
डेज़ॉन की खबर, लेकिन सवाल पूरी दुनिया के शहरों पर
दक्षिण कोरिया के मध्य हिस्से में स्थित डेज़ॉन शहर इन दिनों एक ऐसी बहस के केंद्र में है, जो केवल स्थानीय प्रशासनिक निर्णय तक सीमित नहीं है। मामला नदी प्रबंधन, बाढ़ रोकथाम, सार्वजनिक धन के उपयोग और शहरों की पर्यावरणीय समझ से जुड़ा है। डेज़ॉन के दो प्रमुख पर्यावरण संगठनों—डेज़ॉन एनवायरनमेंटल मूवमेंट यूनियन और डेज़ॉन-चुंगनम ग्रीन यूनियन—ने आरोप लगाया है कि शहर में जिन राष्ट्रीय नदियों के कुछ हिस्सों की हाल के दो वर्षों में ड्रेजिंग, यानी तल से गाद, मिट्टी और रेत हटाने का काम किया गया था, उन्हीं में से आठ हिस्सों में फिर से वही काम दोबारा किया जा रहा है। इन संगठनों का कहना है कि यह मॉडल टिकाऊ बाढ़-रोधी नीति नहीं, बल्कि एक दोहराव वाला महंगा प्रशासनिक तरीका बनता जा रहा है।
भारतीय पाठकों के लिए इसे समझना कठिन नहीं है। हमारे यहां भी मानसून शुरू होते ही नालों की सफाई, नदी तटों की खुदाई, जलनिकासी की मरम्मत और तटबंधों की मजबूती जैसे काम अक्सर तात्कालिक राहत के उपाय के रूप में सामने आते हैं। लेकिन जब वही काम हर साल, लगभग उन्हीं जगहों पर, भारी खर्च के साथ दोहराया जाता है, तो स्वाभाविक रूप से सवाल उठता है—क्या समस्या सचमुच हल हो रही है, या हम केवल लक्षणों का उपचार कर रहे हैं? डेज़ॉन में उठी यह आपत्ति इसी बुनियादी प्रश्न को सामने लाती है।
कोरिया में नदी और शहर का रिश्ता विशेष महत्व रखता है। वहां कई शहरों में नदी केवल जलधारा नहीं, बल्कि नागरिक जीवन, पैदल पथ, सार्वजनिक हरियाली, आवासीय सुरक्षा और शहरी सौंदर्य का हिस्सा होती है। डेज़ॉन भी ऐसा ही शहर है, जहां नदी-तंत्र और शहरी जीवन आपस में गहराई से जुड़े हुए हैं। इसलिए यह विवाद केवल तकनीकी ठेकेदारी का मामला नहीं, बल्कि इस बात का है कि आधुनिक शहर पानी के साथ कैसा रिश्ता बनाना चाहते हैं—पानी को सिर्फ निकाल देना है, या उसके साथ सह-अस्तित्व का अधिक बुद्धिमान ढांचा बनाना है।
यहां यह भी समझना जरूरी है कि दक्षिण कोरिया में नागरिक संगठन अक्सर स्थानीय प्रशासन की परियोजनाओं की निगरानी करते हैं और सार्वजनिक बयान जारी कर बहस को व्यापक समाज तक पहुंचाते हैं। भारतीय संदर्भ में इसे आप उन जनसंगठनों, नदी बचाओ अभियानों या शहरी पर्यावरण समूहों से जोड़कर देख सकते हैं, जो नगर निगम, विकास प्राधिकरण या राज्य सरकारों की परियोजनाओं पर डेटा और जमीनी अध्ययन के आधार पर सवाल उठाते हैं। डेज़ॉन का विवाद इसलिए अहम है क्योंकि यह तकनीकी फाइलों से निकलकर सार्वजनिक विमर्श में पहुंच चुका है।
आठ हिस्सों में दोबारा ड्रेजिंग: आखिर विवाद की जड़ क्या है
पर्यावरण संगठनों की आपत्ति का केंद्र बहुत सीधा है, और शायद इसी वजह से यह आम नागरिक तक आसानी से पहुंचता है। उनका कहना है कि हाल के दो वर्षों में जिन आठ नदी-खंडों में ड्रेजिंग की जा चुकी थी, उन्हीं जगहों पर फिर मशीनें लगाकर दोबारा वही प्रक्रिया शुरू कर दी गई। ड्रेजिंग को आम तौर पर बाढ़ रोकने की एक इंजीनियरिंग तकनीक के रूप में देखा जाता है। इसके तहत नदी तल में जमा गाद, मिट्टी, रेत या अवसाद हटाकर पानी के बहाव के लिए अधिक जगह बनाई जाती है। सिद्धांत यह है कि नदी का तल साफ होगा तो अतिरिक्त पानी तेजी से निकल सकेगा और बाढ़ का दबाव घटेगा।
लेकिन डेज़ॉन के पर्यावरण समूह इसी बिंदु पर सवाल उठा रहे हैं। अगर किसी क्षेत्र में दो साल पहले ही गाद हटाई गई थी, तो इतनी जल्दी फिर से वैसी ही स्थिति क्यों बनी? क्या इसका अर्थ यह है कि समस्या का स्रोत कहीं और है—जैसे ऊपरी बहाव क्षेत्र में भूमि उपयोग परिवर्तन, किनारों का अतिक्रमण, शहरी निर्माण, हरियाली में कमी, वर्षा जल के प्राकृतिक रिसाव में गिरावट, या नदी के पारिस्थितिक संतुलन में व्यवधान? यदि कारण संरचनात्मक हैं, तो बार-बार ड्रेजिंग करना वैसा ही है जैसे घर की दीवार में दरार छोड़कर हर वर्ष केवल पुताई कर देना।
कोरियाई समाचार सारांश में एक महत्वपूर्ण बिंदु यह है कि यह विवाद किसी एक अपवादात्मक स्थल तक सीमित नहीं बताया गया। आठ हिस्सों का उल्लेख इस बात को वजन देता है कि मामला अलग-थलग नहीं, बल्कि एक पैटर्न की तरह देखा जा रहा है। शहरी नीति में पैटर्न सबसे महत्वपूर्ण संकेतक होता है। जब समस्या एक स्थान पर दिखे तो उसे दुर्घटना या स्थानीय असमानता कहा जा सकता है; लेकिन जब कई जगह एक जैसा दोहराव दिखे तो यह नीति-निर्माण की दिशा पर प्रश्नचिह्न बन जाता है।
भारतीय संदर्भ लें तो दिल्ली में यमुना बाढ़क्षेत्र, मुंबई की मीठी नदी, चेन्नई की अड्यार और कूम, बेंगलुरु की झीलों से जुड़े जलनिकासी मार्ग, हैदराबाद के नाले, पटना और गुवाहाटी के शहरी जलभराव क्षेत्र—हर जगह एक समान बहस समय-समय पर उठती है। क्या गाद हटाना पर्याप्त है? क्या बरसाती पानी के लिए शहर में पर्याप्त खुली जमीन बची है? क्या नदी को हमने केवल नहर या ड्रेन की तरह देखना शुरू कर दिया है? डेज़ॉन की बहस भारतीय शहरों के लिए भी परिचित लगती है, क्योंकि हमारी अपनी जल-समस्याएं भी अक्सर इसी दोहराव से ग्रस्त रहती हैं।
63 करोड़ वॉन नहीं, बल्कि सार्वजनिक धन पर भरोसे की कसौटी
पर्यावरण संगठनों ने यह भी दावा किया है कि उन्हीं नदी-खंडों की दोबारा ड्रेजिंग पर 63 करोड़ वॉन खर्च किए गए। भारतीय मुद्रा में सटीक तुलनात्मक राशि विनिमय दर के आधार पर बदल सकती है, लेकिन मुद्दा रुपयों या वॉन की गणना से बड़ा है। मूल प्रश्न यह है कि बाढ़-नियंत्रण के नाम पर खर्च किया गया धन क्या वास्तव में जोखिम कम कर रहा है, या वह ऐसी परियोजनाओं में जा रहा है जिनका असर बहुत अल्पकालिक है। किसी भी लोकतंत्र में करदाताओं के पैसे का उपयोग केवल प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि नैतिक और राजनीतिक जवाबदेही का प्रश्न भी होता है।
कई बार सरकारें यह कह सकती हैं कि नदी की प्रकृति बदलती रहती है, अवसाद फिर जमा होता है, इसलिए समय-समय पर दोबारा ड्रेजिंग आवश्यक हो सकती है। यह तर्क पूरी तरह असंगत नहीं है। नदियां जीवित प्रणालियां हैं, स्थिर नालियां नहीं। वे मिट्टी लाती हैं, फैलती-सिकुड़ती हैं, मार्ग बदलती हैं, बरसात और सूखे के बीच अपना व्यवहार बदलती हैं। पर ठीक इसी कारण यह भी पूछा जाता है कि क्या नीति केवल प्रतिक्रिया-आधारित होनी चाहिए? अगर हर कुछ समय बाद वही खर्च दोहराना पड़े, तो क्या यह दीर्घकालिक रणनीति की कमी नहीं दिखाता?
भारत में भी यही बहस अक्सर सुनाई देती है। मानसून से पहले नाला सफाई पर करोड़ों रुपये, बाढ़ के बाद मरम्मत पर अलग बजट, फिर अगले वर्ष वही क्षेत्र जलमग्न। स्थानीय नागरिक पूछते हैं कि यदि हर साल एक ही काम दोहराया जा रहा है, तो स्थायी सुधार कहां है? डेज़ॉन की घटना इसी जनभावना को कोरियाई संदर्भ में सामने लाती है। पर्यावरण समूहों का दावा है कि या तो पहले की ड्रेजिंग बाढ़-रोकथाम में प्रभावी नहीं रही, या फिर प्रशासन को यह मान लेना चाहिए कि उसे लगभग हर वर्ष इसी तरह भारी खर्च के साथ नदी तल की खुदाई करनी पड़ेगी। दोनों ही स्थितियां नीति की दक्षता पर सवाल उठाती हैं।
यहां एक और पहलू महत्वपूर्ण है—सार्वजनिक कामों की दृश्यता। बड़ी मशीनें, नदी किनारे गतिविधि, मलबा हटना, निर्माण-स्थल जैसा माहौल—ये सब नागरिकों को यह संकेत देते हैं कि सरकार काम कर रही है। लेकिन आधुनिक शहरी प्रशासन में दृश्यता और प्रभाव, दोनों एक ही चीज नहीं होते। जो काम आंखों को सबसे अधिक दिखाई दे, वह जरूरी नहीं कि सबसे बेहतर परिणाम दे। इसके उलट, जलग्रहण क्षेत्र का पुनर्जीवन, हरित पट्टियां, वर्षाजल का स्थानीय अवशोषण, बाढ़भूमि की बहाली और निर्माण नियंत्रण जैसे उपाय कम दिखते हैं, लेकिन कई बार उनका असर अधिक गहरा और टिकाऊ होता है। डेज़ॉन की बहस इस अंतर को उजागर करती है।
‘प्रकृति-आधारित समाधान’ क्या होते हैं, और कोरिया में इसकी मांग क्यों उठी
पर्यावरण संगठनों ने प्रशासन से ‘नेचर-बेस्ड प्रिवेंशन मेजर्स’, यानी प्रकृति-आधारित रोकथाम उपाय अपनाने की मांग की है। भारतीय पाठकों के लिए यह शब्द नया लग सकता है, इसलिए इसे सरल भाषा में समझना जरूरी है। इसका मतलब है—बाढ़ से निपटने के लिए केवल कंक्रीट, खुदाई, तटबंध और चैनलाइजेशन पर निर्भर न रहकर, प्राकृतिक प्रणालियों की क्षमता को भी नीति का हिस्सा बनाना। जैसे नदी को सांस लेने की जगह देना, बाढ़क्षेत्र को पूरी तरह पाटकर निर्माण न करना, नदी किनारों पर हरियाली और दलदली क्षेत्रों को बचाना, वर्षाजल को स्थानीय स्तर पर जमीन में रिसने देना, और पूरे जलग्रहण क्षेत्र को एक इकाई की तरह देखना।
दक्षिण कोरिया जैसे अत्यधिक शहरीकृत और तकनीकी रूप से उन्नत देश में भी अब यह समझ मजबूत हो रही है कि केवल इंजीनियरिंग ढांचे से हर समस्या का स्थायी समाधान नहीं निकलता। खासकर जलवायु परिवर्तन के दौर में वर्षा का पैटर्न अधिक अनिश्चित और तीव्र होता जा रहा है। कभी बहुत कम बारिश, तो कभी बहुत कम समय में अत्यधिक बारिश। ऐसे में नदियों को पूरी तरह नियंत्रित करने का पुराना विचार कई जगह सीमित साबित हो रहा है। यही वजह है कि दुनिया के अनेक शहर ‘स्पंज सिटी’, ‘रिवर रिस्टोरेशन’, ‘ग्रीन इंफ्रास्ट्रक्चर’ और ‘ब्लू-ग्रीन प्लानिंग’ जैसी अवधारणाओं की ओर देख रहे हैं।
भारतीय शहरों में भी यह विचार धीरे-धीरे प्रवेश कर रहा है, हालांकि व्यवहार में अभी लंबा रास्ता तय करना है। चेन्नई में बाढ़ के बाद जलनिकासी और झील नेटवर्क पर चर्चा, बेंगलुरु में झीलों के आपसी संपर्क की बहस, दिल्ली में बाढ़क्षेत्रों की भूमिका, कोच्चि और श्रीनगर जैसे जल-आधारित शहरों में प्राकृतिक जलनिकासी की आवश्यकता—ये सभी उदाहरण बताते हैं कि पानी को केवल ‘निकालने’ की वस्तु नहीं समझा जा सकता। हमें उसे ‘संभालने’, ‘सोखने’, ‘फैलने देने’ और ‘संतुलित करने’ की सोच विकसित करनी होगी।
डेज़ॉन के संगठनों ने किसी विशिष्ट परियोजना का विस्तृत खाका सार्वजनिक सारांश में नहीं दिया, लेकिन उनकी मांग का अर्थ स्पष्ट है: बाढ़ नीति को सिर्फ तलछट हटाने की पुनरावृत्ति तक सीमित नहीं रखा जा सकता। यह मांग शहरी सभ्यता के एक बड़े परिवर्तन का संकेत देती है। बीते दशकों में अनेक देशों ने नदी को सीधा, बांधा हुआ और नियंत्रित ढांचा बनाने की कोशिश की; अब सवाल यह है कि क्या हमें कुछ जगह फिर से नदी को नदी रहने देना होगा।
कोरियाई शहरों में नदी का अर्थ: सिर्फ जलधारा नहीं, नागरिक जीवन का हिस्सा
भारतीय दर्शकों के लिए दक्षिण कोरिया की चर्चा अक्सर के-पॉप, के-ड्रामा, ब्यूटी इंडस्ट्री और हाई-टेक शहरी जीवन तक सीमित रह जाती है। लेकिन कोरिया के आधुनिक शहरों की एक महत्वपूर्ण पहचान उनके सुव्यवस्थित सार्वजनिक स्थान भी हैं—नदी किनारे बने वॉकवे, साइकिल ट्रैक, विश्राम स्थल, मौसमी पेड़-पौधे और परिवारों के लिए खुले क्षेत्र। सियोल की चेओंग्ग्येचॉन धारा का पुनर्जीवन इसका सबसे प्रसिद्ध उदाहरण माना जाता है, जहां एक समय ढंके हुए शहरी ढांचे को हटाकर जलधारा और सार्वजनिक स्थान का नया रूप दिया गया। यही वजह है कि कोरिया में नदी प्रबंधन को केवल सिंचाई या निकासी के तकनीकी मामले के रूप में नहीं देखा जाता।
डेज़ॉन भी ऐसा शहर है जहां नदी नागरिक जीवन के अनुभव से जुड़ती है। जब किसी नदी पर ड्रेजिंग होती है, तो उसका असर केवल जलप्रवाह तक सीमित नहीं रहता। स्थानीय पारिस्थितिकी, पक्षी जीवन, किनारों की वनस्पति, पैदल चलने के अनुभव, दृश्य सौंदर्य और आसपास के निवासियों की धारणा—सब प्रभावित होते हैं। अगर प्रशासन एक नदी को केवल बाढ़ निकालने की सुरंग की तरह संभाले, तो नागरिक समूहों के लिए यह चिंता का विषय बनना स्वाभाविक है।
भारत में भी नदियों के सामाजिक अर्थ को हमने लंबे समय तक समझा है, लेकिन आधुनिक शहरीकरण ने कई जगह इस रिश्ते को तोड़ा है। बनारस, प्रयागराज, हरिद्वार या उज्जैन जैसे शहरों में नदी सांस्कृतिक और धार्मिक जीवन का केंद्र है, जबकि दिल्ली, मुंबई, अहमदाबाद, पुणे या लखनऊ जैसे शहरों में नदी अब शहरी अवसंरचना, अतिक्रमण, प्रदूषण और रियल एस्टेट दबाव के बीच संघर्ष का क्षेत्र बन चुकी है। कोरिया का फर्क यह है कि वहां नगर नियोजन में सार्वजनिक उपयोग और पर्यावरणीय पुनर्रचना को कई बार गंभीरता से शामिल किया गया। इसलिए डेज़ॉन की बहस केवल पर्यावरण कार्यकर्ताओं की आवाज नहीं, बल्कि शहरी जीवन की गुणवत्ता से जुड़ी बहस भी है।
इसका सांस्कृतिक पहलू भी समझना चाहिए। दक्षिण कोरिया में स्थानीय नागरिक समूहों, विशेषज्ञों और प्रशासन के बीच नीति पर सार्वजनिक बयानबाजी और बहस की परंपरा मौजूद है। यह लोकतांत्रिक सार्वजनिक जीवन का हिस्सा है। भारत में भी जनसुनवाई, पर्यावरण मंजूरी, नागरिक याचिकाएं और अदालतों की सक्रियता इस प्रक्रिया को आकार देती हैं, पर अक्सर हमारे यहां बहस तब तेज होती है जब नुकसान बहुत स्पष्ट हो चुका होता है। डेज़ॉन की घटना इस लिहाज से शुरुआती चेतावनी जैसी है—शहर यह तय करे कि वह नदी को बार-बार ‘साफ’ करने की वस्तु मानेगा या दीर्घकालिक साझेदारी वाली पारिस्थितिकी।
भारत के लिए सबक: मानसून, शहरीकरण और दोहराव वाली परियोजनाओं की चुनौती
डेज़ॉन की कहानी भारतीय शहरों के लिए खास महत्व रखती है क्योंकि हम जलवायु जोखिम, अनियोजित शहरी विस्तार और बुनियादी ढांचे पर बढ़ते दबाव के बीच खड़े हैं। हमारे शहरों में अक्सर वर्षाजल निकासी को योजनाबद्ध शहरी डिजाइन के बजाय संकट-प्रबंधन की तरह संभाला जाता है। नतीजा यह होता है कि तेज बारिश आते ही सड़कें डूबती हैं, नाले उफनते हैं, झीलें कचरे से भरती हैं और निचले इलाके जलमग्न हो जाते हैं। इसके बाद सफाई और मरम्मत का चक्र शुरू होता है। मगर अगले सीजन में समस्या फिर लौट आती है। डेज़ॉन का मामला हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि क्या हमारी संस्थाएं भी कहीं इसी प्रकार के दोहराव वाली व्यवस्था में फंसती जा रही हैं।
उदाहरण के तौर पर मुंबई में हर मानसून के दौरान जलनिकासी, समुद्री ज्वार और शहरी निर्माण के संबंध पर चर्चा होती है। दिल्ली में यमुना और नालों का सवाल केवल बाढ़ का नहीं, बल्कि बाढ़भूमि, अतिक्रमण, सीवेज और शहरी नियोजन का भी है। बेंगलुरु में झीलों और स्टॉर्म वाटर ड्रेनों के बीच टूटे संबंध ने बाढ़ की समस्या को गहरा किया है। गुरुग्राम, नोएडा, हैदराबाद, गुवाहाटी और चेन्नई जैसे शहरों में भी यह समस्या अलग नामों से मौजूद है। डेज़ॉन की बहस हमें बताती है कि नदी या नाले की सफाई जरूरी हो सकती है, लेकिन उसे पूरी रणनीति मान लेना खतरनाक सरलता है।
भारत के नीति-निर्माताओं के लिए एक बड़ा सबक यह है कि बाढ़-रोधी योजना को केवल लोक निर्माण विभाग या नगर निगम की नियमित गतिविधि समझकर नहीं छोड़ा जा सकता। इसके लिए भूमि उपयोग योजना, झीलों और आर्द्रभूमियों की सुरक्षा, निर्माण मानदंड, जलनिकासी नक्शा, वर्षाजल संचयन, शहरी वन, और नागरिक भागीदारी को एक साथ जोड़ना होगा। दूसरे शब्दों में, जल प्रबंधन को विभागीय फाइल नहीं, शहरी दर्शन बनाना होगा। डेज़ॉन के पर्यावरण समूहों ने प्रशासन से मूलतः यही पूछा है—आपकी बाढ़ नीति की दार्शनिक बुनियाद क्या है?
यह सवाल भारत में भी उतना ही लागू होता है। क्या हम नदी को मृत ढांचे की तरह देखते हैं, जिसे जेसीबी से समय-समय पर ‘ठीक’ कर दिया जाएगा? या हम उसे जीवंत तंत्र मानते हैं, जिसे जगह, संतुलन और वैज्ञानिक समझ की जरूरत है? अगर उत्तर दूसरा है, तो हमें परियोजनाओं की सफलता मापने के तरीके भी बदलने होंगे। केवल यह नहीं कि कितनी मिट्टी हटाई गई, बल्कि यह भी कि कितनी बाढ़ टली, कितनी हरियाली बची, कितना भूजल रिचार्ज हुआ, कितनी जैव-विविधता संरक्षित रही, और कितने वर्षों तक दोबारा महंगा हस्तक्षेप नहीं करना पड़ा।
अब आगे क्या: पारदर्शिता, जवाबदेही और शहरों की जल-दृष्टि
डेज़ॉन की मौजूदा बहस का अगला चरण सबसे महत्वपूर्ण होगा। पर्यावरण समूहों ने आरोप लगाए हैं, आंकड़े रखे हैं और नीति परिवर्तन की मांग की है। अब प्रशासन से अपेक्षा होगी कि वह स्पष्ट रूप से बताए—कौन-से हिस्सों में दोबारा ड्रेजिंग क्यों की गई, पिछली ड्रेजिंग के परिणाम क्या रहे, बाढ़ जोखिम का मूल्यांकन किस आधार पर हुआ, और क्या कोई दीर्घकालिक प्रकृति-आधारित योजना भी विचाराधीन है। लोकतांत्रिक शासन में तकनीकी निर्णय केवल विशेषज्ञों की भाषा में बंद नहीं रह सकते; उन्हें नागरिकों की भाषा में भी समझाना पड़ता है।
इस पूरे प्रकरण का सबसे महत्वपूर्ण संदेश यही है कि शहरी जल-प्रबंधन अब केवल इंजीनियरिंग का विषय नहीं रहा। यह पर्यावरण, अर्थशास्त्र, नागरिक अधिकार, सार्वजनिक स्थान, जलवायु परिवर्तन और प्रशासनिक पारदर्शिता—सभी का संयुक्त प्रश्न है। डेज़ॉन की घटना में दोहराव शब्द सबसे ज्यादा चुभता है: एक ही जगह, फिर वही काम, फिर वही खर्च। यही शब्द आम नागरिक को सक्रिय करता है और वह पूछता है—क्या हमने सचमुच कुछ सीखा?
भारतीय शहरों में भी शायद अब यही सवाल अधिक जोर से पूछे जाने चाहिए। मानसून हर साल आएगा, नदियां हर साल बदलेंगी, और शहरों पर दबाव भी कम नहीं होगा। लेकिन क्या हमारे उपाय भी हर साल वही रहेंगे? डेज़ॉन की यह खबर हमें आगाह करती है कि समय रहते नीति का रुख बदलना जरूरी है। बाढ़-नियंत्रण को ठेका-आधारित आवर्ती काम से आगे बढ़ाकर पारिस्थितिक और सामाजिक रूप से समझदार शहरी योजना में बदलना होगा।
अंततः डेज़ॉन की कहानी केवल दक्षिण कोरिया की स्थानीय प्रशासनिक बहस नहीं है। यह 21वीं सदी के शहरों के सामने खड़े उस बड़े प्रश्न का हिस्सा है, जिसका सामना दिल्ली से सियोल, मुंबई से टोक्यो, चेन्नई से बुसान और बेंगलुरु से डेज़ॉन तक सभी को करना है—क्या हम सुरक्षित शहर और रहने योग्य शहर, दोनों एक साथ बना सकते हैं? यदि उत्तर हां है, तो बार-बार की खुदाई से आगे बढ़कर हमें पानी, नदी और शहर के रिश्ते को नए सिरे से समझना होगा।
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