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वैक्सीन कूटनीति की वापसी: दक्षिण कोरिया और Gavi की बातचीत से क्यों फिर केंद्र में आया वैश्विक स्वास्थ्य सहयोग

वैक्सीन कूटनीति की वापसी: दक्षिण कोरिया और Gavi की बातचीत से क्यों फिर केंद्र में आया वैश्विक स्वास्थ्य सहयोग

महज एक बैठक नहीं, महामारी के बाद की दुनिया का नया संकेत

दक्षिण कोरिया की राजधानी सियोल में हुई एक उच्चस्तरीय मुलाकात ने यह साफ कर दिया है कि दुनिया भले ही कोविड-19 की सबसे तीखी लहरों से आगे निकल चुकी हो, लेकिन संक्रामक रोगों से सुरक्षा का सवाल अभी भी अंतरराष्ट्रीय राजनीति, अर्थव्यवस्था और सार्वजनिक स्वास्थ्य के केंद्र में बना हुआ है। कोरिया के वैश्विक बहुपक्षीय कूटनीति समन्वयक जांग वुक-जिन ने हाल में कोरिया आईं Gavi, यानी ‘द वैक्सीन एलायंस’ की बोर्ड चेयर हेलेन क्लार्क से मुलाकात कर सहयोग के रास्तों पर चर्चा की। देखने में यह एक नियमित राजनयिक मुलाकात लग सकती है, पर इसके निहितार्थ कहीं बड़े हैं। यह उस दुनिया की तस्वीर है जहां टीका अब केवल अस्पताल या क्लीनिक का विषय नहीं, बल्कि रणनीतिक साझेदारी, मानवीय जिम्मेदारी और अंतरराष्ट्रीय प्रभाव का साधन भी है।

भारतीय पाठकों के लिए यह खबर इसलिए खास है क्योंकि हमने अपनी आंखों से देखा है कि महामारी के समय वैक्सीन केवल वैज्ञानिक उपलब्धि नहीं रहती, वह राष्ट्रीय क्षमता, वैश्विक भरोसे और मानवीय पहुंच का प्रतीक बन जाती है। भारत ने ‘वैक्सीन मैत्री’ पहल के जरिए दुनिया के अनेक देशों तक टीके पहुंचाए थे। उसी तरह अब दक्षिण कोरिया भी अपने स्वास्थ्य ढांचे, उत्पादन क्षमता और अंतरराष्ट्रीय सहयोग के जरिये वैश्विक स्वास्थ्य मंच पर अधिक सक्रिय भूमिका निभाने की दिशा में देखा जा रहा है। कोरिया और Gavi की यह बातचीत हमें याद दिलाती है कि भविष्य की महामारी से सुरक्षा केवल अपने देश की सीमाओं के भीतर मजबूत अस्पताल बनाने से नहीं होगी, बल्कि इस बात से भी होगी कि दुनिया के कमजोर देशों तक टीके, कोल्ड-चेन, स्वास्थ्यकर्मी और बुनियादी ढांचा कितनी तेजी से पहुंचता है।

यहां एक सांस्कृतिक और नीतिगत संदर्भ समझना जरूरी है। पूर्वी एशिया, खासकर दक्षिण कोरिया जैसे देशों में राज्य, उद्योग और तकनीकी क्षमता के बीच घनिष्ठ तालमेल को विकास का प्रमुख आधार माना जाता है। यही कारण है कि वहां स्वास्थ्य नीति को भी अक्सर केवल सामाजिक क्षेत्र के रूप में नहीं, बल्कि राष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा और वैश्विक प्रतिष्ठा से जोड़कर देखा जाता है। जब कोरिया सरकार और Gavi जैसे वैश्विक स्वास्थ्य संगठन सहयोग पर बात करते हैं, तो उसका अर्थ केवल अनुदान या सद्भावना नहीं होता; वह उत्पादन, आपूर्ति, अनुसंधान, वितरण और कूटनीतिक विश्वसनीयता के व्यापक ढांचे का हिस्सा होता है।

दक्षिण कोरिया की यह सक्रियता ऐसे समय सामने आई है जब दुनिया के कई हिस्सों में खसरा, पोलियो जैसे रोके जा सकने वाले रोगों के फिर उभरने की चिंता है, और निम्न-आय वाले देशों में नियमित टीकाकरण कार्यक्रम अब भी असमान हैं। इसलिए इस मुलाकात को एक संदेश की तरह पढ़ा जाना चाहिए: महामारी के बाद की दुनिया में ‘स्वास्थ्य सुरक्षा’ फिर से वैश्विक एजेंडा बन रही है, और वैक्सीन उसकी धुरी है।

Gavi क्या है और इसकी अहमियत इतनी बड़ी क्यों मानी जाती है

Gavi का पूरा नाम ‘ग्लोबल एलायंस फॉर वैक्सीन्स एंड इम्यूनाइजेशन’ से विकसित होकर अब आम तौर पर ‘द वैक्सीन एलायंस’ के रूप में जाना जाता है। यह एक अंतरराष्ट्रीय साझेदारी मंच है जो खासतौर पर निम्न-आय और विकासशील देशों में बच्चों को जीवनरक्षक टीके उपलब्ध कराने, टीकाकरण का दायरा बढ़ाने और स्वास्थ्य प्रणालियों को मजबूत करने पर काम करता है। साधारण शब्दों में कहें तो Gavi केवल वैक्सीन खरीदने वाली संस्था नहीं है; यह उन देशों की मदद करती है जहां स्वास्थ्य ढांचा कमजोर है, जहां टीका गांव तक पहुंचाना उतना ही बड़ा काम है जितना उसे बनाना।

कोरिया की ओर से बातचीत के दौरान यह रेखांकित किया गया कि Gavi ने अब तक निम्न-आय वाले देशों के लगभग 1 अरब बच्चों तक टीके पहुंचाने में योगदान दिया है और 1.8 करोड़ से अधिक मौतों को रोका है। ये आंकड़े केवल प्रशंसात्मक बयान नहीं हैं; वे वैश्विक स्वास्थ्य की वास्तविकता का कठोर और मानवीय सार हैं। भारत जैसे देश में, जहां मिशन इंद्रधनुष, पल्स पोलियो और सार्वभौमिक टीकाकरण कार्यक्रम जैसी पहलों ने करोड़ों परिवारों की जिंदगी बदल दी, वहां इन आंकड़ों का अर्थ बहुत आसानी से समझा जा सकता है। जब किसी बच्चे को समय पर टीका मिलता है, तो वह केवल एक बीमारी से नहीं बचता; उसका परिवार इलाज के आर्थिक बोझ से बचता है, स्थानीय स्वास्थ्य तंत्र पर दबाव घटता है और समुदाय में संक्रमण की श्रृंखला कमजोर पड़ती है।

भारतीय ग्रामीण संदर्भ में सोचें तो यदि किसी दूरस्थ जिले के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र तक वैक्सीन नहीं पहुंचे, तो बीमारी केवल एक घर में नहीं रुकती। वह स्कूल, आंगनवाड़ी, बाजार और पूरी बस्ती को प्रभावित कर सकती है। यही बात अफ्रीका, एशिया और प्रशांत क्षेत्र के उन देशों पर भी लागू होती है जहां बुनियादी स्वास्थ्य सुविधाएं अभी सीमित हैं। Gavi की भूमिका इसी अंतर को पाटने की है। वह वैक्सीन तक पहुंच को ‘दान’ के रूप में नहीं, बल्कि वैश्विक स्वास्थ्य न्याय के रूप में देखती है।

हेलेन क्लार्क स्वयं वैश्विक नीति जगत का जाना-पहचाना नाम हैं। न्यूजीलैंड की पूर्व प्रधानमंत्री और संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम की पूर्व प्रमुख रही क्लार्क का Gavi से जुड़ाव यह संकेत भी देता है कि दुनिया अब टीकाकरण को केवल चिकित्सकीय कार्यक्रम नहीं, बल्कि विकास, समानता और सुरक्षा के संयुक्त एजेंडा के रूप में देख रही है। यह बात भारत के लिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि यहां स्वास्थ्य नीति पर अब आर्थिक विकास, जनसांख्यिकी और सामाजिक न्याय की बहसें एक साथ चलती हैं।

दक्षिण कोरिया की भूमिका क्यों बढ़ रही है

Gavi की बोर्ड चेयर हेलेन क्लार्क ने दक्षिण कोरिया की वैश्विक स्वास्थ्य व्यवस्था में बढ़ती भूमिका की सराहना की और सरकार के साथ-साथ कोरियाई कंपनियों से भी अधिक सक्रिय भागीदारी का आग्रह किया। यह बिंदु विशेष ध्यान देने योग्य है। आमतौर पर कूटनीतिक बैठकों में सरकारों की बात होती है, लेकिन यहां निजी क्षेत्र का उल्लेख स्पष्ट रूप से बताता है कि आधुनिक स्वास्थ्य सहयोग बहु-स्तरीय है। केवल नीति घोषित करने से काम नहीं चलता; उत्पादन क्षमता, बायोटेक उद्योग, कोल्ड-स्टोरेज नेटवर्क, आपूर्ति श्रृंखला, स्थानीय प्रशिक्षण और डिजिटल निगरानी तंत्र—ये सब मिलकर किसी देश की वास्तविक स्वास्थ्य क्षमता बनाते हैं।

दक्षिण कोरिया पिछले कुछ वर्षों में बायोफार्मा, चिकित्सा प्रौद्योगिकी और सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रबंधन के क्षेत्र में अपनी उपस्थिति तेजी से मजबूत कर चुका है। K-pop और K-drama ने कोरिया की ‘सॉफ्ट पावर’ को दुनिया भर में लोकप्रिय बनाया, लेकिन अब सियोल यह दिखाना चाहता है कि उसकी ताकत केवल सांस्कृतिक निर्यात तक सीमित नहीं है। जिस तरह भारतीय सिनेमा, योग और आयुर्वेद के साथ भारत की फार्मा क्षमता भी उसकी वैश्विक छवि का हिस्सा है, उसी तरह कोरिया अब सांस्कृतिक प्रभाव के साथ तकनीकी और स्वास्थ्य क्षमता को भी जोड़ रहा है।

भारत के पाठकों के लिए यहां एक रोचक तुलना है। जैसे भारत को अक्सर ‘फार्मेसी ऑफ द वर्ल्ड’ कहा जाता है, वैसे ही दक्षिण कोरिया अपनी उन्नत विनिर्माण क्षमता, अनुसंधान ढांचे और तेज प्रशासनिक समन्वय के सहारे वैश्विक स्वास्थ्य आपूर्ति शृंखलाओं में अधिक केंद्रीय भूमिका चाहता दिख रहा है। हालांकि इस बैठक में किसी नई परियोजना, वित्तीय प्रतिबद्धता या ठोस समझौते का विवरण सामने नहीं आया, फिर भी यह स्पष्ट है कि Gavi को कोरिया में एक संभावित और विश्वसनीय साझेदार दिखाई दे रहा है।

कोरिया की घरेलू व्यवस्था भी इस सक्रियता की पृष्ठभूमि समझने में मदद करती है। वहां सरकार, निर्यात-उन्मुख उद्योग और तकनीकी नवाचार के बीच तालमेल की एक लंबी परंपरा रही है। यही मॉडल स्वास्थ्य क्षेत्र में भी दिखता है। जब कोई वैश्विक संस्था कोरियाई कंपनियों से सीधे अधिक भागीदारी की अपेक्षा करती है, तो उसका आशय केवल फंडिंग नहीं, बल्कि उत्पादन, अनुसंधान, लॉजिस्टिक्स और स्थानीय साझेदारी की पूरी श्रृंखला से होता है। यह उस मॉडल से मेल खाता है जिसमें सार्वजनिक स्वास्थ्य को राष्ट्रीय क्षमता और अंतरराष्ट्रीय योगदान, दोनों के रूप में पढ़ा जाता है।

वैक्सीन कूटनीति का असली अर्थ: टीके से आगे, भरोसे का नेटवर्क

‘वैक्सीन डिप्लोमेसी’ या वैक्सीन कूटनीति शब्द महामारी के दौरान खूब चर्चा में रहा। लेकिन इसे केवल इस अर्थ में समझना कि कौन सा देश किसे टीका भेज रहा है, पर्याप्त नहीं है। असल में वैक्सीन कूटनीति का मतलब है—विज्ञान, आपूर्ति, वित्त, नियमन, मानवीय जरूरत और विदेश नीति का संगम। जब एक देश किसी अंतरराष्ट्रीय टीकाकरण कार्यक्रम में भागीदारी बढ़ाता है, तो वह केवल मानवीय समर्थन नहीं देता; वह अपने बारे में एक संदेश भी देता है कि वह वैश्विक सार्वजनिक भलाई में हिस्सेदार है और संकट के समय भरोसेमंद साझेदार बन सकता है।

भारत ने कोविड काल में यही संदेश दुनिया को दिया था। हालांकि बाद में घरेलू मांग और दूसरी लहर जैसी चुनौतियों ने उस नीति की सीमाएं भी उजागर कीं, फिर भी यह अनुभव बताता है कि स्वास्थ्य सहयोग आज की कूटनीति का अहम आयाम है। दक्षिण कोरिया और Gavi की बातचीत को इसी नजरिये से पढ़ना चाहिए। यह दुनिया को बताने का भी तरीका है कि सियोल अंतरराष्ट्रीय स्वास्थ्य ढांचे में अधिक दृश्यमान और जिम्मेदार भूमिका निभाना चाहता है।

यहां एक और जरूरी बात है। समाचार में इस बात पर जोर दिया गया कि Gavi का काम केवल टीकों की आपूर्ति तक सीमित नहीं, बल्कि ‘स्वास्थ्य क्षमता निर्माण’ तक फैला हुआ है। इसका अर्थ है कि यदि किसी देश में टीके पहुंच भी जाएं, तब भी सफलता इस पर निर्भर करेगी कि क्या वहां प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मी हैं, क्या कोल्ड-चेन बनी हुई है, क्या गांव स्तर तक वितरण तंत्र है, क्या गलत सूचना से निपटने की व्यवस्था है, और क्या रोग निगरानी प्रणाली संक्रमण के शुरुआती संकेत पकड़ सकती है। दूसरे शब्दों में, वैक्सीन कूटनीति दरअसल संस्थागत भरोसे और क्षमता का नेटवर्क है।

भारतीय समाज में इसे समझने के लिए हम पोलियो उन्मूलन अभियान का उदाहरण ले सकते हैं। पोलियो की बूंदें खुद में महत्वपूर्ण थीं, लेकिन सफलता केवल उनसे नहीं आई; उसके पीछे आशा कार्यकर्ता, धार्मिक नेताओं से संवाद, घर-घर पहुंच, निगरानी और लगातार जनसंपर्क था। ठीक यही सिद्धांत वैश्विक स्तर पर भी लागू होता है। Gavi और दक्षिण कोरिया जैसे देशों के बीच सहयोग की चर्चा हमें याद दिलाती है कि बीमारी की रोकथाम का आधार केवल प्रयोगशाला नहीं, बल्कि समाज और प्रशासन का संयुक्त ढांचा है।

भारत के लिए इस खबर के क्या मायने हैं

यह सवाल स्वाभाविक है कि सियोल में हुई एक मुलाकात का भारत से क्या संबंध? जवाब यह है कि बहुत गहरा संबंध है। भारत एक ऐसी उभरती शक्ति है जो एक ओर घरेलू स्तर पर विशाल टीकाकरण कार्यक्रम चलाता है, और दूसरी ओर वैश्विक दक्षिण की जरूरतों को लेकर लगातार आवाज भी उठाता है। ऐसे में दक्षिण कोरिया और Gavi के बीच बढ़ता सहयोग भारत के लिए प्रतिस्पर्धा और साझेदारी, दोनों का संकेत हो सकता है। प्रतिस्पर्धा इस अर्थ में कि वैश्विक स्वास्थ्य क्षेत्र में अब कई मध्यम और बड़ी शक्तियां सक्रिय स्थान चाहती हैं। साझेदारी इस अर्थ में कि बहुध्रुवीय दुनिया में बड़े स्वास्थ्य अभियानों की सफलता सहयोग से ही संभव है।

भारत के पास दवा निर्माण, कम लागत वाली उत्पादन क्षमता, बड़े पैमाने पर टीकाकरण का अनुभव और डिजिटल प्लेटफॉर्म विकसित करने की ताकत है। दक्षिण कोरिया के पास उन्नत विनिर्माण, तकनीकी दक्षता, निर्यात-उन्मुख स्वास्थ्य उद्योग और सुसंगठित संस्थागत समन्वय है। यदि दुनिया वास्तव में भविष्य की महामारी से बेहतर ढंग से निपटना चाहती है, तो भारत, कोरिया, Gavi, WHO और क्षेत्रीय साझेदारों के बीच पूरक सहयोग की बहुत बड़ी संभावना बनती है।

भारतीय पाठकों के लिए एक और महत्वपूर्ण बात है—वैश्विक स्वास्थ्य में निवेश को केवल विदेश नीति की खबर समझकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। इसका सीधा असर यात्रा, व्यापार, शिक्षा, आपूर्ति शृंखला और सार्वजनिक सुरक्षा पर पड़ता है। अगर अफ्रीका या एशिया के किसी हिस्से में टीकाकरण की कमी के कारण संक्रमण फैलता है, तो आधुनिक दुनिया में उसका असर दूर देशों तक पहुंचने में देर नहीं लगती। कोविड-19 ने यही सबक सबसे कठोर तरीके से सिखाया। इसलिए जब कोरिया जैसे देश Gavi के साथ अपनी भागीदारी मजबूत करने की बात करते हैं, तो यह दुनिया की सामूहिक सुरक्षा में निवेश जैसा है।

भारत के नीति निर्माताओं के लिए भी यह संकेत है कि वैश्विक स्वास्थ्य मंच पर उपस्थिति बनाए रखने के लिए केवल उत्पादन क्षमता ही नहीं, निरंतर कूटनीतिक पहल, वित्तीय प्रतिबद्धता और क्षेत्रीय विश्वास निर्माण भी जरूरी है। घरेलू स्वास्थ्य मजबूती और अंतरराष्ट्रीय योगदान—दोनों को साथ लेकर चलना ही आने वाले वर्षों की सफल रणनीति होगी।

स्वास्थ्य उद्योग, निर्यात और सार्वजनिक भलाई का नया समीकरण

उसी दिन दक्षिण कोरिया से आई एक अन्य स्वास्थ्य-संबंधी खबर ने इस व्यापक तस्वीर को और साफ किया। कोरिया ट्रेड-इंवेस्टमेंट प्रमोशन एजेंसी, यानी KOTRA ने वियतनाम के हो ची मिन्ह सिटी में ‘K-Med Expo’ से जुड़ा एक कोरिया-वियतनाम मेडिटेक निर्यात परामर्श कार्यक्रम आयोजित करने की घोषणा की। इसमें दर्जनों कोरियाई कंपनियां और लगभग सौ खरीदार भाग ले रहे हैं। यह खबर सीधे Gavi बैठक का हिस्सा नहीं है, लेकिन दोनों को साथ रखकर देखें तो एक बड़ी प्रवृत्ति सामने आती है—दक्षिण कोरिया अपने स्वास्थ्य और चिकित्सा क्षेत्र को घरेलू सेवा से आगे बढ़ाकर अंतरराष्ट्रीय प्रभाव के साधन में बदल रहा है।

यहां समझने वाली बात यह है कि सार्वजनिक स्वास्थ्य, मेडिकल टेक्नोलॉजी और औद्योगिक विस्तार अब एक-दूसरे से कटे हुए क्षेत्र नहीं रहे। वैक्सीन सहयोग, अस्पताल उपकरण, डायग्नोस्टिक तकनीक, डिजिटल हेल्थ प्लेटफॉर्म और प्रशिक्षण—ये सब मिलकर एक नए वैश्विक स्वास्थ्य पारिस्थितिकी तंत्र का हिस्सा हैं। कोरिया इस पूरे तंत्र में अपनी भूमिका मजबूत करना चाहता है। भारत भी ठीक इसी मोड़ पर खड़ा है, जहां स्वास्थ्य को केवल कल्याणकारी योजना के रूप में नहीं, बल्कि रणनीतिक क्षेत्र के रूप में देखना होगा।

भारतीय अनुभव से कहें तो जैसे टेलीमेडिसिन, जन औषधि, CoWIN जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म और बड़े पैमाने पर उत्पादन क्षमता ने हमारे स्वास्थ्य मॉडल को नई पहचान दी, वैसे ही कोरिया अपने उद्योग और स्वास्थ्य ढांचे को जोड़ते हुए आगे बढ़ता दिख रहा है। फर्क सिर्फ इतना है कि उसकी आबादी छोटी है, लेकिन संस्थागत दक्षता और उच्च-तकनीकी विनिर्माण उसे वैश्विक साझेदारी में विशिष्ट बनाते हैं। Gavi के साथ बातचीत इसी व्यापक परिदृश्य का कूटनीतिक चेहरा है।

हालांकि यह भी याद रखना चाहिए कि स्वास्थ्य का बाजारीकरण और वैश्विक सार्वजनिक भलाई के बीच संतुलन साधना आसान नहीं होता। यदि वैक्सीन और चिकित्सा उपकरण केवल निर्यात या रणनीतिक प्रभाव के साधन बनकर रह जाएं, तो सबसे गरीब समाज फिर पीछे छूट सकते हैं। इसलिए Gavi जैसे संस्थान महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि वे वैश्विक स्वास्थ्य व्यवस्था को केवल लाभ नहीं, जीवन और समानता के पैमाने पर भी परखते हैं।

आम लोगों की जिंदगी से इसका रिश्ता क्या है

ऐसी खबरें पहली नजर में दूर की कूटनीतिक गतिविधियां लग सकती हैं, लेकिन इनका रिश्ता आम लोगों की रोजमर्रा की सुरक्षा से सीधा है। जब हम कहते हैं कि किसी देश की ‘संक्रामक रोग प्रतिक्रिया क्षमता’ बढ़ रही है, तो उसका मतलब यह होता है कि बीमारी का पता जल्दी लग सकेगा, सही समय पर टीके उपलब्ध होंगे, स्थानीय स्वास्थ्य व्यवस्था घबराहट में नहीं टूटेगी, और स्कूल, दफ्तर, यात्रा तथा बाजार जैसी दैनिक गतिविधियों पर संकट का असर कम होगा। दूसरे शब्दों में, वैक्सीन सहयोग का मतलब सामाजिक स्थिरता भी है।

भारतीय परिवार इस बात को भलीभांति समझते हैं। एक बच्चे की बीमारी पूरे घर की दिनचर्या बदल देती है; अगर महामारी हो, तो लाखों परिवारों की शिक्षा, आय और मानसिक स्वास्थ्य प्रभावित होता है। इसलिए रोकथाम की हर अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था, चाहे वह कितनी भी तकनीकी या कूटनीतिक क्यों न लगे, अंततः व्यक्ति और परिवार की सुरक्षा से जुड़ती है। Gavi का काम इसी सिद्धांत पर आधारित है कि बीमारी के फैलने से पहले उसकी दीवार खड़ी कर दी जाए।

दक्षिण कोरिया और Gavi की इस मुलाकात से फिलहाल इतना ही स्पष्ट हुआ है कि सहयोग की संभावनाओं पर गंभीर चर्चा हो रही है और कोरिया से अधिक सक्रिय भूमिका की सार्वजनिक अपेक्षा जताई गई है। कोई बड़ा समझौता अभी घोषित नहीं हुआ, पर कई बार अंतरराष्ट्रीय स्वास्थ्य में असली बदलाव ऐसे ही शांत, औपचारिक और तकनीकी दिखने वाले संवादों से शुरू होते हैं। बड़े नारे बाद में आते हैं; पहले नेटवर्क बनते हैं, भरोसा बनता है, जिम्मेदारियां तय होती हैं।

आज की दुनिया में, जहां एक वायरस पासपोर्ट देखकर सीमाएं नहीं मानता, वहां स्वास्थ्य सुरक्षा को भी सीमाओं से परे सोचने की जरूरत है। दक्षिण कोरिया और Gavi की यह बातचीत उसी सोच का ताजा उदाहरण है। भारतीय नजरिये से देखें तो यह खबर हमें दो बातें याद दिलाती है—पहली, वैक्सीन अब भी मानवता की सबसे शक्तिशाली सार्वजनिक स्वास्थ्य ढालों में एक है; और दूसरी, वैश्विक सहयोग कोई आदर्शवादी नारा नहीं, बल्कि व्यावहारिक आवश्यकता है। आने वाले वर्षों में जो देश इस सच को जल्दी समझेंगे, वे न केवल अपने नागरिकों को बेहतर सुरक्षा देंगे, बल्कि दुनिया में अधिक भरोसेमंद और प्रभावशाली साझेदार के रूप में भी उभरेंगे।

Source: Original Korean article - Trendy News Korea

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