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दक्षिण कोरिया के मिलयांग से उठी एक अहम सीख: बुज़ुर्गों की याददाश्त और मानसिक सुकून के लिए कला-आधारित देखभाल क्यों बन रही

क्यों महत्वपूर्ण है मिलयांग की यह पहलदक्षिण कोरिया के ग्योंगनाम प्रांत के मिलयांग शहर से आई एक हालिया पहल ने यह दिखाया है कि बुज़ुर्गों की सेहत पर बात अब केवल दवाइयों, जांचों और अस्पतालों तक सीमित नहीं रही। मिलयांग प्रशासन ने ‘माउम-चियू, बोमचरम’ नाम से एक कार्यक्रम शुरू करने की घोषणा की है, जिसका मोटे तौर पर अर्थ है—‘मन का उपचार, जैसे वसंत’। यह नाम ही अपने भीतर एक सामाजिक और सांस्कृतिक संदेश समेटे हुए है: वृद्धावस्था को केवल बीमारी, बोझ या निर्भरता के फ्रेम में नहीं, बल्कि पुनर्स्थापन, गरिमा और जीवन की लय लौटाने की प्रक्रिया के रूप में देखना। इस कार्यक्रम का लक्ष्य उन बुज़ुर्गों की मदद करना है जिनमें हल्की संज्ञानात्मक समस्या, यानी माइल्ड कॉग्निटिव इम्पेयरमेंट, के लक्षण मौजूद हैं। सरल शब्दों में कहें तो यह वह अवस्था है जब व्यक्ति की याददाश्त, ध्यान या सोचने-समझने की क्षमता में गिरावट के शुरुआती संकेत दिखाई देते हैं, लेकिन स्थिति अभी डिमेंशिया जैसी गंभीर अवस्था तक नहीं पहुंची होती।भारतीय पाठकों के लिए यह खबर इसलिए खास है क्योंकि हमारे यहां भी तेजी से बढ़ती उम्र वाली आबादी, अकेलापन, परिवारों का छोटा होना, और बुज़ुर्गों की मानसिक सेहत जैसे मुद्दे लगातार उभर रहे हैं। हम अक्सर ब्लड प्रेशर, शुगर, घुटनों के दर्द और हृदय रोग की बात करते हैं, लेकिन स्मृति, भावनात्मक स्थिरता और सामाजिक जुड़ाव को उतनी प्राथमिकता नहीं देते। मिलयांग की पहल हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि क्या स्वास्थ्य नीति का अगला बड़ा मोर्चा अस्पतालों के भीतर नहीं, बल्कि समुदाय, संस्कृति और रोजमर्रा के जीवन में तैयार हो रहा है। दक्षिण कोरिया जैसे तेज़ी से बूढ़े होते समाज में यह प्रयोग केवल स्थानीय प्रशासनिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि आने वाले समय की स्वास्थ्य राजनीति और सार्वजनिक नीति का संकेत भी है।यह भी ध्यान देने योग्य है कि इस कार्यक्रम को सिर्फ एक ‘सांस्कृतिक गतिविधि’ के रूप में पेश नहीं किया गया है। इसका स्पष्ट उद्देश्य संज्ञानात्मक कार्यक्षमता में सुधार और भावनात्मक स्थिरता को बढ़ावा देना है। यानी प्रशासन यह स्वीकार कर रहा है कि स्वास्थ्य केवल शरीर का मामला नहीं है; मन, स्मृति, संवाद, रचनात्मकता और सामुदायिक भागीदारी भी उतनी ही महत्वपूर्ण हैं। भारत में भी अगर हम वाराणसी, जयपुर, पुणे, कोच्चि, लखनऊ या भुवनेश्वर जैसे शहरों के वरिष्ठ नागरिक केंद्रों को देखें, तो वहां योग, भजन, हंसी क्लब और पार्क की सैर जैसी गतिविधियां तो दिखती हैं, लेकिन कला-आधारित संज्ञानात्मक देखभाल को अभी व्यवस्थित सार्वजनिक स्वास्थ्य मॉडल के रूप में नहीं अपनाया गया है। इस लिहाज से मिलयांग की खबर दूर से आई एक ऐसी दस्तक है, जिसे भारत को ध्यान से सुनना चाहिए।‘माइल्ड कॉग्निटिव इम्पेयरमेंट’ क्या है और यह भारत के लिए क्यों प्रासंगिक हैमाइल्ड कॉग्निटिव इम्पेयरमेंट, या हल्की संज्ञानात्मक हानि, ऐसी स्थिति है जिसमें व्यक्ति को नाम याद रखने, हाल की बातों को स्मरण रखने, ध्यान केंद्रित करने, कामों का क्रम संभालने या निर्णय लेने में पहले से अधिक कठिनाई महसूस हो सकती है। यह हर बार डिमेंशिया में नहीं बदलती, लेकिन इसे हल्के में लेना भी ठीक नहीं होता। यही वह चरण है जहां समय पर सहारा, प्रशिक्षण, सामाजिक सक्रियता और मानसिक-भावनात्मक सहयोग बहुत फर्क पैदा कर सकते हैं। कोरिया के मिलयांग ने अपने कार्यक्रम के लिए खास तौर पर इसी समूह को चुना है, और यही बात इस पहल को गंभीर बनाती है। प्रशासन बीमारी के फट पड़ने का इंतज़ार नहीं कर रहा, बल्कि उन संकेतों पर काम कर रहा है जो आगे चलकर बड़े संकट में बदल सकते हैं।भारत में परिवारों के भीतर अक्सर यह मान लिया जाता है कि बढ़ती उम्र के साथ भूलना स्वाभाविक है। कुछ हद तक यह सही भी है, लेकिन हर भूलने की आदत को ‘उम्र हो गई है’ कहकर टाल देना जोखिम भरा हो सकता है। कई बार परिवार यह भी समझ नहीं पाता कि दादा-दादी या माता-पिता की चिड़चिड़ाहट, उदासी, बार-बार एक ही सवाल पूछना, लोगों से कटना, या रोजमर्रा के छोटे कामों में भ्रम—दरअसल मानसिक और संज्ञानात्मक स्वास्थ्य के संकेत हो सकते हैं। भारत जैसे समाज में, जहां बुज़ुर्ग अक्सर परिवार के भावनात्मक केंद्र होते हैं, उनकी याददाश्त और मानसिक सुकून में आई गिरावट का असर केवल एक व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता; पूरा परिवार उसकी लहरों को महसूस करता है।यहां एक और महत्वपूर्ण सांस्कृतिक अंतर समझना होगा। दक्षिण कोरिया में स्थानीय सरकारें ऐसे कार्यक्रमों को संस्थागत रूप से चलाती हैं। वहां ‘डिमेंशिया सेफ्टी सेंटर’ जैसी व्यवस्थाएं हैं, जो समुदाय स्तर पर बुज़ुर्गों की संज्ञानात्मक सेहत के लिए काम करती हैं। भारत में इसके कुछ समकक्ष ढांचे विभिन्न रूपों में मौजूद हैं—जैसे जिला अस्पताल, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, आयुष्मान आरोग्य मंदिर, वरिष्ठ नागरिक कल्याण समूह, डे-केयर केंद्र, एनजीओ आधारित वृद्ध देखभाल संस्थाएं—लेकिन इन सबको जोड़कर एक ठोस ‘संज्ञानात्मक और भावनात्मक स्वास्थ्य’ नीति में बदलना अभी बाकी है। मिलयांग की खबर हमें बताती है कि शुरुआती स्तर पर हस्तक्षेप करना सिर्फ चिकित्सकीय बुद्धिमत्ता नहीं, आर्थिक और सामाजिक दृष्टि से भी समझदारी है। क्योंकि जब गिरावट बढ़ जाती है, तब देखभाल का बोझ परिवार, व्यवस्था और स्वास्थ्य तंत्र—तीनों पर कई गुना बढ़ जाता है।भारतीय संदर्भ में इसे ऐसे समझा जा सकता है जैसे मधुमेह में प्री-डायबिटीज का चरण। अगर उस समय आहार, गतिविधि और निगरानी पर काम किया जाए, तो आगे की मुश्किलें कम हो सकती हैं। उसी तरह, संज्ञानात्मक गिरावट के शुरुआती चरण में कला, संवाद, समूह सहभागिता और संवेदनात्मक गतिविधियों पर आधारित कार्यक्रम एक सुरक्षात्मक दीवार का काम कर सकते हैं। यह इलाज का विकल्प नहीं, बल्कि जीवन की कार्यक्षमता को बचाए रखने का एक सार्थक सहारा हो सकता है।कला को उपचार के उपकरण की तरह क्यों देखा जा रहा हैमिलयांग के कार्यक्रम की सबसे दिलचस्प बात यह है कि इसमें मुख्य उपकरण के तौर पर चित्रकला और नृत्य को चुना गया है। पहली नज़र में यह किसी सांस्कृतिक शिविर जैसा लग सकता है, लेकिन असल में यह चुनाव काफी व्यावहारिक है। बुज़ुर्गों के साथ काम करते समय सबसे बड़ी चुनौतियों में एक होती है—भागीदारी। केवल लेक्चर, सलाह या लिखित सामग्री पर आधारित सत्र अक्सर उबाऊ, औपचारिक और सीमित प्रभाव वाले हो सकते हैं। इसके विपरीत, कला व्यक्ति को सक्रिय भागीदार बनाती है। वह केवल सुनता नहीं, करता है; केवल याद नहीं करता, अनुभव करता है; केवल निर्देश नहीं मानता, अपने भीतर से कुछ व्यक्त भी करता है।चित्रकला में हाथों की गतिविधि, रंगों की पहचान, आकारों की रचना, दृश्य स्मृति, और अपनी पसंद या अनुभव को अभिव्यक्त करने का अवसर शामिल होता है। यह प्रक्रिया सूक्ष्म मोटर कौशल के साथ-साथ मानसिक सक्रियता को भी छूती है। नृत्य या शरीर-आधारित गतिविधियां लय, संतुलन, शारीरिक जागरूकता, प्रतिक्रिया, तालमेल और सामाजिक समन्वय को बढ़ा सकती हैं। खास बात यह है कि नृत्य का अर्थ यहां केवल मंचीय प्रदर्शन नहीं है। कोरिया में ऐसे कार्यक्रमों में अक्सर शरीर को सहज ढंग से हिलाना, संगीत पर सरल गतियां करना, समूह में ताल पकड़ना और भावनाओं को मूवमेंट के जरिए प्रकट करना शामिल होता है। भारतीय पाठकों के लिए इसे गरबा की शुरुआती गोल चालों, हल्की लोकधुन पर सामूहिक गतियों, या वरिष्ठ नागरिक समूहों में किए जाने वाले संगीत-आधारित व्यायाम की तरह समझा जा सकता है।हमारे यहां भी संगीत और कला का संबंध उपचार से नया नहीं है। भक्ति संगीत, कथक की भावाभिव्यक्ति, लोकगीतों की सामूहिकता, रंगोली, मंडला, बुनाई, मिट्टी के काम, और यहां तक कि पूजा की तैयारी तक—इन सबमें मानसिक एकाग्रता, हाथों का उपयोग, भावनात्मक शांति और सामाजिक जुड़ाव के तत्व मौजूद हैं। लेकिन अंतर यह है कि मिलयांग जैसी पहल इन सांस्कृतिक क्रियाओं को स्वास्थ्य नीति के लक्ष्य से जोड़ रही है। यानी कला अब केवल मनोरंजन या ‘टाइमपास’ नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य संसाधन की तरह सामने आ रही है। यही बदलाव महत्वपूर्ण है।आज की दुनिया में जहां मानसिक स्वास्थ्य पर बातचीत बढ़ी है, वहां बुज़ुर्गों के लिए कला-आधारित हस्तक्षेप एक संवेदनशील विकल्प बनते जा रहे हैं। बहुत से बुज़ुर्ग अपनी भावनाओं को शब्दों में नहीं कह पाते। वे यह भी नहीं मानते कि उन्हें ‘थेरेपी’ की जरूरत है। लेकिन वही व्यक्ति रंगों, संगीत, यादों या शरीर की सरल गतियों के माध्यम से धीरे-धीरे खुल सकता है। इस दृष्टि से कला किसी पर ‘इलाज’ थोपती नहीं, बल्कि उसे सहभागिता के जरिए भीतर से जोड़ती है। यही कारण है कि मिलयांग की पहल को नरम भाषा में पेश किए जाने के बावजूद इसे हल्के में नहीं लेना चाहिए। यह सार्वजनिक स्वास्थ्य में गहरे बदलाव की निशानी है।मिलयांग के डिमेंशिया सुरक्षा केंद्र की भूमिका क्या बताती हैइस कार्यक्रम का एक बेहद अहम पहलू यह है कि इसे मिलयांग शहर का डिमेंशिया सुरक्षा केंद्र, यानी स्थानीय स्तर पर संज्ञानात्मक स्वास्थ्य देखभाल करने वाला संस्थान, भागीदार के रूप में चला रहा है। दक्षिण कोरिया में ऐसे केंद्र स्थानीय प्रशासन और समुदाय के बीच पुल का काम करते हैं। वे केवल रोग की पहचान तक सीमित नहीं रहते, बल्कि परामर्श, निगरानी, परिवारों को जानकारी, सामुदायिक कार्यक्रम और शुरुआती हस्तक्षेप जैसी भूमिकाएं भी निभाते हैं। इस मॉडल की खासियत यह है कि नीति कागज से उठकर सीधे लोगों के बीच पहुंचती है।भारत में अक्सर अच्छी नीतियां बनने के बावजूद उनकी सबसे बड़ी समस्या क्रियान्वयन होती है। कौन लोगों तक पहुंचेगा? कौन नियमित उपस्थिति सुनिश्चित करेगा? कौन फॉलो-अप करेगा? कौन बुज़ुर्गों को सहज महसूस कराएगा? और कौन यह देखेगा कि कार्यक्रम सिर्फ तस्वीरों तक सीमित न रह जाए? मिलयांग मॉडल का उत्तर है—स्थानीय संस्थागत ढांचा और पेशेवर साझेदारी। वहां डिमेंशिया सुरक्षा केंद्र लाभार्थियों तक पहुंच का माध्यम है, जबकि पेशेवर कला-उपचार समूह कार्यक्रम की सामग्री और संचालन का विशेषज्ञ पक्ष संभालता है। यानी एक ओर स्वास्थ्य तंत्र की स्थानीय पहुंच है, दूसरी ओर सांस्कृतिक-चिकित्सकीय विशेषज्ञता।भारतीय कस्बों और शहरों में भी ऐसा ढांचा तैयार किया जा सकता है, बशर्ते विभिन्न विभाग मिलकर काम करें। उदाहरण के लिए, स्वास्थ्य विभाग, सामाजिक न्याय विभाग, स्थानीय निकाय, संस्कृति विभाग, और विश्वसनीय गैर-सरकारी संस्थाएं मिलकर वरिष्ठ नागरिकों के लिए कला-आधारित संज्ञानात्मक गतिविधियों का नेटवर्क बना सकती हैं। आंगनवाड़ी या स्कूल भवनों की तरह दिन के कुछ घंटों के लिए सामुदायिक स्थानों का उपयोग, प्रशिक्षित फसिलिटेटरों की नियुक्ति, और परिवारों के लिए मार्गदर्शन—ये सब किसी असंभव कल्पना का हिस्सा नहीं हैं।कार्यक्रम के नाम पर भी ध्यान देना चाहिए—‘मन का उपचार, जैसे वसंत’। नीति की भाषा यहां आदेशात्मक नहीं, सहायक है। इसमें बीमारी की कठोरता नहीं, पुनर्जागरण की अनुभूति है। भारतीय भाषाओं में भी ऐसी संवेदनशील शब्दावली की जरूरत है। यदि हम हर कार्यक्रम को केवल ‘रोग नियंत्रण’ या ‘जोखिम प्रबंधन’ की भाषा में पैक करेंगे, तो कई परिवार और बुज़ुर्ग उससे भावनात्मक रूप से जुड़ नहीं पाएंगे। लेकिन यदि कार्यक्रम गरिमा, सुकून, यादों, साथ और सक्रियता की भाषा में सामने आएं, तो भागीदारी का स्वरूप बदल सकता है।जब संस्कृति और स्वास्थ्य एक साथ आते हैंमिलयांग की यह पहल दक्षिण कोरिया के संस्कृति, खेल और पर्यटन मंत्रालय तथा कोरियन आर्ट्स एंड कल्चर एजुकेशन सर्विस जैसे संस्थागत समर्थन ढांचे के अंतर्गत चल रहे व्यापक कला-आधारित उपचार सहायता कार्यक्रमों का हिस्सा है। इसका अर्थ यह है कि वहां स्वास्थ्य की चुनौती का उत्तर केवल स्वास्थ्य मंत्रालय से नहीं खोजा जा रहा, बल्कि संस्कृति प्रशासन भी उसमें भागीदार है। यह दृष्टिकोण बेहद आधुनिक और व्यापक है। इसका सार यह है कि यदि समस्या इंसान के जीवन की गुणवत्ता से जुड़ी है, तो समाधान भी जीवन के अनेक आयामों से निकलेंगे—कला, समुदाय, दिनचर्या, संबंध, अभिव्यक्ति और भागीदारी से।भारत में हम लंबे समय से यह मानते आए हैं कि संस्कृति समाज को जोड़ती है। त्यौहार, कीर्तन, रामलीला, कव्वाली, लोकनृत्य, भजन मंडली, कथा, चौपाल, मंदिर या गुरुद्वारे का सामुदायिक स्पेस—ये सब केवल धार्मिक या सांस्कृतिक आयोजन नहीं, सामाजिक मानसिक स्वास्थ्य के अनौपचारिक आधार भी हैं। लेकिन जैसे-जैसे शहरीकरण बढ़ा है, परिवार छोटे हुए हैं, और रोजमर्रा का जीवन अधिक अकेला व तेज़ हुआ है, वैसे-वैसे ये सामुदायिक आधार कमजोर पड़ते गए हैं। ऐसे में अगर स्वास्थ्य नीति संस्कृति को एक उपचार संसाधन की तरह फिर से व्यवस्थित रूप में अपनाती है, तो यह केवल ‘सॉफ्ट’ पहल नहीं होगी; यह सामाजिक टूटन के बीच एक व्यावहारिक उत्तर भी साबित हो सकती है।यहां एक और बात समझनी चाहिए। जब बुज़ुर्ग व्यक्ति अस्पताल जाता है, तो उसकी पहचान प्रायः एक मरीज की तरह होती है। लेकिन जब वही व्यक्ति किसी कला-आधारित समूह में शामिल होता है, तो वह प्रतिभागी, रचनाकार, साथी या स्मृतियों का वाहक बन जाता है। यह पहचान का बदलाव बहुत महत्वपूर्ण है। बीमारी व्यक्ति को सीमित करती है; कला उसे फिर से व्यक्ति बनाती है। सार्वजनिक स्वास्थ्य नीति अगर इस फर्क को समझ ले, तो वह उपचार को अधिक मानवीय बना सकती है।मिलयांग का प्रयोग उसी दिशा का उदाहरण है। यह बताता है कि स्वास्थ्य को केवल जैविक संकेतकों—जैसे शुगर, बीपी, कोलेस्ट्रॉल—तक सीमित नहीं किया जा सकता। एक बुज़ुर्ग की दिनचर्या, आत्मविश्वास, दूसरों से जुड़ाव, अपनी उपयोगिता का एहसास, और किसी गतिविधि में संलग्न होने की इच्छा—ये सब भी स्वास्थ्य के मानक हैं। भारत के लिए यह सोच इसलिए भी प्रासंगिक है क्योंकि यहां 60 वर्ष से ऊपर की आबादी निरंतर बढ़ रही है और आने वाले दशकों में यह एक बड़ा सामाजिक-आर्थिक प्रश्न बनेगी।परिवार, समुदाय और भारतीय समाज के लिए क्या सबक हैंमिलयांग की पहल का सबसे बड़ा संदेश यह है कि बुज़ुर्गों की देखभाल को केवल परिवार के कंधों पर डाल देना पर्याप्त नहीं है। भारत में संयुक्त परिवारों के कमजोर पड़ने, महानगरों की दूरियों, कामकाजी दंपतियों की बढ़ती संख्या, और प्रवासन के कारण लाखों बुज़ुर्ग दिन का बड़ा हिस्सा अकेले बिताते हैं। कई बार बच्चे आर्थिक रूप से सक्षम होते हुए भी समय नहीं दे पाते। कई बार भावनात्मक दूरी भी वास्तविक समस्या बन जाती है। ऐसे में यदि राज्य, स्थानीय निकाय और समुदाय इस जिम्मेदारी में हिस्सेदार बनते हैं, तो इससे परिवार का बोझ कम होता है और बुज़ुर्गों की गरिमा भी बची रहती है।भारतीय समाज में मानसिक स्वास्थ्य को लेकर अब भी झिझक है। बुज़ुर्गों के मामले में यह झिझक और बढ़ जाती है। परिवार अक्सर सोचता है कि कहीं ‘दिमागी बीमारी’ का ठप्पा न लग जाए। इसी कारण कई शुरुआती लक्षण पहचान में आने के बावजूद विशेषज्ञ सलाह लेने में देर हो जाती है। कला-आधारित कार्यक्रम इस झिझक को कम कर सकते हैं, क्योंकि वे क्लिनिकल माहौल की बजाय सामुदायिक और रचनात्मक वातावरण देते हैं। वहां व्यक्ति ‘मरीज’ बनकर नहीं, बल्कि सक्रिय सदस्य बनकर पहुंचता है। भारतीय शहरों में वरिष्ठ नागरिक क्लब, आरडब्ल्यूए, मंदिर सभागार, नगर निगम समुदाय केंद्र, पुस्तकालय, पार्कों के वरिष्ठ मंडल—ये सब ऐसे कार्यक्रमों के लिए उपयोगी स्थान बन सकते हैं।परिवारों के लिए भी यहां एक व्यावहारिक सीख है। बुज़ुर्ग माता-पिता या दादा-दादी के लिए केवल दवा समय पर देना ही पर्याप्त देखभाल नहीं है। यह भी उतना ही ज़रूरी है कि उनका दिन अर्थपूर्ण कैसे बने। क्या वे किसी समूह का हिस्सा हैं? क्या वे संगीत सुनते हैं? क्या वे पुरानी यादों पर बात करते हैं? क्या वे कुछ बनाते, लिखते, रंगते, गुनगुनाते या चलते-फिरते हैं? क्या उन्हें यह महसूस होता है कि वे अब भी परिवार और समाज में भूमिका रखते हैं? इन सवालों का जवाब अक्सर उनकी मानसिक सेहत तय करता है।यदि भारत में इस मॉडल से प्रेरणा लेनी हो, तो इसकी नकल ज्यों की त्यों नहीं, बल्कि स्थानीयकरण के साथ करनी होगी। केरल में यह मॉडल संगीत और समूह-पठन के साथ चल सकता है, राजस्थान में लोक-संगीत और हस्तकला के साथ, बंगाल में कविता-पाठ और चित्रकला के साथ, पंजाब में कीर्तन-आधारित लयात्मक गतिविधियों के साथ, और उत्तर प्रदेश या बिहार में लोकधुन, कहानी और स्मृति-केंद्रित समूह संवाद के साथ। यानी मूल बात कला नहीं, बल्कि सहभागिता, स्मृति, लय, शरीर और भावनात्मक जुड़ाव का संगम है।स्वास्थ्य नीति का बदलता अर्थ और आगे की राहदक्षिण कोरिया के मिलयांग की यह पहल आकार में भले स्थानीय हो, लेकिन विचार में बड़ी है। यह उस बहस को आगे बढ़ाती है कि क्या स्वास्थ्य नीति का उद्देश्य केवल रोग का इलाज करना है, या जीवन की कार्यक्षमता और मन की स्थिरता को बनाए रखना भी है। खासकर वृद्ध समाजों में यह सवाल और अहम हो जाता है। क्योंकि वहां हर समस्या का समाधान अस्पताल में नहीं मिलता। बहुत-सी समस्याओं का उत्तर पड़ोस, दिनचर्या, समूह, सहारा, सम्मान और रचनात्मक अभिव्यक्ति में छिपा होता है।भारत के लिए यह खबर दूर देश की दिलचस्प सूचना भर नहीं, बल्कि नीति-निर्माताओं, नगर प्रशासन, डॉक्टरों, मनोवैज्ञानिकों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और परिवारों के लिए एक संकेत है। हमें बुज़ुर्गों की देखभाल को अधिक समग्र रूप में देखना होगा। यदि हल्की संज्ञानात्मक गिरावट वाले लोगों के लिए समय रहते सामुदायिक कार्यक्रम बनाए जाएं, यदि कला और संस्कृति को स्वास्थ्य से जोड़ा जाए, यदि स्थानीय निकायों को सक्रिय भूमिका दी जाए, और यदि परिवारों को दोष देने की बजाय सहयोगी तंत्र खड़े किए जाएं, तो आने वाले वर्षों में हम वृद्ध देखभाल के संकट को कुछ हद तक मानवीय और टिकाऊ दिशा दे सकते हैं।मिलयांग का संदेश सीधा है: बढ़ती उम्र का अर्थ केवल क्षय नहीं, देखभाल की शैली बदलने की मांग भी है। और यह बदलाव जितना चिकित्सा से जुड़ा है, उतना ही संस्कृति, समुदाय और प्रशासनिक कल्पना से भी। भारत में जहां ‘सेहत’ का मतलब अक्सर दवा और परहेज तक सीमित हो जाता है, वहां यह याद दिलाना जरूरी है कि मन की हरियाली भी स्वास्थ्य का हिस्सा है। बुज़ुर्गों की स्मृति, भावनाएं और सामाजिक सक्रियता—ये सब विलासिता नहीं, सार्वजनिक चिंता के विषय हैं।शायद इसी वजह से ‘मन का उपचार, जैसे वसंत’ जैसा नाम इतना असरदार लगता है। यह हमें बताता है कि नीति यदि संवेदनशील हो, तो वह आंकड़ों से आगे बढ़कर जीवन को छू सकती है। और आने वाले दशकों में, जब भारत भी एक अधिक वृद्ध समाज की ओर बढ़ेगा, तब ऐसी पहलों से सीखी गई बातें बेहद उपयोगी साबित हो सकती हैं। सवाल सिर्फ यह नहीं कि हम बुज़ुर्गों को कितने साल जीवित रखते हैं; असली सवाल यह है कि उन वर्षों में हम उन्हें कितना जुड़ा हुआ, सम्मानित, सक्रिय और मानसिक रूप से सुरक्षित रख पाते हैं। मिलयांग ने इस दिशा में एक छोटा लेकिन अर्थपूर्ण कदम उठाया है। भारत को इसे गौर से देखना चाहिए।

Source: Original Korean article - Trendy News Korea

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