घर तक पहुँचती चिकित्सा: कोरिया की नई पहल क्यों अहम हैदक्षिण कोरिया ने तेजी से बूढ़ी होती आबादी की चुनौती से निपटने के लिए एक ऐसा कदम उठाया है, जिस पर सिर्फ एशिया ही नहीं बल्कि भारत जैसे देशों को भी गंभीरता से नजर रखनी चाहिए। कोरिया के स्वास्थ्य एवं कल्याण मंत्रालय ने दीर्घकालिक देखभाल से जुड़े ‘होम मेडिकल सेंटर’ यानी घर-आधारित चिकित्सा केंद्रों के पायलट कार्यक्रम में 50 नए चिकित्सा संस्थानों को शामिल किया है। पहली नजर में यह एक प्रशासनिक विस्तार जैसा लग सकता है, लेकिन असल में यह कोरिया की स्वास्थ्य व्यवस्था के सोच में बड़े बदलाव का संकेत है। संदेश साफ है—हर बुजुर्ग मरीज का इलाज अस्पताल या देखभाल केंद्र में ही हो, यह जरूरी नहीं; इलाज और देखभाल अब मरीज के घर तक भी पहुँच सकती है।इस मॉडल में डॉक्टर, नर्स और सोशल वर्कर एक टीम के रूप में काम करते हैं। वे घर जाकर ऐसे बुजुर्गों की देखभाल करते हैं जो लंबी अवधि की देखभाल बीमा योजना के लाभार्थी हैं और जिन्हें चलने-फिरने में दिक्कत है। टीम केवल दवा या जांच तक सीमित नहीं रहती, बल्कि यह भी देखती है कि मरीज को स्थानीय समुदाय से कौन-कौन सी सहायता मिल सकती है—जैसे भोजन, स्वच्छता, पुनर्वास, सामाजिक सहयोग या परिवार को राहत देने वाली सेवाएं। यही इस कार्यक्रम का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष है: स्वास्थ्य और देखभाल को अलग-अलग खानों में नहीं, बल्कि एक साथ समझना।भारतीय पाठकों के लिए यह समझना जरूरी है कि दक्षिण कोरिया दुनिया के सबसे तेजी से वृद्ध होती समाजों में गिना जाता है। वहाँ परिवारों का आकार छोटा हुआ है, शहरी जीवन तेज हुआ है और पारंपरिक संयुक्त परिवार की भूमिका कमजोर पड़ी है। यह स्थिति भारत के महानगरों और बड़े शहरों में भी धीरे-धीरे दिखाई देने लगी है। दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु, पुणे या हैदराबाद जैसे शहरों में अकेले रह रहे बुजुर्गों की संख्या बढ़ रही है। ऐसे में कोरिया का यह प्रयोग सिर्फ कोरियाई घरेलू नीति नहीं, बल्कि भविष्य के एशियाई समाजों की दिशा का एक संकेतक भी है।कोरिया में यह पहल इस बुनियादी सवाल का जवाब तलाशती दिखती है कि बढ़ती उम्र के साथ व्यक्ति की जिंदगी का केंद्र कहाँ होना चाहिए—अस्पताल, संस्था या उसका अपना घर? कोरिया की नई नीति का झुकाव साफ तौर पर घर की ओर है। यह सिर्फ सेवा वितरण की तकनीक नहीं, बल्कि बुजुर्गों की गरिमा, स्वतंत्रता और जीवन की गुणवत्ता को लेकर एक सामाजिक दृष्टिकोण भी है।भारत में अक्सर कहा जाता है कि “घर का माहौल ही सबसे अच्छा इलाज है”, लेकिन जब बीमारी जटिल हो जाए, दवाओं का दबाव बढ़ जाए और परिवार के सदस्य रोजी-रोटी में व्यस्त हों, तब यही वाक्य व्यवहार में कठिन हो जाता है। कोरिया इस कठिनाई का संस्थागत समाधान खोज रहा है—और यही इसे खबर से कहीं अधिक, एक नीति-प्रयोग बनाता है।डॉक्टर, नर्स और सोशल वर्कर की संयुक्त टीम: इस मॉडल की असली ताकतकोरिया के इस कार्यक्रम की रीढ़ वह बहु-विषयक टीम है, जिसमें डॉक्टर, नर्स और सोशल वर्कर एक साथ काम करते हैं। आम तौर पर हम इलाज को डॉक्टर की जिम्मेदारी मानते हैं, लेकिन बुजुर्गों की वास्तविक समस्याएँ अक्सर केवल चिकित्सकीय नहीं होतीं। दवा समय पर लेने की क्षमता, भोजन बनाने की स्थिति, बाथरूम तक सुरक्षित पहुँच, बिस्तर से उठने-बैठने में सहायता, परिवार की उपलब्धता, मानसिक अकेलापन, और स्थानीय प्रशासन या सामुदायिक सेवाओं से जुड़ाव—ये सब बराबर अहम मुद्दे हैं।डॉक्टर स्वास्थ्य की समग्र स्थिति का आकलन करता है, दवाओं का प्रबंधन देखता है और यह समझता है कि क्या मरीज को अस्पताल भेजने की जरूरत है या घर पर देखभाल जारी रह सकती है। नर्स लगातार निगरानी, घाव की ड्रेसिंग, जीवन रक्षक संकेतों की देखभाल, दवा पालन और स्वास्थ्य शिक्षा जैसे काम संभालती है। सोशल वर्कर की भूमिका भारतीय संदर्भ में शायद सबसे अधिक समझाने की जरूरत वाली है। कोरिया में सोशल वर्कर केवल ‘समाज सेवा’ का सामान्य अर्थ नहीं रखता, बल्कि वह मरीज और उपलब्ध सार्वजनिक या सामुदायिक सेवाओं के बीच कड़ी का काम करता है। वह यह सुनिश्चित करता है कि व्यक्ति अकेला न छूट जाए, और उसके आसपास सहायता का एक व्यावहारिक नेटवर्क बन सके।यदि इसे भारतीय संदर्भ से जोड़ें, तो यह कुछ हद तक उस आदर्श स्थिति जैसा है जहाँ एक आयुष्मान भारत हेल्थ एंड वेलनेस सेंटर, स्थानीय आशा कार्यकर्ता, प्रशिक्षित नर्स, पारिवारिक चिकित्सक और नगर-स्तरीय सामाजिक सहायता सेवाएँ एक दूसरे से समन्वय में काम करें। फर्क यह है कि कोरिया इसे बुजुर्ग दीर्घकालिक देखभाल के लिए अधिक औपचारिक और टीम-आधारित ढांचे में ढालने की कोशिश कर रहा है।यह समझना भी जरूरी है कि बुजुर्गों में एक ही समय कई बीमारियाँ होना आम बात है—मधुमेह, उच्च रक्तचाप, गठिया, स्मृतिभ्रंश, कमजोरी, बार-बार गिरने का जोखिम, और कभी-कभी अवसाद या अकेलेपन जैसी समस्याएँ भी। यदि देखभाल को केवल अस्पताल के पर्चे तक सीमित रखा जाए, तो मरीज की वास्तविक जरूरतें अधूरी रह जाती हैं। यही वजह है कि कोरिया की यह पहल केवल ‘होम विजिट’ नहीं, बल्कि ‘इंटीग्रेटेड केयर’ यानी समन्वित देखभाल का प्रयास है।भारत में जिन परिवारों ने घर पर किसी बुजुर्ग की लंबी बीमारी का सामना किया है, वे जानते हैं कि असली संकट केवल डॉक्टर दिखाना नहीं होता। असली संकट यह होता है कि हर हफ्ते अस्पताल ले जाना कैसे संभव होगा, स्ट्रेचर कौन लाएगा, दवा कौन समझेगा, रात में अचानक तबीयत बिगड़ी तो क्या किया जाए, और परिवार का कौन सदस्य नौकरी छोड़कर देखभाल करेगा। कोरिया की टीम-आधारित व्यवस्था इसी बहुस्तरीय तनाव को कम करने की दिशा में एक संगठित प्रयास है।घर में इलाज बनाम संस्थान में भर्ती: बुजुर्गों की गरिमा का प्रश्नकोरिया सरकार का कहना है कि इस योजना का मुख्य उद्देश्य यह है कि चलने-फिरने में असमर्थ बुजुर्गों को नर्सिंग अस्पतालों या देखभाल संस्थानों में भर्ती हुए बिना घर पर आवश्यक चिकित्सा सेवाएँ मिल सकें। यह बात सुनने में सरल लगती है, लेकिन इसके पीछे एक बड़ा सामाजिक और नैतिक प्रश्न छिपा है—बुढ़ापे की जगह कहाँ है? क्या हर अशक्त बुजुर्ग की नियति किसी संस्थान में चले जाना है, या समाज उसे उसके परिचित परिवेश में जीवन का अधिक समय बिताने का अवसर दे सकता है?घर का महत्व केवल सुविधा तक सीमित नहीं होता। घर स्मृति, पहचान और भावनात्मक सुरक्षा का स्थान होता है। जिन बुजुर्गों की संज्ञानात्मक क्षमता घटने लगती है, उनके लिए परिचित कमरा, जाना-पहचाना दरवाजा, पूजा का कोना, परिवार की आवाजें, पड़ोस का माहौल—ये सभी मानसिक स्थिरता में भूमिका निभाते हैं। अस्पताल या संस्था में बेहतर निगरानी मिल सकती है, लेकिन वहाँ अनजाना वातावरण, अलग दिनचर्या और निजीपन की कमी भी होती है। कोरिया का यह मॉडल कहता है कि यदि पर्याप्त चिकित्सकीय और सामाजिक सहयोग घर तक पहुँच जाए, तो संस्थागत देखभाल ही एकमात्र रास्ता नहीं रह जाता।भारतीय समाज में भी बुजुर्गों को घर पर रखने की भावनात्मक इच्छा प्रबल रहती है। लेकिन यह भावनात्मक इच्छा अक्सर व्यावहारिक कठिनाइयों से हार जाती है। उदाहरण के लिए, एक मध्यमवर्गीय परिवार में यदि दोनों कमाने वाले हों, बच्चे स्कूल जाते हों और घर में कोई स्थायी देखभालकर्ता न हो, तो गंभीर रूप से अशक्त बुजुर्ग की घरेलू देखभाल भारी दबाव बन जाती है। कई बार परिवार अपराधबोध और आर्थिक विवशता के बीच फँस जाता है। कोरिया की नीति इस ‘निजी’ समस्या को सार्वजनिक नीति के प्रश्न में बदल देती है—यानी देखभाल केवल परिवार की जिम्मेदारी नहीं, सामाजिक व्यवस्था का भी विषय है।यहाँ एक और पहलू महत्वपूर्ण है। घर में इलाज की बात तभी सार्थक है जब सुरक्षा और गुणवत्ता बनी रहे। यदि घर में चिकित्सकीय निगरानी कमजोर हो, आपातकालीन व्यवस्था न हो या देखभालकर्ता प्रशिक्षित न हों, तो ‘घर पर रहना’ आदर्श नहीं, जोखिम भी बन सकता है। इसलिए कोरिया का मॉडल केवल भावनात्मक निर्णय नहीं है; यह एक संरचित प्रणाली के साथ घर-आधारित देखभाल को व्यवहार्य बनाने की कोशिश है।हम भारतीय संदर्भ में इसे कुछ वैसा समझ सकते हैं जैसे प्रसव के मामले में केवल ‘घर या अस्पताल’ का प्रश्न नहीं, बल्कि सुरक्षित व्यवस्था का प्रश्न महत्वपूर्ण होता है। उसी तरह बुजुर्गों की देखभाल में भी केवल ‘घर में रहना’ पर्याप्त नहीं; प्रश्न यह है कि क्या घर को देखभाल-योग्य वातावरण बनाया गया है। कोरिया की नई पहल इसी खाई को भरने की दिशा में देखी जा रही है।2022 से शुरू हुआ प्रयोग, अब 50 नए केंद्र: विस्तार का क्या मतलब हैकोरिया ने इस पायलट कार्यक्रम की शुरुआत दिसंबर 2022 में की थी और तब से इसे चरणबद्ध तरीके से बढ़ाया जा रहा है। अब 50 नए चिकित्सा संस्थानों को शामिल किया गया है। सरकारी भाषा में यह संख्या-वृद्धि है, लेकिन नीति की भाषा में यह एक संकेत है कि प्रयोग को पर्याप्त महत्व दिया जा रहा है और उससे सीखते हुए उसका दायरा बढ़ाया जा रहा है।‘पायलट प्रोजेक्ट’ शब्द अपने आप में बहुत कुछ कहता है। इसका मतलब यह नहीं कि नीति अधूरी है, बल्कि यह कि सरकार पहले मैदान में मॉडल को परखना चाहती है। क्या डॉक्टरों की टीम वास्तव में नियमित घर-भ्रमण कर पा रही है? क्या मरीजों और परिवारों को इससे राहत मिल रही है? क्या सामुदायिक सेवाओं के साथ समन्वय सहज है? क्या शहरी और ग्रामीण इलाकों में इसकी उपयोगिता समान है? क्या मानव संसाधन पर्याप्त हैं? ऐसे प्रश्नों के उत्तर बिना पायलट मॉडल के मिलना कठिन है।50 नए केंद्र जुड़ने का अर्थ यह भी है कि अब अधिक बुजुर्गों तक यह सुविधा पहुँच सकती है और सरकार को विभिन्न इलाकों से अधिक अनुभवजन्य डेटा मिलेगा। नीतियाँ अक्सर कागज पर सुंदर दिखती हैं, लेकिन जमीन पर उनकी सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि डॉक्टर समय निकालते हैं या नहीं, नर्सों को यात्रा सुविधा मिलती है या नहीं, और सोशल वर्कर के पास पर्याप्त स्थानीय नेटवर्क है या नहीं। कोरिया इस जमीनी अनुभव को इकट्ठा कर आगे की दीर्घकालिक संरचना तैयार करना चाहता है।भारत में भी कई स्वास्थ्य योजनाएँ पहले चुनिंदा जिलों या राज्यों में शुरू होती हैं और फिर धीरे-धीरे विस्तार पाती हैं। लेकिन अंतर अक्सर निगरानी और संस्थागत समन्वय में आ जाता है। कोरिया जैसे देशों की ताकत यह है कि वे पायलट को डेटा, मूल्यांकन और नीति-संशोधन से जोड़ते हैं। यही कारण है कि वहाँ ऐसी घोषणाएँ केवल राजनीतिक संदेश नहीं, बल्कि प्रशासनिक तैयारी के संकेत भी मानी जाती हैं।हालाँकि चुनौतियाँ कम नहीं हैं। घर-आधारित चिकित्सा का विस्तार करने के लिए प्रशिक्षित मानव संसाधन, यात्रा समय, भुगतान प्रणाली, क्षेत्रीय असमानता और अस्पतालों के साथ समन्वय जैसी समस्याएँ सामने आएँगी। फिर भी विस्तार का निर्णय यह दर्शाता है कि कोरिया अब उपचार के केंद्र को अस्पताल की इमारत से बाहर निकालकर रोगी के वास्तविक जीवन-संसार तक ले जाने की कोशिश कर रहा है।अस्पतालों में देखभाल के मानक भी साथ-साथ: कोरिया की दोहरी रणनीतिदिलचस्प बात यह है कि जिस दिन घर-आधारित चिकित्सा केंद्रों के विस्तार की घोषणा हुई, उसी दिन कोरिया के स्वास्थ्य एवं कल्याण मंत्रालय ने अस्पताल-स्तरीय चिकित्सा संस्थानों के लिए देखभाल सेवाओं के मानक दिशानिर्देश भी जारी किए। यह दिखाता है कि कोरिया केवल घर की देखभाल पर जोर नहीं दे रहा, बल्कि अस्पतालों के भीतर मिलने वाली ‘केयर’ की गुणवत्ता और जवाबदेही को भी व्यवस्थित करना चाहता है।कोरिया में यह चिंता सामने आई थी कि अलग-अलग अस्पतालों में देखभाल सेवाओं की गुणवत्ता, प्रबंधन और सुरक्षा में भिन्नता है। ऐसे में मानक दिशानिर्देश यह स्पष्ट करने की कोशिश करते हैं कि देखभाल सेवाएँ किस ढंग से उपलब्ध कराई जाएँ, कर्मचारियों की जिम्मेदारी क्या हो, और मरीज की सुरक्षा की निगरानी कैसे हो। सरल शब्दों में कहें तो एक तरफ सरकार यह देख रही है कि मरीज को घर में गुणवत्तापूर्ण देखभाल कैसे मिले, और दूसरी तरफ यह भी कि यदि मरीज अस्पताल में हो, तब भी देखभाल व्यवस्था अव्यवस्थित न रहे।इसे नीति की दोहरी रणनीति कहा जा सकता है। एक धुरी है ‘घर पर देखभाल का विस्तार’, और दूसरी धुरी है ‘अस्पताल में देखभाल का मानकीकरण’। दोनों की जड़ एक ही समस्या में है—अति-वृद्ध समाज में देखभाल का बोझ कौन उठाएगा, किस गुणवत्ता से उठाएगा, और किस निगरानी के तहत उठाएगा? यह वही प्रश्न है जो भारत में भी अक्सर परिवारों को परेशान करता है, खासकर तब जब अस्पताल में भर्ती मरीज के लिए अलग से अटेंडेंट रखना पड़ता है या निजी देखभाल की लागत तेजी से बढ़ती जाती है।भारत में ‘अस्पताल में मरीज के साथ कौन रुकेगा’ यह प्रश्न लगभग हर परिवार के अनुभव का हिस्सा है। अनेक सरकारी अस्पतालों और निजी अस्पतालों में मरीज के साथ एक परिजन की उपस्थिति को व्यावहारिक आवश्यकता माना जाता है। लेकिन जब परिवार छोटा हो, सदस्य बाहर नौकरी करते हों या मरीज लंबे समय तक भर्ती रहे, तब यह व्यवस्था टूटने लगती है। कोरिया की तरह भारत में भी भविष्य में यह बहस और तेज हो सकती है कि देखभाल को परिवार के निजी श्रम पर कितना छोड़ा जा सकता है और कितना संस्थागत बनाना होगा।इस दृष्टि से कोरिया की नई पहल केवल स्वास्थ्य मंत्रालय की एक घोषणा नहीं, बल्कि देखभाल अर्थव्यवस्था को औपचारिक और जवाबदेह बनाने की कोशिश है। यह ऐसा विषय है जिस पर भारत को अभी से नीति-स्तर पर विचार करना चाहिए।निजी देखभाल का बढ़ता बोझ: भारत और कोरिया की साझा चिंताकोरिया में आयोजित एक चर्चा में विशेषज्ञों ने इस बात पर जोर दिया कि निजी देखभाल का बोझ अब सामाजिक संकट का रूप ले रहा है। यह टिप्पणी केवल कोरिया तक सीमित नहीं लगती। भारत में भी यदि किसी परिवार में लंबे समय तक बिस्तर पर पड़े बुजुर्ग, डिमेंशिया से जूझ रहे माता-पिता, स्ट्रोक के बाद पुनर्वास की जरूरत वाला सदस्य, या कैंसर जैसी दीर्घकालिक बीमारी का मरीज हो, तो पूरा परिवार आर्थिक, मानसिक और भावनात्मक दबाव में आ जाता है।हमारे यहाँ अब भी देखभाल को अक्सर ‘घर की जिम्मेदारी’ मान लिया जाता है, और अधिकतर मामलों में यह जिम्मेदारी महिलाओं के कंधों पर आ जाती है। बहू, बेटी, पत्नी या बहन—परिवार की महिला सदस्य ही प्रायः असंगठित, बिना भुगतान या कम भुगतान वाले देखभाल श्रम का सबसे बड़ा हिस्सा निभाती हैं। यह स्थिति सामाजिक रूप से स्वीकार्य मानी जाती है, लेकिन नीति-निर्माण में इसे पर्याप्त जगह नहीं मिलती। कोरिया का विमर्श इस निजी श्रम को सार्वजनिक नीति का विषय बना रहा है। यही इसकी बड़ी प्रासंगिकता है।भारतीय समाज में जैसे-जैसे जीवन प्रत्याशा बढ़ेगी और छोटे परिवारों का चलन मजबूत होगा, वैसे-वैसे बुजुर्ग देखभाल की चुनौती तीखी होती जाएगी। आज भी महानगरों में ‘पेड केयरगिवर’ का बाजार बढ़ रहा है, लेकिन उसकी गुणवत्ता, प्रशिक्षण, प्रमाणन और जवाबदेही को लेकर गंभीर सवाल हैं। ग्रामीण भारत में स्थिति अलग है—वहाँ संस्थागत सेवाएँ कम हैं, लेकिन पारिवारिक सहयोग के पुराने ढाँचे भी कमजोर पड़ रहे हैं। ऐसे में कोरिया की तरह समन्वित घरेलू चिकित्सा और सामुदायिक देखभाल मॉडल पर विचार करना समय की मांग हो सकती है।यह भी सच है कि भारत और कोरिया की व्यवस्थाएँ अलग हैं। कोरिया की सार्वजनिक बीमा संरचना अधिक संगठित है, जबकि भारत में स्वास्थ्य सेवाएँ सार्वजनिक और निजी के मिश्रित, असमान और बहुस्तरीय ढाँचे में चलती हैं। फिर भी मूल प्रश्न समान है: क्या किसी समाज में बुढ़ापे और बीमारी का भार केवल परिवार की सहनशीलता पर छोड़ा जा सकता है? यदि नहीं, तो राज्य, समुदाय और स्वास्थ्य व्यवस्था की साझी जिम्मेदारी क्या होगी?कोरिया का उत्तर अभी अंतिम नहीं है, क्योंकि यह अभी पायलट चरण में है। लेकिन इतना स्पष्ट है कि वहाँ समस्या को पहचाना जा चुका है और समाधान संस्थागत रूप से गढ़ने की कोशिश हो रही है। भारत के लिए भी यह एक महत्वपूर्ण दर्पण है।भारत के लिए सबक: क्या घर-आधारित बुजुर्ग चिकित्सा भविष्य का रास्ता हो सकती हैकोरिया के इस प्रयोग से भारत को कई स्तरों पर सीख मिल सकती है। पहली सीख यह कि बुजुर्ग देखभाल को केवल अस्पतालों, वृद्धाश्रमों या परिवारों की निजी समस्या मानकर नहीं छोड़ा जा सकता। दूसरी सीख यह कि चिकित्सा और सामाजिक सहायता को साथ जोड़ना जरूरी है। तीसरी सीख यह कि घर-आधारित चिकित्सा कोई विलासिता नहीं, बल्कि बढ़ती उम्र वाले समाज की व्यावहारिक जरूरत बन सकती है।भारत में आयुष्मान भारत, हेल्थ एंड वेलनेस सेंटर, डिजिटल स्वास्थ्य मिशन, बुजुर्गों के लिए राष्ट्रीय कार्यक्रम और कुछ राज्यों में घरेलू स्वास्थ्य सेवाओं के प्रयोग पहले से मौजूद हैं। लेकिन ये अभी एक समन्वित, बड़े पैमाने के बुजुर्ग दीर्घकालिक देखभाल ढाँचे में नहीं बदले हैं। यदि भविष्य में भारत इस दिशा में आगे बढ़ना चाहे, तो उसे डॉक्टर-नर्स-सोशल वर्कर या सामुदायिक स्वास्थ्यकर्मी आधारित टीम मॉडल, प्रशिक्षित जेरियाट्रिक देखभाल, परिवारों के लिए परामर्श, और स्थानीय निकायों के साथ तालमेल जैसे घटकों पर एक साथ काम करना होगा।यह भी ध्यान रखना होगा कि भारतीय समाज में क्षेत्रीय विषमता बहुत अधिक है। केरल, तमिलनाडु या महाराष्ट्र के कुछ हिस्सों की चुनौतियाँ उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड या पूर्वोत्तर के क्षेत्रों से भिन्न हो सकती हैं। इसलिए कोरिया का मॉडल हूबहू अपनाना संभव नहीं, लेकिन उसका मूल सिद्धांत—मरीज की जिंदगी के वास्तविक परिवेश में चिकित्सा और देखभाल को पहुँचाना—भारत के लिए अत्यंत उपयोगी विचार हो सकता है।अंततः कोरिया की यह खबर एक प्रशासनिक सूचना से अधिक है। यह हमें उस भविष्य की झलक दिखाती है जिसमें अस्पताल इलाज का केंद्र तो रहेगा, पर एकमात्र केंद्र नहीं रहेगा। बुजुर्ग मरीज की जरूरतें उसके बिस्तर, कमरे, रसोई, दवा के डिब्बे, परिवार की उपलब्धता और समुदाय के सहयोग से जुड़ी होंगी। ऐसे में स्वास्थ्य नीति की सफलता इस बात से मापी जाएगी कि वह व्यक्ति को उसके अपने जीवन-संसार में कितनी सुरक्षा, सम्मान और निरंतर देखभाल दे पाती है।भारत में जब हम ‘विकसित देश’ बनने की चर्चा करते हैं, तो केवल हाईवे, सेमीकंडक्टर या डिजिटल पेमेंट से तस्वीर पूरी नहीं होती। एक परिपक्व समाज की असली पहचान इस बात से भी होती है कि वह अपने बुजुर्गों, बीमारों और निर्भर लोगों की देखभाल कैसे करता है। कोरिया ने इस दिशा में एक गंभीर प्रयोग शुरू किया है। अब प्रश्न यह है कि क्या भारत समय रहते इससे सीख लेकर अपनी सामाजिक और स्वास्थ्य नीति को भविष्य के लिए तैयार करेगा?
Source: Original Korean article - Trendy News Korea
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