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दक्षिण कोरिया के ग्योंगनाम में चुनाव से पहले स्वास्थ्य असमानता बड़ा मुद्दा: शहर बनाम गाँव की लड़ाई से क्या सीख सकता है भ

चुनाव, अस्पताल और आम नागरिक की चिंतादक्षिण कोरिया को भारत में अक्सर हाई-टेक अर्थव्यवस्था, के-पॉप, के-ड्रामा और तेज रफ्तार शहरी जीवन के देश के रूप में देखा जाता है। लेकिन चमकदार सियोल, बुसान और डिजिटल आधुनिकता के पीछे एक दूसरा कोरिया भी है—जहाँ छोटे शहरों, कस्बों और ग्रामीण इलाकों के लोग आज भी इस बुनियादी सवाल से जूझते हैं कि आपात स्थिति में अस्पताल तक समय पर पहुंचा जा सकेगा या नहीं। दक्षिण-पूर्वी कोरिया के ग्योंगसांगनाम-डो, जिसे आम तौर पर ग्योंगनाम कहा जाता है, में स्थानीय चुनाव से ठीक पहले स्वास्थ्य सेवाओं की यही असमानता फिर से बड़े राजनीतिक मुद्दे के रूप में उभरी है।स्थानीय मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, 7 तारीख को स्वास्थ्य एवं चिकित्सा क्षेत्र के श्रमिकों के संगठन ने ग्योंगनाम प्रांतीय सरकार के प्रेस सेंटर में संवाददाता सम्मेलन कर वहाँ के गवर्नर पद के उम्मीदवारों से मांग की कि वे क्षेत्रीय स्वास्थ्य असमानता दूर करने को अपने चुनावी वादों में शामिल करें। यह मांग सिर्फ अस्पतालों की संख्या बढ़ाने की साधारण अपील नहीं है। मुद्दा कहीं अधिक गहरा है—क्या कोरिया के भीतर भी इलाज का अधिकार भौगोलिक किस्मत पर निर्भर हो गया है? क्या बड़े शहरों में रहने वाले नागरिकों और छोटे जिलों में रहने वालों के बीच जीवन बचाने वाली चिकित्सा सुविधा तक पहुँच में खाई इतनी चौड़ी हो चुकी है कि वह अब चुनावी बहस के केंद्र में आ गई है?भारतीय पाठकों के लिए यह सवाल बहुत परिचित लगेगा। जैसे हमारे यहाँ महानगरों—दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु, हैदराबाद—और दूरदराज जिलों के बीच स्वास्थ्य ढांचे की गुणवत्ता में फर्क साफ दिखता है, वैसे ही दक्षिण कोरिया में भी राजधानी क्षेत्र और बाकी इलाकों के बीच असंतुलन एक गंभीर बहस का विषय है। फर्क बस इतना है कि कोरिया का आकार छोटा है, सड़कें बेहतर हैं और कुल संसाधन अधिक संगठित हैं; फिर भी यदि वहाँ लोग ‘समय पर इलाज’ को लेकर चुनावी दबाव बना रहे हैं, तो यह इस समस्या की गंभीरता को और उजागर करता है।ग्योंगनाम की बहस हमें याद दिलाती है कि स्वास्थ्य सेवा केवल डॉक्टर, दवा और इमारत का मामला नहीं है। यह राज्य की प्राथमिकताओं, क्षेत्रीय न्याय, सार्वजनिक निवेश और नागरिक गरिमा का प्रश्न है। चुनाव के मौसम में यह मुद्दा इसलिए भारी पड़ता है, क्योंकि वोट मांगने वाले नेताओं को बताना पड़ता है कि उनके लिए सड़क और उद्योग अधिक महत्वपूर्ण हैं या इंसानी जीवन की रक्षा करने वाला सार्वजनिक ढांचा।दक्षिण कोरिया की स्थानीय राजनीति को समझना भी यहाँ जरूरी है। वहाँ ‘स्थानीय चुनाव’ केवल नगरपालिका का रूटीन कार्यक्रम नहीं, बल्कि प्रांतों और शहरों के प्रशासनिक भविष्य का महत्वपूर्ण पड़ाव होता है। भारत में जैसे विधानसभा चुनावों से राज्य की दिशा तय होती है, वैसे ही कोरिया में प्रांतीय गवर्नर और शहरों के मेयर की भूमिका क्षेत्रीय प्रशासन, सार्वजनिक सेवाओं और बजटीय प्राथमिकताओं पर गहरा असर डालती है। इसलिए ग्योंगनाम में उठी यह मांग केवल एक कर्मचारी संगठन का ज्ञापन नहीं, बल्कि चुनावी विमर्श को मोड़ने की कोशिश है।ग्योंगनाम की तस्वीर: विकास के बीच गहराती चिकित्सा खाईग्योंगनाम दक्षिण कोरिया का एक महत्वपूर्ण प्रांत है। यह औद्योगिक गतिविधियों, बंदरगाहों, विनिर्माण और समुद्री अर्थव्यवस्था के लिए जाना जाता है। लेकिन आर्थिक सक्रियता का यह मतलब नहीं कि पूरे प्रांत में समान जीवन स्तर या समान सार्वजनिक सेवाएँ उपलब्ध हों। स्वास्थ्य क्षेत्र के प्रतिनिधियों ने जो बात रेखांकित की, वह बेहद महत्वपूर्ण है—ग्योंगनाम केवल सियोल महानगरीय क्षेत्र से पीछे नहीं है, बल्कि प्रांत के भीतर भी शहर-दर-शहर और जिला-दर-जिला फर्क तेज होता जा रहा है।यही इस बहस का सबसे चिंताजनक पहलू है। आमतौर पर जब किसी देश में क्षेत्रीय असमानता की बात होती है, तो राजधानी और बाकी हिस्सों के बीच अंतर की चर्चा की जाती है। कोरिया में भी ‘सूडोक्वोन’ यानी राजधानी क्षेत्र—जिसमें सियोल, इंचॉन और ग्योंगगी शामिल हैं—अक्सर अवसर, शिक्षा, नौकरी और उच्चस्तरीय चिकित्सा सेवाओं का केंद्र माना जाता है। लेकिन ग्योंगनाम का मामला बताता है कि सिर्फ राजधानी बनाम प्रांत का फ्रेम पर्याप्त नहीं है। प्रांत के भीतर भी कुछ शहर अपेक्षाकृत सुरक्षित हैं, जबकि अनेक इलाके आपात चिकित्सा के लिहाज से कमजोर माने जा रहे हैं।रिपोर्ट के अनुसार, ग्योंगनाम के 18 शहरों और काउंटियों में से 14 को आपात चिकित्सा के लिहाज से कमजोर क्षेत्र बताया गया है। केवल जिन्जू, चांगवोन, गिम्हे और यांगसान जैसे बड़े शहरी केंद्र इस सूची से बाहर हैं। सरल शब्दों में कहें तो प्रांत के अधिकांश हिस्से में रहने वाले लोगों के सामने यह आशंका बनी रहती है कि दुर्घटना, दिल का दौरा, स्ट्रोक या अन्य गंभीर आपात स्थिति में उन्हें उचित सुविधा समय पर न मिल पाए। यह ‘कम अस्पताल’ का मामला भर नहीं है; यह ‘जीवनरक्षक समय’ का मामला है।भारतीय संदर्भ में इसे समझें तो यह कुछ वैसा है जैसे किसी राज्य में केवल राजधानी, एक-दो औद्योगिक शहर और मेडिकल कॉलेज नगर अपेक्षाकृत सुरक्षित हों, जबकि बाकी जिलों के लोग एम्बुलेंस, विशेषज्ञ डॉक्टर, ट्रॉमा केयर और आईसीयू बेड की कमी से जूझते रहें। भारत के अनेक राज्यों में गंभीर मरीजों को जिला अस्पताल से मेडिकल कॉलेज, फिर वहाँ से राज्य की राजधानी रेफर किए जाने की पुरानी कहानी आज भी सुनाई देती है। ग्योंगनाम की बहस बताती है कि उन्नत अर्थव्यवस्था वाला दक्षिण कोरिया भी इस समस्या से मुक्त नहीं है।यहाँ एक और सांस्कृतिक और प्रशासनिक बात ध्यान देने योग्य है। कोरिया में स्वास्थ्य ढाँचा कागज पर काफी संगठित दिखाई देता है, लेकिन जब श्रमिक संगठन यह कहता है कि असमानता ‘गहराती’ जा रही है, तो उसका मतलब है कि संसाधन और विशेषज्ञता कुछ केंद्रों में सिमटते जा रहे हैं। ऐसी स्थिति में ग्रामीण या कम आबादी वाले इलाकों के निवासी महसूस करते हैं कि वे राष्ट्रीय समृद्धि का हिस्सा होते हुए भी सुरक्षा के मामले में दूसरे दर्जे के नागरिक बन गए हैं। यही भावना किसी भी लोकतंत्र में राजनीतिक असंतोष को जन्म देती है।सिर्फ अस्पताल नहीं, ‘पब्लिक हेल्थ’ की राजनीति समझना जरूरीग्योंगनाम में उठी मांगों को यदि सतही तौर पर पढ़ा जाए, तो वे कुछ निर्माण परियोजनाओं की सूची भर लग सकती हैं—पश्चिमी क्षेत्र के लिए मेडिकल सेंटर की स्थापना, मसान मेडिकल सेंटर के विस्तार को जल्द पूरा करना, और ग्योचांग तथा तोंगयोंग के रेड क्रॉस अस्पतालों के स्थानांतरण व पुनर्निर्माण पर इसी वर्ष फैसला लेना। लेकिन इन मांगों के भीतर दक्षिण कोरिया की सार्वजनिक स्वास्थ्य राजनीति का बड़ा प्रश्न छिपा है।कोरिया में ‘पब्लिक मेडिकल’ या सार्वजनिक स्वास्थ्य ढांचा लंबे समय से बहस का विषय रहा है। वहाँ निजी अस्पतालों की उपस्थिति मजबूत है, लेकिन निजी क्षेत्र अपने स्वभाव से उन इलाकों की ओर अधिक आकर्षित होता है जहाँ मरीजों की संख्या, भुगतान क्षमता और व्यावसायिक स्थिरता अधिक हो। ऐसे में कम आबादी वाले या आर्थिक रूप से अपेक्षाकृत कमजोर क्षेत्रों में सार्वजनिक अस्पतालों का महत्व बढ़ जाता है। भारत में भी यही स्थिति देखी जा सकती है—जहाँ निजी सुपरस्पेशियलिटी अस्पताल अक्सर बड़े शहरों में केंद्रित रहते हैं, जबकि दूरदराज क्षेत्रों में राज्य संचालित अस्पताल ही जीवनरेखा बनते हैं।ग्योंगनाम के मामले में जो मांगें सामने आई हैं, वे इस बात की स्वीकारोक्ति हैं कि अलग-अलग क्षेत्रों के लिए अलग उपाय चाहिए। कहीं नया संस्थान चाहिए, कहीं मौजूदा अस्पताल का विस्तार, और कहीं अस्पताल की भौगोलिक स्थिति ही ऐसी है कि उसे नए स्थान पर ले जाना अधिक तार्किक होगा। यह एक महत्वपूर्ण दृष्टिकोण है। अक्सर सरकारें स्वास्थ्य नीति को एक समान फार्मूले से चलाना चाहती हैं—एक ही योजना, एक ही मॉडल, एक ही घोषणा। लेकिन वास्तविकता यह है कि समुद्री तटीय क्षेत्र, पर्वतीय जिला, औद्योगिक शहर और बूढ़ी होती आबादी वाले कस्बे सबकी जरूरतें अलग होती हैं।दक्षिण कोरियाई समाज में ‘रेड क्रॉस अस्पताल’ का नाम भी प्रतीकात्मक महत्व रखता है। यह केवल एक इमारत नहीं, बल्कि आपदा, आपात चिकित्सा और सार्वजनिक सेवा की अवधारणा से जुड़ा संस्थान माना जाता है। भारतीय पाठकों के लिए इसे कुछ हद तक उन अस्पतालों से तुलना करके समझा जा सकता है जो सरकारी संरक्षण, मानवीय सेवा और क्षेत्रीय भरोसे के केंद्र होते हैं—यानी ऐसे संस्थान जिन्हें लोग ‘मुनाफे वाली चिकित्सा’ के बजाय ‘जरूरत के समय सहारे’ के रूप में देखते हैं।यहीं यह बहस व्यापक हो जाती है। सवाल यह नहीं कि चुनावी मंच से कितने अस्पतालों के नाम लिए गए। असली सवाल यह है कि क्या स्वास्थ्य को बाजार की सुविधा के बजाय सार्वजनिक अधिकार माना जाएगा? क्या सरकारें उन क्षेत्रों में भी निवेश करेंगी जहाँ लाभ कम है लेकिन नागरिकों की सुरक्षा की जरूरत सबसे अधिक है? कोरिया की यह बहस हमें यही बताती है कि आर्थिक विकास की चमक के बावजूद यदि सार्वजनिक स्वास्थ्य कमजोर पड़ता है, तो लोकतंत्र अंततः उसी बिंदु पर वापस लौटता है—राज्य आखिर किसके लिए है?क्यों चुनाव से पहले यह मुद्दा और ज्यादा भारी हो जाता हैकिसी भी लोकतांत्रिक समाज में चुनाव वह क्षण होता है जब बिखरी हुई सामाजिक असंतुष्टियाँ भाषा पाती हैं, रूप लेती हैं और मांग में बदल जाती हैं। ग्योंगनाम में स्वास्थ्य असमानता पर जोर इसी कारण अचानक अधिक निर्णायक दिखता है। कर्मचारी संगठन ने उम्मीदवारों से सीधा आग्रह किया है कि वे इन मांगों को आधिकारिक चुनावी वादों का हिस्सा बनाएं। यह रणनीति बहुत सोची-समझी है। चुनाव के पहले कही गई बात को बाद में प्रशासनिक जवाबदेही के मानक में बदला जा सकता है।भारतीय राजनीति में भी हम यह देखते हैं कि चुनाव के समय सड़क, बिजली, पानी, आरक्षण, किसान ऋणमाफी, महिला सुरक्षा या बेरोजगारी जैसे मुद्दे राजनीतिक रूप से तीखे हो जाते हैं। लेकिन स्वास्थ्य अक्सर या तो महामारी के समय केंद्र में आता है या फिर किसी बड़े हादसे के बाद। ग्योंगनाम का मामला इसलिए अलग महत्व रखता है कि यहाँ स्वास्थ्य ढाँचा चुनावी एजेंडे के रूप में व्यवस्थित ढंग से सामने लाया गया है। यह केवल भावनात्मक अपील नहीं, बल्कि बिंदुवार नीति मांग है।स्थानीय चुनाव कोरिया में क्षेत्रीय प्रशासन की प्राथमिकताएँ तय करने का अवसर होता है। उम्मीदवारों से यह अपेक्षा की जाती है कि वे केवल राष्ट्रीय दलों की लाइन न दोहराएँ, बल्कि स्थानीय जनता की दैनिक समस्याओं पर स्पष्ट रोडमैप दें। यदि किसी प्रांत में बड़ी संख्या में इलाके आपात चिकित्सा के लिहाज से कमजोर बताए जा रहे हों, तो यह स्वाभाविक है कि नागरिक पूछें—अगला बजट कहाँ जाएगा? नई सड़क पहले बनेगी या आपात चिकित्सा नेटवर्क? उद्योग निवेश को प्राथमिकता मिलेगी या सार्वजनिक अस्पतालों को?ग्योंगनाम की बहस में एक और पहलू दिलचस्प है। रिपोर्टों से संकेत मिलता है कि चुनावी मौसम में व्यापारिक संगठनों सहित अलग-अलग सामाजिक समूह भी उम्मीदवारों के सामने अपनी प्राथमिकताएँ रख रहे हैं। यानी यह केवल डॉक्टर बनाम सरकार का विवाद नहीं, बल्कि एक व्यापक चुनावी क्षण है जिसमें हर संगठित समूह अपनी मांग को वैध राजनीतिक मुद्दा बनाने की कोशिश कर रहा है। ऐसे वातावरण में स्वास्थ्य का मुद्दा अलग वजन इसलिए रखता है क्योंकि यह सीधे जीवन, मृत्यु, बुजुर्गों की देखभाल, मातृ स्वास्थ्य और आपदा प्रतिक्रिया से जुड़ा है।भारतीय पाठकों के लिए यह समझना जरूरी है कि कोरिया में ‘स्थानीय सरकार’ का दायरा केवल कूड़ा प्रबंधन या शहरी सफाई तक सीमित नहीं है। क्षेत्रीय अस्पताल नेटवर्क, सार्वजनिक संस्थानों की स्थापना और स्थानीय स्वास्थ्य ढांचे के विकास में प्रांतीय प्रशासन की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। इसलिए ग्योंगनाम में पूछा जा रहा सवाल बहुत स्पष्ट है—क्या उम्मीदवारों की ‘इच्छा’ है? नहीं। उससे भी आगे—क्या उनके पास स्वास्थ्य को शीर्ष प्राथमिकता बनाने का साहस है?भारत के लिए सबक: केरल, तमिलनाडु, बिहार और पूर्वोत्तर की यादग्योंगनाम की स्थिति को यदि भारतीय नजर से देखें, तो यह हमें अपने ही संघीय ढांचे का आईना दिखाती है। हमारे यहाँ स्वास्थ्य मूलतः राज्यों का विषय है, लेकिन संसाधन, विशेषज्ञता और बुनियादी ढांचे का असंतुलन बेहद गहरा है। एक तरफ केरल और तमिलनाडु जैसे राज्य हैं, जहाँ अपेक्षाकृत मजबूत सार्वजनिक स्वास्थ्य परंपरा विकसित हुई; दूसरी ओर ऐसे राज्य और जिले भी हैं जहाँ प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र तक नियमित चिकित्सक नहीं मिलते, जिला अस्पताल में विशेषज्ञों की भारी कमी रहती है और गंभीर मरीजों को सैकड़ों किलोमीटर दूर ले जाना पड़ता है।बिहार, झारखंड, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश के कई हिस्सों, राजस्थान के दूरदराज इलाकों, और पूर्वोत्तर के पर्वतीय क्षेत्रों में स्वास्थ्य पहुँच की समस्या केवल संस्थागत नहीं, भौगोलिक भी है। सड़क, दूरी, मौसम, एम्बुलेंस समय, डॉक्टरों की तैनाती और रेफरल व्यवस्था मिलकर तय करते हैं कि किसी नागरिक को समय पर इलाज मिलेगा या नहीं। ग्योंगनाम का मुद्दा हमें याद दिलाता है कि असमानता केवल गरीब देशों की समस्या नहीं; यह प्रशासनिक प्राथमिकता की समस्या है, और इसका समाधान राजनीतिक दबाव से ही निकलता है।भारत में कोविड-19 महामारी के दौरान ऑक्सीजन, बेड, आईसीयू और जिला स्तर की तैयारी को लेकर जो बहस उठी थी, उसने पहली बार बड़े पैमाने पर यह एहसास कराया कि स्वास्थ्य संरचना की कमजोरी सीधे राष्ट्रीय संकट बन सकती है। लेकिन महामारी का शोर कम होते ही अनेक जगहों पर वह तात्कालिकता भी कम हो गई। दक्षिण कोरिया के ग्योंगनाम में उठी बहस यह बताती है कि सार्वजनिक स्वास्थ्य को चुनावी स्मृति में बनाए रखना कितना जरूरी है। यदि नागरिक संगठन लगातार दबाव न बनाएं, तो विकास की प्राथमिकता अक्सर अस्पतालों से हटकर रियल एस्टेट, औद्योगिक परियोजनाओं और दृश्यात्मक निर्माण की ओर चली जाती है।यहाँ भारत के लिए दूसरा बड़ा सबक ‘आंतरिक असमानता’ का है। हम अक्सर केंद्र बनाम राज्य, या राज्य बनाम राज्य की तुलना करते हैं। लेकिन असली संकट कई बार राज्य के भीतर छिपा होता है—राजधानी बनाम सीमावर्ती जिला, मेडिकल कॉलेज शहर बनाम आदिवासी क्षेत्र, या औद्योगिक कॉरिडोर बनाम बाढ़-प्रभावित इलाका। ग्योंगनाम की तरह हमें भी अपने राज्यों के भीतर यह पूछना होगा कि कौन से जिले आपात चिकित्सा के लिहाज से सबसे कमजोर हैं, और क्या उनके लिए अलग रणनीति बनाई जा रही है।तीसरा सबक राजनीतिक भाषा का है। स्वास्थ्य को ‘कल्याणकारी वादा’ नहीं, बल्कि ‘सुरक्षा ढांचा’ कहना चाहिए। जिस तरह पुलिस, फायर ब्रिगेड, पुल और रेल नेटवर्क को राज्य की अनिवार्य जिम्मेदारी माना जाता है, उसी तरह ट्रॉमा केयर, प्रसूति सेवाएँ, आपात एम्बुलेंस नेटवर्क और क्षेत्रीय सार्वजनिक अस्पतालों को भी राज्य की बुनियादी जिम्मेदारी माना जाना चाहिए। ग्योंगनाम का विवाद इसी नई राजनीतिक भाषा की ओर इशारा करता है।आगे क्या देखना होगा: वादे, बजट और जवाबदेहीइस पूरे घटनाक्रम में अभी एक बात स्पष्ट है और एक अनिश्चित। स्पष्ट यह है कि स्वास्थ्य एवं चिकित्सा क्षेत्र के संगठनों ने सार्वजनिक मंच से ग्योंगनाम के चुनावी उम्मीदवारों पर दबाव बनाया है और कुछ ठोस मांगें सामने रखी हैं। अनिश्चित यह है कि उम्मीदवार इन मांगों को किस हद तक स्वीकार करेंगे, क्या उन्हें आधिकारिक घोषणापत्र का हिस्सा बनाएंगे, और अगर बनाएंगे तो किस समय-सीमा तथा किस वित्तीय ढांचे के साथ। चुनावी राजनीति में हर मुद्दा वादे तक तो पहुंच जाता है, लेकिन बहुत कम मुद्दे बजट, निविदा, निर्माण, भर्ती और संचालन तक पहुँच पाते हैं। असली परीक्षा वहीं होगी।ग्योंगनाम के मतदाताओं के लिए इस समय सबसे अहम सवाल यही होना चाहिए कि उम्मीदवार स्वास्थ्य असमानता पर कितनी सटीक बात करते हैं। क्या वे सिर्फ ‘स्वास्थ्य महत्वपूर्ण है’ जैसे सामान्य वाक्य बोलते हैं, या यह भी बताते हैं कि किस इलाके में किस संस्थान को किस क्रम में विकसित किया जाएगा? क्या वे डॉक्टरों, नर्सों और आपात चिकित्सा कर्मियों की नियुक्ति पर बात करते हैं? क्या वे सार्वजनिक अस्पतालों को घाटे के तर्क से नहीं, सामाजिक आवश्यकता के नजरिए से देखते हैं? क्या वे बुजुर्ग होती आबादी, ग्रामीण इलाकों की दूरी और तटीय क्षेत्रों की विशेष जरूरतों को समझते हैं?भारतीय लोकतंत्र के लिए भी यही कसौटी उपयोगी है। अस्पताल की इमारत की घोषणा आसान है, उसे डॉक्टरों, मशीनों, दवाओं, एम्बुलेंस और प्रशिक्षित मानव संसाधन के साथ टिकाऊ बनाना कठिन है। इसलिए ग्योंगनाम से आती यह खबर केवल कोरिया की स्थानीय राजनीति का फुटनोट नहीं, बल्कि पूरे एशिया के लोकतंत्रों के लिए चेतावनी है। यदि नागरिकों को उनके पते के आधार पर अलग-अलग दर्जे की स्वास्थ्य सुरक्षा मिलती है, तो विकास का दावा अधूरा है।दक्षिण कोरिया की लोकप्रिय संस्कृति ने दुनिया को यह दिखाया है कि आधुनिकता, दक्षता और सॉफ्ट पावर कैसे बनाई जाती है। लेकिन ग्योंगनाम का विवाद यह याद दिलाता है कि किसी समाज की असली परिपक्वता उसकी चमकदार राजधानी से नहीं, उसके दूरदराज नागरिक की सुरक्षा से मापी जाती है। जिस दिन किसी छोटे कस्बे का निवासी भी यह भरोसा कर सके कि आपातकाल में राज्य उसे नहीं छोड़ेगा, उसी दिन विकास का दावा ठोस कहलाएगा।अंततः ग्योंगनाम में उभरा यह मुद्दा केवल कोरिया की एक प्रांतीय खबर नहीं है। यह लोकतंत्र की उस बुनियादी कसौटी का प्रश्न है जहाँ जनता पूछती है—सरकार की प्राथमिकता आखिर कौन है? उद्योग, इमारतें और चुनावी नारे, या वह आम नागरिक जिसे दिल का दौरा पड़ने पर सबसे पहले एम्बुलेंस चाहिए। यही प्रश्न भारत में भी उतना ही प्रासंगिक है जितना दक्षिण कोरिया में। और शायद यही वजह है कि ग्योंगनाम की यह कहानी हमारे लिए भी दूर की नहीं, बहुत अपनी लगती है।

Source: Original Korean article - Trendy News Korea

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