
कोरिया की नई कहानी: नौकरी से आगे, विचार को व्यवसाय बनाने की चाह
दक्षिण कोरिया को दुनिया आम तौर पर सैमसंग, ह्युंदई, एलजी, सेमीकंडक्टर, जहाज़ निर्माण, के-पॉप और के-ड्रामा के देश के रूप में जानती है। लेकिन इस चमकदार औद्योगिक और सांस्कृतिक छवि के पीछे एक और कोरिया तेजी से आकार ले रहा है—वह कोरिया जो बड़ी कंपनियों के भरोसे ही नहीं, बल्कि आम नागरिकों, छात्रों, युवा पेशेवरों और पहली बार जोखिम लेने वालों के विचारों पर भी भविष्य बनाना चाहता है। इसी बदलाव की एक अहम झलक हाल में तब दिखी जब दक्षिण कोरिया के लघु, मध्यम और स्टार्टअप मामलों के मंत्रालय ने बताया कि सरकार समर्थित ‘मोडूए चांगअप’, यानी मोटे तौर पर कहें तो ‘सबके लिए उद्यमिता’ परियोजना के लिए 62,944 आवेदन मिले हैं।
यह संख्या सिर्फ एक सरकारी योजना की लोकप्रियता नहीं बताती। यह उस सामाजिक और आर्थिक मनोविज्ञान की तरफ इशारा करती है जिसमें उद्यमिता अब केवल पूंजीपति परिवारों, तकनीकी विशेषज्ञों या पहले से उद्योग में जमे लोगों का क्षेत्र नहीं रह गई है। यदि इस योजना का मूल संदेश यह है कि ‘सिर्फ एक आइडिया हो, तब भी आप शुरुआत कर सकते हैं’, तो इतने बड़े पैमाने पर लोगों का आवेदन करना इस बात का संकेत है कि दक्षिण कोरिया में विचार को अवसर में बदलने की भूख वास्तविक है, सतही नहीं।
भारतीय पाठकों के लिए इसे समझना आसान है। हमारे यहां जैसे पिछले एक दशक में ‘स्टार्टअप इंडिया’, ‘डिजिटल इंडिया’, ‘मेक इन इंडिया’, राज्य स्तरीय इनक्यूबेशन योजनाओं और कॉलेज कैंपसों में उद्यमिता कोशों के जरिए यह संदेश फैलाया गया कि नौकरी ही जीवन का एकमात्र रास्ता नहीं है, वैसे ही कोरिया भी अब उद्यमिता को व्यापक सामाजिक विकल्प बनाने की दिशा में बढ़ता दिख रहा है। फर्क यह है कि कोरिया जैसी अत्यंत प्रतिस्पर्धी, परीक्षा-केंद्रित और कॉरपोरेट-प्रधान अर्थव्यवस्था में इस तरह का जन-उद्यमिता संदेश और भी अधिक महत्व रखता है।
इस परियोजना के लिए आवेदन 26 मार्च से शुरू हुए थे और अंतिम दिन शाम 8 बजे तक की गणना में यह आंकड़ा सामने आया। ऐसे सरकारी कार्यक्रमों में अक्सर घोषणाएं तो बड़ी होती हैं, मगर नागरिकों की वास्तविक भागीदारी सीमित रह जाती है। यहां मामला उलटा है। नीति बनी, मंच तैयार हुआ, और बड़ी संख्या में लोग आगे आए। आर्थिक पत्रकारिता की भाषा में कहें तो यहां सिर्फ ‘स्कीम’ नहीं, ‘डिमांड रिस्पॉन्स’ महत्वपूर्ण है। यानी सरकार ने अवसर का दरवाज़ा खोला और समाज ने उस दरवाज़े से भीतर आने में गंभीर रुचि दिखाई।
यहां एक और बात समझना जरूरी है। दक्षिण कोरिया लंबे समय तक उन अर्थव्यवस्थाओं में गिना गया है जहां बड़ी औद्योगिक कंपनियां—जिन्हें वहां ‘चेबोल’ कहा जाता है—राष्ट्रीय विकास की धुरी रही हैं। ‘चेबोल’ शब्द भारतीय पाठकों के लिए वैसा ही समझा जा सकता है जैसे किसी बहुत बड़े उद्योग समूह का प्रभुत्व, हालांकि कोरिया की संरचना और इतिहास अलग है। अब यदि उसी देश में सरकार विचार-आधारित शुरुआती उद्यमिता को जन-स्तर पर प्रोत्साहित कर रही है और लाखों नहीं तो कम-से-कम दसियों हजार लोग उस दिशा में हाथ उठाकर कह रहे हैं कि वे भी कोशिश करना चाहते हैं, तो यह आर्थिक संस्कृति में बदलाव का संकेत है।
62,944 आवेदनों का असली अर्थ: सिर्फ उत्साह नहीं, सामाजिक मानसिकता का परिवर्तन
किसी भी योजना के लिए बड़ी संख्या में आवेदन आना पहली नज़र में उत्साह, उम्मीद या पुरस्कार राशि के आकर्षण की कहानी लग सकता है। लेकिन 62,944 आवेदनों का महत्व उससे कहीं बड़ा है। यह संख्या बताती है कि दक्षिण कोरिया में उद्यमिता अब एक ‘असामान्य’ विकल्प भर नहीं रही। उसे जीवन-निर्माण के वैध रास्ते के रूप में स्वीकार किया जा रहा है।
यह ठीक वैसे ही है जैसे भारत में कभी सिविल सेवा, इंजीनियरिंग, डॉक्टर या बैंक नौकरी को ही मुख्यधारा माना जाता था, लेकिन अब स्टार्टअप संस्थापक, ऐप डेवलपर, डी2सी ब्रांड बनाने वाला युवा, एग्री-टेक इनोवेटर या कंटेंट-आधारित डिजिटल उद्यमी भी सामाजिक पहचान हासिल कर रहा है। कोरिया में यह बदलाव इसलिए और दिलचस्प है क्योंकि वहां रोजगार का सामाजिक दबाव, प्रतिष्ठित डिग्रियों की होड़ और कॉरपोरेट नौकरी की चाह लंबे समय से बेहद गहरी रही है। ऐसे समाज में यदि लाखों नहीं तो दसियों हजार लोग यह मानने लगें कि विचार को कंपनी में बदला जा सकता है, तो यह नीति की सफलता से पहले मानसिकता की सफलता है।
आर्थिक रूप से देखें तो किसी भी स्टार्टअप पारिस्थितिकी तंत्र की ताकत केवल इस बात से नहीं मापी जाती कि कितने ‘यूनिकॉर्न’ बने। उससे पहले यह देखना होता है कि प्रवेश-द्वार कितना चौड़ा है। कितने लोग पहली बार कोशिश कर सकते हैं? कितनों के पास पूंजी न होते हुए भी प्रारंभिक सहयोग उपलब्ध है? कितनों को यह भरोसा है कि विफल होने पर भी उन्हें सामाजिक बहिष्कार का सामना नहीं करना पड़ेगा? कोरिया की यह परियोजना इसी प्रवेश-द्वार को चौड़ा करने की कोशिश लगती है।
‘सिर्फ आइडिया हो तो भी’—यह वाक्य सुनने में प्रचार-जैसा लग सकता है, लेकिन नीति-शास्त्र के स्तर पर इसका अर्थ गहरा है। इसका मतलब यह है कि सरकार उन लोगों तक पहुंच बनाना चाहती है जो अभी प्रोटोटाइप, बाजार, निवेशक या टीम की अवस्था तक नहीं पहुंचे हैं। यानी लक्ष्य केवल तैयार कंपनियां चुनना नहीं, बल्कि संभावित उद्यमियों का आधार बढ़ाना है। भारत में भी यही बहस बार-बार सामने आती है कि क्या समर्थन उन स्टार्टअप्स तक सीमित है जो पहले से अंग्रेज़ी बोलने वाले महानगरीय नेटवर्क, वेंचर कैपिटल और प्रतिष्ठित संस्थानों से जुड़े हैं, या फिर अवसर छोटे शहरों, नए स्नातकों, महिलाओं, फ्रीलांसरों और साधारण पृष्ठभूमि के युवाओं तक भी पहुंचता है। कोरिया के इस कदम को उसी बहस के संदर्भ में पढ़ा जा सकता है।
यह भी सच है कि आवेदन संख्या सफलता की गारंटी नहीं होती। 62,944 में से कितने विचार व्यवहार्य होंगे, कितनी टीमें टिकेंगी, कितनों का मॉडल बाजार में टिकाऊ साबित होगा—यह बाद की बात है। लेकिन किसी भी नवाचार-आधारित अर्थव्यवस्था में ‘इनपुट पाइपलाइन’ पहले आती है, परिणाम बाद में। अगर शुरुआत में ही भागीदारी कम हो, तो आगे निकलने वाले सफल उपक्रमों की संख्या भी सीमित रहेगी। इसलिए यह आंकड़ा कोरिया के उद्यमिता-तंत्र की वर्तमान ऊर्जा का आधारभूत संकेतक है।
एक और पहलू पर ध्यान देना चाहिए। बड़ी संख्या में आवेदन यह भी बताते हैं कि आर्थिक असुरक्षा, बदलती नौकरी संरचना, तकनीक के प्रसार और आत्मनिर्भर पेशेवर पहचान की चाह साथ-साथ काम कर रही है। भारत में जैसे गिग इकॉनमी, डिजिटल प्लेटफॉर्म और कम पूंजी में शुरू होने वाले ऑनलाइन मॉडल ने युवाओं की महत्वाकांक्षा का स्वरूप बदला है, वैसे ही कोरिया में भी तकनीकी अवसंरचना और डिजिटल दक्षता उद्यमिता को अधिक सुलभ बना रही है।
‘हर किसी के लिए उद्यमिता’ की अवधारणा क्या है, और भारतीय पाठक इसे कैसे समझें
दक्षिण कोरिया का संबंधित मंत्रालय इस परियोजना को एक ऐसे मंच के रूप में पेश करता है जो ‘आइडिया रखने वाले किसी भी व्यक्ति’ को उद्यमिता की चुनौती लेने में मदद करना चाहता है। इसे समझने के लिए भारतीय संदर्भ उपयोगी है। मान लीजिए किसी छात्र के पास एक कृषि-तकनीक आधारित समाधान का विचार है, किसी गृहिणी के पास स्थानीय खाद्य उत्पाद को ब्रांड बनाने की योजना है, किसी इंजीनियर के पास बुज़ुर्गों के लिए स्वास्थ्य-सहायक डिवाइस का कॉन्सेप्ट है, या किसी छोटे शहर के युवा के पास एक भाषा-आधारित डिजिटल सेवा का मॉडल है—ऐसे लोग अक्सर सबसे शुरुआती चरण में ही अटक जाते हैं, क्योंकि उनके पास पूंजी, सलाह, नेटवर्क, बाज़ार-समझ और कानूनी ढांचे की जानकारी नहीं होती।
यदि कोई राज्य या राष्ट्रीय कार्यक्रम उन्हें प्रारंभिक मार्गदर्शन, मेंटरशिप, प्रतियोगी चयन, संभवतः अनुदान या पुरस्कार और नेटवर्किंग का अवसर देता है, तो वह ‘शुरुआत का लोकतंत्रीकरण’ करता है। यही इस कोरियाई मॉडल का केंद्रीय महत्व है। इसका अर्थ यह नहीं कि सरकार सबको व्यवसाय में बदल देगी, बल्कि यह कि सरकार समाज को यह संदेश दे रही है कि आइडिया की शुरुआती अवस्था भी नीति-योग्य है।
भारतीय उद्यमिता विमर्श में लंबे समय से एक समस्या रही है—हम अक्सर अंतिम सफलता की कहानी को उत्सव की तरह पेश करते हैं, लेकिन पहले कदम की कठिनाई को पर्याप्त महत्व नहीं देते। कोरिया का यह कार्यक्रम इसी ‘पहले कदम’ पर रोशनी डालता है। वहां की नीति भाषा से लगता है कि लक्ष्य केवल तैयार संस्थापकों को छांटना नहीं, बल्कि संभावित प्रतिभाओं को प्रणाली के भीतर लाना है।
कोरिया के सामाजिक ढांचे को समझे बिना इस योजना की अहमियत पूरी तरह स्पष्ट नहीं होगी। यह एक ऐसा देश है जहां शिक्षा, अनुशासन, प्रदर्शन और संस्थागत प्रतिस्पर्धा का दबाव बहुत अधिक है। वहां युवा अक्सर उच्च शिक्षा, नौकरी और सामाजिक प्रतिष्ठा की एक संकरी परिभाषा के भीतर काम करते रहे हैं। ऐसे माहौल में ‘जोखिम लो, विचार से शुरुआत करो, असफलता से डरो मत’ जैसी नीति-भाषा केवल आर्थिक नहीं, सांस्कृतिक हस्तक्षेप भी है।
भारतीय पाठकों के लिए यह उसी तरह है जैसे हमारे यहां लंबे समय तक ‘सरकारी नौकरी’ को अंतिम सुरक्षा-चिह्न माना जाता रहा, लेकिन धीरे-धीरे यह स्वीकार्यता बनी कि उद्यमिता भी सम्मानजनक और प्रभावशाली जीवन-पथ हो सकती है। हालांकि भारत का सामाजिक परिदृश्य कोरिया से अधिक विविध और असमान है, फिर भी दोनों देशों में एक साझा सवाल मौजूद है—क्या नई पीढ़ी सिर्फ रोजगार मांगने वाली पीढ़ी होगी, या रोजगार गढ़ने वाली भी बनेगी?
इस परियोजना का सांकेतिक महत्व इसी प्रश्न में छिपा है। यदि कोई राज्य यह कहता है कि विचार ही आपकी पात्रता हो सकता है, तो वह योग्यता की परिभाषा का विस्तार कर रहा है। अब यह देखने की बात होगी कि चयन, प्रशिक्षण और संसाधन-वितरण के अगले चरणों में यह समावेशी भाषा कितनी सच्चाई से लागू होती है। क्योंकि नीतियां अक्सर अपने शुरुआती नारे से नहीं, अंतिम क्रियान्वयन से परखी जाती हैं।
कैंपस, युवा और कोरियाई समाज: क्यों विश्वविद्यालय इस कहानी के केंद्र में हैं
इस पहल से जुड़ी एक महत्वपूर्ण जानकारी यह भी है कि कोरिया के लघु, मध्यम और स्टार्टअप मामलों की मंत्री ने सियोल के एक प्रमुख विश्वविद्यालय, चुंग-अंग यूनिवर्सिटी, में आयोजित ‘2026 मोडूए चांगअप कैंपस टूर टॉक कॉन्सर्ट’ में हिस्सा लिया। भारतीय पाठकों के लिए ‘कैंपस टूर टॉक कॉन्सर्ट’ शब्द थोड़ा नया लग सकता है। कोरिया में नीति, युवा संस्कृति और सार्वजनिक संवाद कई बार अधिक मंचीय, सहभागितापूर्ण और कार्यक्रम-आधारित रूप में सामने आते हैं। यह किसी सरकारी भाषण भर की घटना नहीं, बल्कि युवाओं के बीच जाकर विचार को लोकप्रिय बनाने की रणनीति भी है।
विश्वविद्यालय किसी भी देश में प्रतिभा, बेचैनी, महत्वाकांक्षा और अनिश्चितता का संगम होते हैं। भारत में आईआईटी, आईआईएम, केंद्रीय विश्वविद्यालय, राज्य विश्वविद्यालय, निजी संस्थान और अब अनेक स्टार्टअप इन्क्यूबेटर यह भूमिका निभा रहे हैं। कोरिया में भी विश्वविद्यालय सिर्फ डिग्री देने की जगह नहीं, बल्कि सामाजिक गतिशीलता के केंद्र हैं। ऐसे में यदि उद्यमिता कार्यक्रम कैंपस तक पहुंचता है, तो इसका मतलब है कि सरकार बहुत शुरुआती अवस्था में ही संभावित प्रतिभाओं को पहचानना चाहती है।
यहां यह समझना जरूरी है कि कैंपस-आधारित उद्यमिता सिर्फ तकनीकी स्टार्टअप तक सीमित नहीं रहती। इसके भीतर सांस्कृतिक सामग्री, डिज़ाइन, शिक्षा-प्रौद्योगिकी, हेल्थ-टेक, हरित नवाचार, उपभोक्ता सेवाएं, स्थानीय समुदाय आधारित समाधान और डिजिटल कॉमर्स भी आते हैं। कोरिया के संदर्भ में यह और रोचक है क्योंकि वहां पॉप संस्कृति, ब्यूटी उद्योग, गेमिंग, डिजिटल प्लेटफॉर्म और तेज़ उपभोक्ता रुझानों का संगम उद्यमिता के लिए अलग तरह का अवसर बनाता है।
भारतीय नजरिए से देखें तो यह वही मोड़ है जहां युवा ‘प्लेसमेंट’ और ‘पैशन’ के बीच चयन करना सीखते हैं। कोरिया में भी प्रतिस्पर्धी नौकरी बाजार और ऊंची जीवन-लागत युवाओं को वैकल्पिक मार्गों पर सोचने के लिए प्रेरित कर सकती है। अगर राज्य इस मोड़ पर हस्तक्षेप कर रहा है, तो वह केवल आर्थिक विकास नहीं, सामाजिक आत्मविश्वास भी बनाने की कोशिश कर रहा है।
कैंपस में जाकर उद्यमिता को लोकप्रिय बनाना एक संदेश और भी देता है—उद्यम शुरू करना केवल उन लोगों का क्षेत्र नहीं जो पहले से उद्योग जगत में संबंध रखते हों। यह पहली पीढ़ी के उद्यमियों को वैधता देता है। भारत में जैसे छोटे शहरों से आने वाले युवाओं ने ई-कॉमर्स, शिक्षा-प्रौद्योगिकी, फिनटेक और कंटेंट के क्षेत्र में नई कहानियां लिखी हैं, वैसे ही कोरिया भी शायद अपनी अगली नवाचार-लहर को व्यापक सामाजिक पृष्ठभूमियों से खोजना चाहता है।
कैंपस टूर की प्रतीकात्मकता को कम नहीं आंका जाना चाहिए। नीति यदि केवल सरकारी वेबसाइट पर रहे तो उसका प्रभाव सीमित होता है। लेकिन जब वही नीति मंच, संवाद, प्रश्नोत्तर, प्रेरक कथाओं और प्रत्यक्ष भागीदारी के माध्यम से युवाओं तक जाती है, तो वह ‘योजना’ से आगे बढ़कर ‘आंदोलन’ जैसी अनुभूति दे सकती है। 62,944 आवेदनों की पृष्ठभूमि में यह रणनीति निश्चित रूप से असरदार दिखती है।
भारत के लिए क्या सबक हैं: स्टार्टअप इंडिया से आगे, ‘प्रवेश का लोकतंत्रीकरण’
दक्षिण कोरिया की यह घटना भारत के लिए इसलिए भी दिलचस्प है क्योंकि हमारे यहां स्टार्टअप चर्चा अक्सर निवेश, वैल्यूएशन, यूनिकॉर्न और फंडिंग विंटर जैसे शब्दों के इर्द-गिर्द घूमती है। लेकिन असली सवाल इससे पहले का है—क्या भारत में उद्यमिता की पहली सीढ़ी उतनी ही समावेशी है जितनी होनी चाहिए? क्या कोई छात्र, छोटे कस्बे की महिला, हिंदीभाषी युवा, पारंपरिक व्यवसायिक पृष्ठभूमि से बाहर का व्यक्ति, या गैर-अंग्रेज़ी माध्यम से पढ़ा नवप्रवर्तक समान आत्मविश्वास के साथ प्रणाली में प्रवेश कर सकता है?
कोरिया के 62,944 आवेदन हमें याद दिलाते हैं कि किसी भी स्टार्टअप इकोसिस्टम की सफलता केवल शीर्ष पर दिखने वाली कंपनियों पर निर्भर नहीं करती। उसके नीचे एक बहुत बड़ा सामाजिक आधार चाहिए—वह आधार जिसमें लोग स्वयं को संभावित उद्यमी मानें। भारत में यह आधार बढ़ा है, लेकिन अभी भी भाषाई, भौगोलिक, लैंगिक और नेटवर्क-आधारित बाधाएं मौजूद हैं।
उदाहरण के लिए, बेंगलुरु, दिल्ली-एनसीआर, मुंबई, हैदराबाद और पुणे जैसे शहरों से बाहर निकलकर स्टार्टअप पारिस्थितिकी तंत्र को जिलों और दूसरे दर्जे के शहरों तक ले जाना अभी भी बड़ी चुनौती है। इसी तरह, सरकारी योजनाओं की जानकारी, आवेदन प्रक्रिया की सरलता, मेंटरशिप की उपलब्धता और स्थानीय भाषा में सहायता जैसे मुद्दे निर्णायक बन जाते हैं। यदि कोरिया सचमुच ‘किसी भी व्यक्ति’ को लक्षित कर रहा है, तो भारत के लिए भी यह संकेत है कि उद्यमिता नीतियों का अगला चरण केवल पूंजी आपूर्ति नहीं, बल्कि सामाजिक पहुंच का विस्तार होना चाहिए।
भारत और कोरिया की तुलना करते समय एक भिन्नता भी ध्यान में रखनी चाहिए। भारत की जनसंख्या, क्षेत्रीय विविधता और आर्थिक विषमता कहीं अधिक व्यापक है। इसलिए यहां किसी एक राष्ट्रीय कार्यक्रम से वैसे परिणाम तुरंत नहीं मिलते जैसे अपेक्षाकृत छोटे और संगठित देशों में मिल सकते हैं। फिर भी नीति-दृष्टि का सबक समान है—यदि आप नई अर्थव्यवस्था बनाना चाहते हैं, तो अवसर का दरवाज़ा नीचे तक खोलना पड़ेगा।
हमारे यहां स्वयं सहायता समूहों, महिला उद्यमिता योजनाओं, कृषि-आधारित नवाचार, ओएनडीसी जैसे खुले डिजिटल ढांचे, यूपीआई-आधारित सूक्ष्म व्यवसाय मॉडल, राज्य स्तरीय इनोवेशन मिशनों और कॉलेज इन्क्यूबेशन कार्यक्रमों में इसी विचार के बीज दिखते हैं। लेकिन अक्सर ये तंत्र एक-दूसरे से जुड़े नहीं होते। कोरिया का मामला बताता है कि जब सरकार स्पष्ट संदेश, मंचीय संवाद और सरल भागीदारी तंत्र को एक साथ रखती है, तो भागीदारी घनी हो सकती है।
भारतीय नीति-निर्माताओं के लिए असली सीख यह हो सकती है कि स्टार्टअप विमर्श को सिर्फ ‘अगला यूनिकॉर्न कौन’ से आगे बढ़ाकर ‘पहली बार कोशिश करने वालों की संख्या कितनी बढ़ी’ तक लाया जाए। क्योंकि अंततः वही आधार भविष्य की बड़ी कंपनियों, स्थानीय रोजगार और समाज-आधारित नवाचार की असली जमीन बनता है।
वित्त, नीति और उद्यमिता: एक ही दिन दिखी कोरिया की व्यापक आर्थिक तस्वीर
इस खबर को यदि व्यापक आर्थिक संदर्भ में रखा जाए तो तस्वीर और दिलचस्प हो जाती है। उसी दिन दक्षिण कोरिया में वित्तीय क्षेत्र से जुड़े अन्य संकेत भी सामने आए—जिनमें एक प्रमुख डिजिटल ब्रोकरेज मंच के तिमाही रिकॉर्ड राजस्व और बड़े वित्तीय समूहों की ओर से ‘उत्पादक’ तथा ‘समावेशी’ वित्त के प्रति समर्थन जैसी बातें शामिल थीं। ये घटनाएं सीधे तौर पर ‘मोडूए चांगअप’ परियोजना का हिस्सा नहीं हैं, लेकिन मिलकर वे उस आर्थिक माहौल की झलक देती हैं जिसमें उद्यमिता, वित्तीय सेवाएं और नीति-भाषा एक-दूसरे से अलग-थलग नहीं चल रहीं।
किसी भी आधुनिक अर्थव्यवस्था में स्टार्टअप केवल विचार से नहीं बढ़ते; उन्हें भुगतान व्यवस्था, डिजिटल वित्त, निवेश चैनल, पूंजी बाज़ार का विश्वास, नियामकीय स्पष्टता और सामाजिक वैधता की जरूरत होती है। यदि एक ओर युवाओं को आवेदन करने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है और दूसरी ओर वित्तीय तंत्र खुद को अधिक उत्पादक तथा समावेशी बताने की कोशिश कर रहा है, तो इसका मतलब है कि कोरिया नवाचार को अलग क्षेत्र नहीं, व्यापक आर्थिक परियोजना के रूप में देखना चाहता है।
भारत में भी यह संबंध साफ दिखाई देता है। यूपीआई, आधार-आधारित पहचान, ऑनलाइन कंपनी पंजीकरण, जीएसटी ढांचा, डिजिटल मार्केटिंग, क्लाउड सेवाएं और सस्ते डेटा ने मिलकर छोटे उद्यमों की शुरुआत आसान बनाई है। कोरिया में डिजिटल परिपक्वता पहले से काफी ऊंची है; इसलिए वहां प्रारंभिक उद्यमिता के लिए संरचनात्मक समर्थन अपेक्षाकृत अधिक सुसंगत बन सकता है। यही कारण है कि इतने बड़े पैमाने पर आवेदन केवल भावनात्मक प्रतिक्रिया नहीं, संस्थागत भरोसे की अभिव्यक्ति भी हो सकते हैं।
फिर भी यहां सावधानी जरूरी है। कोई भी राज्य जब ‘समावेशी’ या ‘सबके लिए’ जैसा शब्द इस्तेमाल करता है, तो असली परीक्षा यही होती है कि क्या चयन प्रक्रिया निष्पक्ष है, क्या क्षेत्रीय विविधता का प्रतिनिधित्व होगा, क्या महिलाओं और गैर-पारंपरिक पृष्ठभूमि के उम्मीदवारों को पर्याप्त अवसर मिलेगा, और क्या कार्यक्रम अनुदान के बाद भी हाथ नहीं छोड़ देगा। अनेक देशों में हमने देखा है कि शुरुआती उत्साह के बाद समर्थन तंत्र कमजोर पड़ जाता है।
कोरिया की इस पहल की सफलता इसलिए केवल आवेदन संख्या से नहीं आंकी जानी चाहिए, बल्कि इस बात से भी कि यह कितने टिकाऊ उद्यम, कितनी नई नौकरियां, कितने सामाजिक समाधान और कितनी दूसरी पीढ़ी के आवेदक पैदा करती है। यदि पहले बैच के प्रतिभागी आगे चलकर दूसरों के लिए प्रेरणा बनते हैं, तब यह कार्यक्रम नीति से आगे बढ़कर राष्ट्रीय उद्यमिता संस्कृति का हिस्सा बन सकता है।
यहां के-पॉप और कोरियाई सांस्कृतिक प्रभाव का भी एक अप्रत्यक्ष संदर्भ है। दक्षिण कोरिया ने पिछले दो दशकों में संस्कृति, तकनीक और ब्रांडिंग को राष्ट्रीय शक्ति में बदला है। जब कोई समाज अपने कलाकार, डेवलपर, डिज़ाइनर, गेम निर्माता, ब्यूटी ब्रांड, फैशन उद्यमी और टेक संस्थापक को एक ही आधुनिक पहचान-परिवार में देखना शुरू करता है, तब उद्यमिता केवल आर्थिक श्रेणी नहीं रहती; वह सांस्कृतिक आकांक्षा भी बन जाती है। यह पहल शायद उसी विस्तृत परिवर्तन की एक प्रशासनिक अभिव्यक्ति है।
आगे का रास्ता: क्या कोरिया ‘विचार-लोकतंत्र’ को टिकाऊ उद्यमिता में बदल पाएगा?
62,944 आवेदन निस्संदेह प्रभावशाली हैं। लेकिन बड़ी संख्या कहानी की शुरुआत है, अंत नहीं। असली सवाल अब यह है कि क्या दक्षिण कोरिया इस उत्साह को संरचित, न्यायसंगत और दीर्घकालिक उद्यमिता परिणामों में बदल पाएगा? क्या चयन के बाद प्रतिभागियों को वह समर्थन मिलेगा जो उन्हें विचार से बाज़ार तक ले जा सके? क्या नीति-निर्माता विफलता को भी सीखने की प्रक्रिया मानेंगे, या केवल कुछ चमकदार सफलता-कथाओं को सामने रखकर बाकी आवेदकों को भुला देंगे?
दुनिया के कई देशों ने नवाचार के नाम पर प्रतियोगिताएं, पिच इवेंट और अनुदान योजनाएं चलाईं, लेकिन वे तभी स्थायी प्रभाव डाल पाईं जब प्रशिक्षण, नेटवर्क, कानूनी सलाह, विपणन सहायता, तकनीकी परामर्श और अनुवर्ती निवेश तक एक निरंतर पुल बनाया गया। यदि कोरिया का ‘सबके लिए उद्यमिता’ मंच यही कर पाता है, तो यह केवल एक लोकप्रिय योजना नहीं, बल्कि राष्ट्रीय आर्थिक संरचना में बदलाव का उपकरण बन सकता है।
भारतीय पाठकों के लिए यह इसलिए भी अहम खबर है क्योंकि एशिया की दो बड़ी लोकतांत्रिक और तकनीकी रूप से महत्वाकांक्षी अर्थव्यवस्थाएं—भारत और दक्षिण कोरिया—अब पारंपरिक विकास मॉडल के साथ-साथ नवाचार-आधारित सामाजिक विस्तार का रास्ता भी तलाश रही हैं। भारत जहां पैमाने, डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना और युवा आबादी के बल पर आगे बढ़ रहा है, वहीं कोरिया संगठन, तकनीकी गहराई और संस्थागत फुर्ती के सहारे अपने उद्यमिता आधार को चौड़ा करना चाहता दिखता है।
इस घटनाक्रम का वैश्विक महत्व भी कम नहीं। दुनिया अक्सर दक्षिण कोरिया को ‘तैयार सफलता’ वाले देश के रूप में देखती है—जहां बड़े ब्रांड, उच्च तकनीक और निर्यात शक्ति पहले से स्थापित हैं। लेकिन यह खबर बताती है कि कोरिया अपनी अगली आर्थिक कहानी पुराने दिग्गजों के भरोसे ही नहीं लिखना चाहता। वह नए विचारों, नए प्रतिभागियों और नई सामाजिक ऊर्जा के लिए भी जगह बनाना चाहता है।
भारत में जब हम कोरिया की चर्चा करते हैं, तो अक्सर बीटीएस, ब्लैकपिंक, कोरियाई ब्यूटी, के-ड्रामा या इलेक्ट्रॉनिक्स ब्रांड सामने आते हैं। मगर इस चमकदार सांस्कृतिक प्रभाव के पीछे एक गंभीर नीतिगत प्रयोग भी चल रहा है—कैसे एक परिपक्व औद्योगिक राष्ट्र उद्यमिता को अभिजात दायरे से निकालकर अधिक सार्वजनिक, अधिक सुलभ और अधिक सामूहिक बना सकता है। 62,944 आवेदन इसी प्रयोग की पहली बड़ी सार्वजनिक गूंज हैं।
हो सकता है आने वाले महीनों में इन आवेदनों में से बहुत-से विचार रास्ते में छंट जाएं। हो सकता है केवल कुछ सौ या कुछ हजार ही आगे बढ़ें। लेकिन आर्थिक इतिहास अक्सर इसी तरह बनता है—पहले समाज के भीतर संभावना पैदा होती है, फिर संस्थान उसे दिशा देते हैं, और अंत में कुछ कहानियां पूरे दौर की पहचान बन जाती हैं। दक्षिण कोरिया में इस समय जो दिखाई दे रहा है, वह यही संभावना है। और एशिया के व्यापक संदर्भ में, विशेषकर भारत जैसे देश के लिए, यह एक ऐसी कहानी है जिसे ध्यान से पढ़ा जाना चाहिए।
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