई यह कहे कि संस्थाएं अभी जरूरी हैं, तो यह व्यावहारिक लग सकता है। लेकिन यदि उसी के भीतर निगरानी, पारदर्शिता, स्वतंत्र शिकायत व्यवस्था, निवासियों की निर्णय क्षमता और बाहरी सामाजिक संपर्क न हो, तो ‘जरूरत’ का तर्क यथास्थिति की ढाल बन सकता है।
यही कारण है कि कोरिया में एक ही दिन तीन तरह की आवाज़ें सुनाई दीं। वे जरूरी नहीं कि एक-दूसरे की शत्रु हों; वे दरअसल एक ही अधूरी व्यवस्था के अलग-अलग दर्दनाक बिंदुओं को सामने ला रही हैं। अभिभावक कह रहे हैं कि सुरक्षा के नाम पर बंद ढांचे में हिंसा छिपाई नहीं जा सकती। संस्थान से जुड़े पक्ष कह रहे हैं कि आदर्शवादी बदलाव के नाम पर मौजूदा निवासियों की जिंदगी को अस्थिर मत कीजिए। व्यापक अधिकार मोर्चा कह रहा है कि बहस को सिर्फ संस्था तक सीमित मत कीजिए; असल प्रश्न है कि समाज दिव्यांग नागरिक को बराबरी के साथ स्वीकार करने के लिए कितना तैयार है।
भारतीय समाज में भी यही तनाव बार-बार उभरता है। हम अक्सर दिव्यांगता पर बात करते समय ‘सेवा’ की भाषा में सहज होते हैं, ‘अधिकार’ की भाषा में कम। सेवा की भाषा में दान, सहानुभूति, देखभाल और करुणा है; अधिकार की भाषा में कानून, बजट, ढांचा, जवाबदेही और शक्ति-संतुलन है। सेवा जरूरी है, लेकिन अधिकार के बिना वह असमान संबंध को स्थायी भी कर सकती है। कोरिया की बहस हमें यह समझने का अवसर देती है कि दिव्यांग नीति में भावनात्मक सद्भावना पर्याप्त नहीं; संस्थागत डिजाइन, नागरिक भागीदारी और जवाबदेही उससे भी अधिक महत्वपूर्ण हैं।
भारतीय पाठकों के लिए इसका क्या अर्थ है?
दक्षिण कोरिया का यह प्रकरण भारत के लिए एक दर्पण की तरह देखा जा सकता है। हमारे यहां दिवyangjan Sashaktikaran से जुड़ी नीतियां, आरक्षण, सुलभ भारत अभियान, शिक्षा और सामाजिक सुरक्षा की व्यवस्थाएं मौजूद हैं, लेकिन जमीन पर अनुभव असमान और अक्सर निराशाजनक है। शहरों में पहुंचनीयता अधूरी है, ग्रामीण क्षेत्रों में सेवाओं की उपलब्धता और भी कमजोर है, परिवारों पर देखभाल का भारी बोझ है, और अधिकारों का प्रवर्तन कई बार कागजी रहता है। ऐसे में कोरिया की बहस हमें यह सोचने का मौका देती है कि हमें अपने यहां किस तरह के ढांचे चाहिए।
पहला सबक यह है कि दिव्यांगता का प्रश्न केवल कल्याण विभाग का विषय नहीं है। यह शहरी विकास, परिवहन, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, आवास, न्याय और स्थानीय शासन—सबसे जुड़ा हुआ प्रश्न है। जब तक नीति समग्र नहीं होगी, व्यक्ति को अधिकार खंडित रूप में ही मिलेंगे। दूसरा सबक यह है कि परिवार को राज्य के विकल्प के रूप में नहीं देखा जा सकता। भारत में अधिकांश देखभाल परिवारों, खासकर महिलाओं, पर टिकी होती है। जब राज्य समुदाय-आधारित सहायता उपलब्ध नहीं कराता, तब परिवार चुपचाप पूरा बोझ उठाता है। ऐसे में संस्था और परिवार के बीच झूलते व्यक्ति की स्वायत्तता कहीं पीछे छूट जाती है।
तीसरा सबक यह है कि संस्थानों के बारे में बहस ईमानदारी से होनी चाहिए। अगर कोई संस्था है, तो उसके भीतर अधिकारों की मजबूत सुरक्षा, स्वतंत्र निरीक्षण, शिकायत निवारण और पारदर्शिता अनिवार्य होनी चाहिए। और अगर समुदाय-आधारित जीवन को बढ़ावा देना है, तो वह केवल विचारधारा नहीं, वास्तविक निवेश से संभव होगा—व्यक्तिगत सहायता सेवाएं, सुलभ मकान, पड़ोस स्तर पर समर्थन, समावेशी स्कूल, नियोक्ताओं की जवाबदेही और स्थानीय निकायों की भूमिका बढ़ाए बिना नहीं। चौथा सबक यह है कि दिव्यांग व्यक्तियों को नीति के ‘लाभार्थी’ के रूप में नहीं, नीति-निर्माण के सक्रिय सहभागी के रूप में देखना होगा। उनके बिना बनी कोई भी व्यवस्था अंततः उनके जीवन की जटिलताओं को अधूरा ही समझेगी।
कोरिया की 20 अप्रैल की तस्वीर हमें यह भी बताती है कि लोकतंत्र में असहमति विफलता का संकेत नहीं, बल्कि परिपक्वता का भी संकेत हो सकती है। जब विभिन्न समूह सड़क पर उतरकर अपने अनुभव के आधार पर राज्य से जवाब मांगते हैं, तो इसका अर्थ यह भी है कि समाज अब सतही प्रतीकों से संतुष्ट नहीं है। भारत में भी हमें दिव्यांगजन दिवस जैसे अवसरों को केवल सम्मान समारोहों, प्रेरक कथाओं और औपचारिक संदेशों तक सीमित नहीं रखना चाहिए। असली प्रश्न यह है कि क्या कोई दिव्यांग नागरिक अपने शहर में बेझिझक घूम सकता है, अपनी पसंद से पढ़ और काम कर सकता है, हिंसा से सुरक्षित है, और जरूरत पड़ने पर राज्य उसकी मदद के लिए समय पर मौजूद है।
उत्सव से आगे, नागरिकता के केंद्र तक
सियोल में दिव्यांगजन दिवस पर उभरा यह विभाजित परिदृश्य अंततः एक गहरी लोकतांत्रिक सच्चाई को सामने लाता है: अधिकारों की राजनीति कभी सरल नहीं होती। खासकर तब नहीं, जब वह उन लोगों की बात कर रही हो जिन्हें लंबे समय तक या तो करुणा का पात्र माना गया, या परिवार और संस्थानों की निजी दुनिया में सीमित समझा गया। दक्षिण कोरिया में इस दिन की तीनों प्रमुख घटनाओं ने अलग-अलग शब्दों में यही कहा कि अब दिव्यांगता को ‘कल्याण’ के संकरे फ्रेम से बाहर निकालकर ‘नागरिकता’ के बड़े फ्रेम में देखना होगा।
यहां राज्य की परीक्षा केवल उसके इरादों से नहीं, उसकी क्षमता और संवेदनशीलता से होगी। क्या वह उत्पीड़न की शिकायतों को गंभीरता से लेकर संस्थागत ढांचों की समीक्षा करेगा? क्या वह संस्थाओं में रह रहे लोगों की असुरक्षा और विकल्पहीनता को समझेगा? क्या वह समुदाय-आधारित जीवन की ऐसी वास्तविक व्यवस्था बना पाएगा, जो केवल नारे नहीं, टिकाऊ समर्थन दे? क्या वह दिव्यांग अधिकारों को परिवहन, शिक्षा, श्रम और आवास की मुख्यधारा नीति से जोड़ेगा? और क्या वह इस पूरी प्रक्रिया में दिव्यांग व्यक्तियों, उनके परिवारों और उनके संगठनों को बराबरी से सुनेगा?
भारतीय पाठकों के लिए यह कहानी इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि हम भी एक ऐसे दौर में हैं जहां विकास, बुनियादी ढांचे और सामाजिक न्याय की भाषा साथ-साथ चल रही है, लेकिन उनकी रफ्तार बराबर नहीं है। कोरिया का अनुभव हमें सावधान करता है कि चमकदार आधुनिकता अपने आप समावेशी नहीं होती। समावेशन को डिज़ाइन करना पड़ता है, उस पर खर्च करना पड़ता है, उसे कानून और जवाबदेही से सुरक्षित करना पड़ता है, और सबसे बढ़कर उसे प्रभावित लोगों की आवाज़ से दिशा देनी पड़ती है।
दिव्यांगजन दिवस की असली गरिमा शायद यहीं है—यह दिन हमें यह पूछने के लिए मजबूर करे कि समाज किसे अपना बराबरी का नागरिक मानता है। सियोल की सड़कों से उठी अलग-अलग आवाज़ें इसी सवाल के अलग-अलग उत्तर नहीं, बल्कि उसके अलग-अलग आयाम थीं। वे हमें बताती हैं कि अधिकार केवल घोषणा नहीं, बल्कि कठिन नीति-निर्माण, सतत निगरानी, सामाजिक बदलाव और राजनीतिक इच्छा का नाम है। और शायद यही किसी भी लोकतंत्र की सबसे कठिन, लेकिन सबसे जरूरी परीक्षा भी है।
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